Wednesday, January 27, 2016

आँधियों ने ओढ़ ली इतनी उदासी किस लिए ? - सतीश सक्सेना

क्या हुआ,जो सोंच में, डूबी खुमारी किसलिए ?
आँधियों ने ओढ़ ली इतनी उदासी किस लिए ?

तुम तो कहते थे, न सोओगे, न सोने दो मुझे
आज ऐसा क्या हुआ,इतनी उबासी किस लिए ?

ऐसी क्या अवमानना की मानिनी की, प्यार ने
चमक चेहरे की हुई है,अमलतासी किस लिए ?

लगता घायल से हुए हो, जख्म गहरे दिख रहे
पागलों के पास जाकर मुंह दिखायी किसलिए ? 

ये भी अच्छा है कि पछतावा रहे , सरकार को
इक दीवाने के लिए भी जग हँसायी किसलिए ?

Saturday, January 16, 2016

यह आवाज,अजान नहीं है -सतीश सक्सेना

 चंदा तो  मेहमान नहीं है,
लोगों पर अहसान नहीं है !

अपने बच्चों को वर देना
वैसे भी, अनुदान नहीं है !

मंदिर ,मस्जिद, स्पीकर की ,
यह आवाज,अजान नहीं है !

बेबस निर्बल पशु हत्या है
ये कोई बलिदान नहीं है !

सब के मन की पूरा करना ,
इतना भी आसान नहीं है !

तुम्हें मुक्त कर हम सो जाएँ
और कोई अरमान नहीं है !

जितना संग दिया सपनों में
भुला सकें आसान नहीं है !


Monday, January 11, 2016

सहज रहने नहीं देगी, तेरी मौजूदगी मुझको - सतीश सक्सेना

भरी आँखें रुलायेंगी तेरी,  ताजिन्दगी मुझको ,
तुम्हारी याद के संग आयेगी शर्मिंदगी मुझको !

हमें अरसा हुआ दुनियां के मेलों में नहीं जाते 
सहज रहने नहीं देगी, तेरी मौजूदगी मुझको !

न मिलने की तमन्ना शेष न दीदार की ख्वाहिश
बहुत तकलीफ ही देगी,तुम्हारी बंदगी मुझको !

जमाने भर से लड़ने में कभी नज़रें न नीची कीं   
कहीं मज़बूर न कर दे, तेरी बेपर्दगी  मुझको !

खुदा के सहज बन्दे को, दिखावे ही नहीं आते, 
न जाने क्यों लगे अच्छी मेरी आवारगी मुझको !

Monday, January 4, 2016

शायर बनकर यहाँ गवैये आये हैं - सतीश सक्सेना

आज हंसाने तुम्हें, मसखरे आये हैं,
शायर बनकर यहाँ, गवैये छाये हैं !

पैर दबा कवि मंचों के अध्यक्ष बने
आँख नचाके,काव्य सुनाने आये हैं !

रोज शाम को पैग पद्मश्री भरते हैं ,
डॉक्ट्रेट मालिश पुराण में पाये हैं !

कैसे अपनी भावभंगिमा के बल पर 
कितने जोकर, पद्म श्री कहलाये हैं !

अदब, मान मर्यादा जाने कहाँ गयी,
ग़ज़ल मंच पर,लहरा लहरा गाये हैं !

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