Sunday, November 30, 2014

मगर हृदय ने पढ़ लीं कैसे, इतनी सदियाँ आँखों में -सतीश सक्सेना

अरसे बाद मिली हैं नज़रें,छलके खुशियां आँखों में !
लगता खड़े खड़े ही होंगीं, जीभर बतियाँ आँखों में !

बरसों बाद सामने पाकर, शब्द न जाने कहाँ गए !
मगर हृदय ने पढ़ लीं कैसे इतनी सदियाँ आँखों में ! 

इतना भी आसान न होता, गुमसुम दर्द भुला पाना !
बहतीं और सूखती रहतीं,कितनी नदियां आँखों में !

सावन की हरियाली जाने कबसे याद न आयी है ,
तुम्हें देख लहरायीं कैसे, इतनी बगियाँ आँखों में !

इतना हंस हंस बतलाते हो कितना दर्द छिपाओगे !
कब से आंसू  रोके बैठीं, गीली गलियां आँखों में ! 



Monday, November 24, 2014

भारत माँ, रोये तार तार, अरविन्द नहीं हारा होगा !! -सतीश सक्सेना

बे-ईमानों  की  दुनियां में , 
अरविन्द,नाम है सपने का !
आँखों की पट्टी खोल रहा,   
उदघोषक है परिवर्तन का !
घर के संपन्न कुबेरों ने, 
यारों से मिलकर हरा दिया !
धूर्तों से इलेक्शन हारा है,संकल्प नहीं हारा होगा !

इकला था,और लड़ा सबसे  
निर्धन था बिन संसाधन के
कुछ चापलूस बतखोर जुड़े
आंधी में,लालच में धन के  
मक्कार नकाब लगा आये, 
विश्वास जीतने को उसका !
आघात हुआ था घातक पर,निष्कपट नहीं हारा होगा !

धनवानों की इस बस्ती में
अहसान रहे श्रमजीवी का !
मानव मूल्यों की  रक्षा में 
सम्मान रहे ,आंदोलन का
टीवी प्रचार,मीडिया बिके,
आंदोलन ख़त्म कराने को !  
विश्वास यही इन हिज़डों से,यह मर्द नहीं हारा होगा !

ठट्ठा, मज़ाक, उपहास और 
अपमान हुआ है गांधी का !
चोरों, मक्कारों के  द्वारा   
अवमान हुआ है,आंधी का !
राजा , कुबेर , भ्रष्टाचारी , 
सब एक मंच पर पंहुच गए !
जनता, मूरख बन हारी है ,विश्वास नहीं हारा होगा ! 

बिन पैसे, इस आंदोलन में 
इकला धनवानों साथ लड़ा 
बीमार था , डंडे , लाठी खा 
राज्यशक्ति के साथ लड़ा !
बर्फीला पानी बरसाया,
दुबले पतले हठयोगी पर !
भारत माँ, रोये तार तार, अरविन्द नहीं हारा होगा !

सारी  ताकतें साथ आयीं
योगी का साथ छुटाने को  
टीवी अखबार खरीद लिए 
स्मृति से आग,हटाने को !
वोटों के व्यापारी जीते,
जनता ही हार गयी,फिर भी !
ना समझों को,समझाने का, संघर्ष नहीं हारा होगा !

कुछ साथी जमीर हारे थे 
अखबार बिके थे सोने में !
घबराए हुए , कुबेरों  से   
टीवी बिक गए करोड़ों में !
जनता का टीवी आएगा ,
दस दस रूपये के चंदे से ! 
इन बिके प्रचार साधनों से,साहसी नहीं हारा होगा !

परिवर्तन कौन रोक पाया  
कितने आये और चले गए
साधू, सन्यासी, महामना
के सभी आवरण उतर गए
अवसरवादी, फ़क़ीर बनकर 
आये थे, बापस चले गए !
चोरों को,उजागर करने का ,अरमान नहीं हारा होगा !

संसद से चोर भगाने को,
लड़ना होगा धनवानों से
ईमानदार  युग लाने को  
पिटना होगा बेईमानों से
सारी शक्तियां एकजुट हों,
योगी पर ताली बजा रहीं !
थप्पड़ ,घूँसा ,अपमानों से ,  ईमान नहीं हारा होगा !


Friday, November 21, 2014

तुमने उसके अपने घर को, घर अपना बतलाया होगा - सतीश सक्सेना

कितनी बार सबेरे माँ ने , दरवाजा खटकाया होगा !
और झुकी नज़रों से उसने दामन भी फैलाया होगा !

वे भी दिन थे जब अम्मा की नज़र से सहमा करते थे
आज डांटकर तुमने उनको कैसे चुप करवाया होगा !

यह लड़की थी,जो भाई के लिए,हमेशा लडती थी !
तुमने उसको,फूट फूट कर,सारी रात रुलाया होगा !

वे  खुद सबके बीच बैठकर,  बेटे के गुण गाते रहते    
अब उनको परिवारजनों में, शर्मिंदा करवाया होगा !

वे भी दिन थे उनके चलते, धरती कांपा करती थी,
ताकतवर आसन्न बुढ़ापे से ही, उन्हें डराया होगा !

Tuesday, November 18, 2014

मैं गंगा को ला तो दूंगा पर क्या धार संभाल सकोगे - सतीश सक्सेना

अगर हिमालय ले अंगड़ाई,कैसे भार संभाल सकोगे !  
सूरज के,नभ से बरसाए क्या अंगार, संभाल सकोगे ?

सृजनमयी के पास , अनगिनत रत्नों के भंडार भरे हैं !
मैं गंगा को ला तो दूंगा,पर क्या धार संभाल सकोगे ?

सारे जीवन गीत लिखे हैं , निर्धन और अनाथों पर, 
जाने पर मेरे  गीतों के , दावे दार संभाल सकोगे  ?

जीवन भर तुम रहे अकेले, ऊँगली पकडे पापा की  
बेईमानों बटमारों में ,क्या व्यापार संभाल सकोगे ?

खाली हाथों आया था मैं , खूब लुटाकर जाऊंगा ,
हंस हंस कर ली जिम्मेदारी बेशुमार संभाल सकोगे ?

Wednesday, November 5, 2014

तुम्हें देखकर बस मचल ही तो जाते - सतीश सक्सेना

मुझे देख कर तुम , बदल ही तो जाते,   
बिना देखे हमको निकल ही तो जाते !

विदाई से पहले , खबर तक नहीं की  
तुम्हें देखकर, बस मचल ही तो जाते !

बुलावा जो आता तो आहुति भी देते  
हवन में भले हाथ, जल ही तो जाते !

अगर विष न होता तो नारी को दुमुहें
न जाने कभी का,निगल ही तो जाते !

अगर हम तुम्हें , बिन मुखौटे के पाते ! 
असल देखकर बस दहल ही तो जाते 




Sunday, November 2, 2014

ये नेता रहे तो , वतन बेंच देंगे - सतीश सक्सेना

ये नेता रहे तो , वतन  बेंच देंगे !
ये पुरखों के सारे जतन बेंच देंगे

कलम के सिपाही अगर सो गए
हमारे मसीहा , अमन बेंच देंगे !

कुबेरों के कर्ज़े लिए शीश पर ये 
अगर बस चले तो सदन बेंच देंगे

नए राज भक्तों की इन तालियों
के,नशे में ये भारतरतन बेंच देंगे

मान्यवर बने हैं करोड़ों लुटाकर
उगाही में, सारा वतन बेंच देंगे !

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