Monday, December 23, 2013

घर से माल कमाने निकले, रंग बदलते गंदे लोग -सतीश सक्सेना

खद्दर पहने बाहर निकले, देश लुटाते गंदे लोग !
जनमानस में आग लगाने,घर से जाते गंदे लोग !

राजनीति में चोर बताया जाए, अच्छे लोगों को !
अपना माल छिपा,गंदे आरोप लगाते,गंदे लोग !


सभी जानते नेता बनकर, नोट बरसने लगते हैं ,
वोट जुटाने,कई तरह के भ्रम फैलाते गंदे लोग !

जेल दूसरा घर होता है ,चोर उचक्के लोगों का
खद्दर पहने,घोटाले कर, जेल में जाते गंदे लोग !

चोर डकैती में तो ख़तरा,बड़ा झेलना पड़ता है !
राजनीति में आसानी से,माल कमाते गंदे लोग !




Wednesday, December 18, 2013

किसके ऊपर लिखी रुबाई, धत्त तेरे की ! -सतीश सक्सेना

कहाँ पे जाके कलम चलाई धत्त तेरे की, 
किसके ऊपर लिखी रुबाई,धत्त तेरे की !

पूरे जीवन जिए शान से, नज़र उठा कर,

और कहाँ पे नज़र झुकाई, धत्त तेरे की !

सबसे पहले किससे हमने आँख मिलाई,
और किसे आवाज लगाई, धत्त तेरे की !


आँख न लगने दी,चौकन्ने थे, ड्यूटी पर 
और कहाँ जाकर झपकाई,धत्त तेरे की ! 

जीवन भर शेरों को जाकर,माँद में मारा
कहाँ पंहुच के हुई धुनाई, धत्त तेरे की !

कवि बन के हिन्दी की करते ऎसीतैसी  
पुरस्कार की हाथा पाई , धत्त तेरे की !

Saturday, December 14, 2013

क्या होगा , यदि कल का सूरज, मेरे प्राण नहीं देखेंगे -सतीश सक्सेना

दुनिया तो चलती जायेगी 
केवल हम ही साथ न होंगे 
एक दिवस तो जाना ही है 
कुछ बरसों में यहाँ न होंगे 
सबका अंत समय आना है,
तब क्यों डर डर जलें बुझेंगे ! 
क्या होगा , यदि कल का सूरज, मेरे प्राण नहीं देखेंगे !

यदि भय से कमजोर पड़ेंगे 
लोग खुशी से, राज करेंगे ! 
जो हमने सींचा मेहनत से 
उसको वे , बरबाद करेंगे !
कैसे हम विश्वास कर सकें , 
कच्चे फूल नहीं तोड़ेंगे !
रेगिस्तान में  वृक्ष उगाये , इनकी जड़ें नहीं खोदेंगे !

दुनियां भरी पड़ी ऐसों  से 
अपने कद को बड़ा समझते 
आधा जीवन बीत चुका है 
सारे जग में अकड़ दिखाते
बुद्धि ज़रा सी लेकर आये , 
लेकिन ज्ञान बहुत बांटेंगे ! 
लुटते बार बार फिर भी,दरवाजा खोल के ही सोयेंगे !

ऐसे  कैसे  जीवन साथी 
अपनों को सम्मान न देते 
छोटी छोटी सी बातों पर 
अपना जीवन नर्क बनाते  
नीम के पौधे ,कड़वे लगते, 
गिरते दांतों  को रोयेंगे !
जुते  हुए  तांगे  में कब से , मरते दम,  सीधे देखेंगे !

काश मानवों को अपने घर 
खुश होकर रहना आ जाये 
काश एक ही छत के नीचे
जीवन खुशबू दार बनाएँ !
थोड़े से दिन लेकर आये, 
मन का जमा अहम्  धोएंगे !
हँसते हँसते आँख बंद हों,पता नहीं किस दिन सोयेंगे !

Tuesday, December 10, 2013

हमको अपने से मनचाहे,लोग कहाँ मिल पाते हैं - सतीश सक्सेना

मन में  प्यार जगाने वाले लोग कहाँ मिल पाते हैं !
जीवन साथ निभाने वाले लोग कहाँ मिल पाते हैं !

अम्मा,दादी,चाची,ताई,किस दुनियां में चलीं गयीं , 
बचपन याद दिलाने वाले लोग कहाँ मिल पाते हैं !

महज दिखावे के यह आंसू,आँख में भर के आये हैं,
गैर दुखों  में रोने वाले , लोग कहाँ मिल पाते हैं !

अपने अपने सुख दुःख लेकर इस दुनियां में आये हैं 
केवल सुख ही पाने वाले, लोग कहाँ मिल पाते हैं !

क्यों करते हो याद उन्हें,जो हमें अकेला छोड़ गए, 
दूर क्षितिज में जाने वाले, लोग कहाँ मिल पाते हैं !




Monday, December 9, 2013

घर को दीमक मुक्त कराने आये हैं झाड़ू वाले !!

काश देश के नौजवान , गीत में वर्णित झाडूवाले नौजवान बन जाएँ और देश को स्वच्छ बनाएँ ! यह एक कविता नहीं स्वप्न है जो एक दिन साकार होगा , यह रचना मेरे बेटे के अनुरोध पर लिखी गयी है !!

कूड़ा साफ़ करें बरसों का,नौजवान झाड़ू वाले !
घर को दीमक मुक्त कराने आये हैं झाड़ू वाले !

जलते घर में ठंडक लाने,जल लाये,झाड़ू वाले !
देशवासियों,बाहर आयें ,द्वार खड़े झाड़ू वाले !

हर बस्ती, निगरानी  करने, जायेंगे झाड़ू वाले !

महिलाओं को रखें सुरक्षित,ठान रहे झाड़ू वाले !    

मंदिर मस्जिद,चर्च बुहारेंगे आकर झाड़ू वाले !

राम,अली,ईसा मसीह को,आदर दें,झाड़ू वाले ! 

सारे धर्मों का सुख लेंगे, एक साथ, झाड़ू वाले !

आम आदमी साथ जियेंगे साथ मरें झाड़ू वाले !

शातिर चोर उचक्कों से, लड़ने आये झाड़ू वाले 
मत घबराओ टूटी कुटिया , छाएंगे  झाडू वाले !

Sunday, December 8, 2013

पुरवाई में तुमको कैसे , वही पुरानी चोट दिखाएँ - सतीश सक्सेना

लोकतंत्र में बेशर्मी से, धन की, लूट खसोट दिखाएँ !
धन के आगे बिकने बैठे, कितने काले कोट दिखाएँ ! 

जिन्हें देखकर दर्द उभरता, कैसे हंस कर गले लगाएं !
पुरवाई में  तुमको  कैसे, बड़ी पुरानी  चोट दिखाएँ !

लम्बी दाढ़ी, भगवे कपडे, तुम कैसे पहचान सकोगे !
भव्य प्रभामंडल के पीछे,कैसे तुमको खोट दिखाएं !

हमको अखबारी लगता है,भिक्षुक धनवानों की दूरी 
सिर्फ उन्हें झोपड़ बस्ती में,थोक में रहते वोट दिखाएं !

खद्दर पहने हाथ जोड़ कर,सब की सेवा करने आये !   
जब भी काम कराना चाहें,इनके आगे नोट दिखाएँ !

Friday, December 6, 2013

अपने पेट उघाड़े रहना , राजा आने वाले हैं -सतीश सक्सेना

बरसों बाद गली में , अपने नेता आने वाले हैं !
आँख में आंसू लेके रहना,कुछ तो पाने वाले है!


इन ऊंचे लोगों को नीचे,नहीं दिखायी देता है !
अपने पेट उघाड़े रहना, राजा  आने वाले हैं !

झाड़ू पोंछा चूल्हा बर्तन, यही हमारा काम रहा !
पहले घर के मर्द, बाद में,हम भी खाने वाले हैं !

जरा दिखावा तो करना है कर्ज़ा देने वालों से 
चूल्हा बुझे दिखाते रहना, लाला आने वाले हैं !

ढेरों फूल बिछाए हमने,टूटी,फूटी सडकों पर ! 
जमके ढोल बजाते रहना,नेता आने  वाले हैं !

Tuesday, December 3, 2013

केवल बच कर रहना होगा, इतने बदबूदारों से - सतीश सक्सेना

मूरख जनता खूब लुटी है, पाखंडी सरदारों से !
देश को बदला लेना होगा,इन देसी गद्दारों से !

पूंछ हिलाकर चलने वाले,सबसे पहले भागेंगे !
सावधान ही रहना होगा, इन झंडे बरदारों से !

अक्सर धोखा देने वाले, बगल में पाये जाते हैं !
आँख खोल के सोना होगा,घर के पहरेदारों से !

कड़ी ठण्ड में बाबा ऊपर,आधा कम्बल डाला है !
आधा कम्बल हमें दिलाये,शिक्षा बरखुरदारों से !

जीवन भर ही वोट डालते रहे, तुम्हारे  कहने पर !
अब कैसे बच पाये इज्जत,इन डाकू सरदारों से !

राजनीति के मुहरों के रंग,देख लिए हैं,जनता ने !
केवल बच कर रहना होगा, इतने बदबूदारों से !


Monday, December 2, 2013

घर की इज्जत बेंच,किसी के घर का पानी भरते हैं -सतीश सक्सेना


कैसे, कैसे लोग राष्ट्र की ध्वजा उठाये चलते हैं !
राजनीति के मक्कारों के, चंवर उठाये चलते हैं !

नोट कमाने,राष्ट्रभक्त बन,खद्दर पहन के आये हैं !
पीठ पे नाम लिखाये उनका,पूंछ उठाये चलते हैं !

मंत्री का विश्वास मिला तो वारे न्यारे हो जाएंगे !
दल्लागीरी करते , मन में लड्डू खाये, चलते हैं !

नेता के मंत्री बनते ही, नोट कमाएंगे जी भर के,  
जोश जोश में दुश्मन के, कंगूरे ढाये चलते हैं !

खुद पार्टी के ड्रमर बन गए,बच्चे ढोल बजायेंगे,
धन पाने को राष्ट्रभक्ति के,रंग लगाये चलते हैं !
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