Thursday, June 28, 2012

गीता हरिदास -सतीश सक्सेना

कुछ दोस्त , रिश्तेदारों से भी बढ़कर होते हैं , जिनसे आप अपना कोई भी खुशी और दुख बाँट सकते हैं , इन मित्रों के लिए एक बार लिखा यह गीत याद आ गया !
धोखे की इस दुनियां में  ,
कुछ  प्यारे बन्दे रहते हैं !
ऊपर से साधारण लगते
कुछ दिलवाले रहते हैं  !
दोनों  हाथ  सहारा देते ,  जब भी ज़ख़्मी देखे गीत  !
अगर न ऐसे कंधे मिलते,कहाँ सिसकते मेरे गीत  !


हरिदास परिवार, मेरे जीवन के संकलित मोतियों में से एक हैं , जिन्हें मैं बहुत प्यार करता हूँ ! बहुत बुरे समय में, जो मित्र मुझे घेरे रहे उनमें हरिदास और गीता भाभी हमेशा साथ रहे  ! कैबिनेट सचिवालय में वरिष्ठ अधिकारी,  पोस्ट पर कार्यरत हरिदास से जब मैं पहली बार मिला था तो वे एक टफ व्यक्तित्व लगे थे , मगर थोड़े समय में ही इनकी सौम्यता और सरल स्वभाव ने दिल जीत लिया ! 30  मई 2012 को हरिदास, सक्रिय सेवा से रिटायर होकर अपने सरकारी मकान को छोड़ने की तैयारी ही कर रहे थे कि  7जून को गीता भाभी के ब्रेस्ट  बायोप्सी टेस्ट में कैंसर की पुष्टि हुई है ! उस दिन पहली बार मैंने हरिदास की मज़बूत आवाज में कंपन महसूस किया था !


Dr Geeta Kadayaprath 9810169286
उसके बाद शुरू हुआ , मित्रों की सहानुभूति और अस्पतालों की  दौड़धूप करते हरिदास अपना खाना पीना तक भूल गए ! अकेले में जब भी वे मेरे साथ होते, उनके आँखों की कोरों में आंसू साफ़ नज़र आते थे मगर गीता भाभी के चेहरे  पर तनाव कभी नहीं देखा ! हरिदास के कष्ट में चिंतित रहती वे, अपने भरपूर आत्मविश्वास के साथ कहती थी कि मुझे कुछ नहीं होगा !


२५ जून २०१२ को , मैक्स हॉस्पिटल, साकेत में डॉ हरित चतुर्वेदी और डॉ गीता कदायाप्रथ की अनुभवी टीम द्वारा, ५  घंटे तक चले सफल आपरेशन के बाद, जब मैंने अस्पताल पंहुचकर उनके ठन्डे हाथ पकडे, तब भी उनकी आँखों में वही मुस्कान देखी, जैसा उन्होंने मुझे वायदा किया था ! उनको हमेशा हिम्मत बंधाने वाला मैं, अपने आपको कमजोर पा रहा था मगर इस महिला ने बहादुरी की, जो मिसाल कायम  की, वह अद्वितीय थी ! 
इस ऑपरेशन में हरिदास परिवार का भरोसा, आपरेशन के समय , डॉ  गीता (कैंसर कंसल्टेंट ) की उपस्थिति पर था ! बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व की मालकिन  डॉ गीता, लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज से एम् बी बी एस , एम् एस एवं ग्लासगो (यू के) से एफ आर सी एस , यह कैंसर स्पेशलिस्ट डॉक्टर, राजीव गाँधी कैंसर अस्पताल दिल्ली, में कैंसर कंसल्टेंट रह चुकी हैं और ब्रेस्ट आपरेशन में सिद्धहस्त हैं !
मधुर मुस्कान के साथ अपने बीमार को हौसला देती यह लेडी डाक्टर इस सफल ऑपरेशन की निश्चित हकदार हैं ! 
महिलाओं में समस्त कैंसरों में, लगभग 30 % कैंसर, ब्रेस्ट  से सम्बंधित होते हैं !  ४० वर्ष या उससे ऊपर की महिलाओं में बगल अथवा स्तन में गांठ या सूजन जैसे लक्षणों पर तत्काल टेस्ट करवाना चाहिए, अफ़सोस है कि अक्सर महिलायें, यह कदम बहुत देर होने पर उठाती हैं ! 


कल जब उनसे मिलने गया तो मैंने उनसे कहा कि मैं आपके साथ एक फोटो खिंचाना चाहता हूँ ताकि अपने पाठकों को आपसे परिचय करा सकूं , मगर उसके लिए बैठना पड़ेगा , चूंकि यह मेरे साथ आपकी पहली फोटो होगी अतः हँसते हुए खिंचवानी होगी !  दर्द में कराहते हुए, ऊपर उठाये दोनों हाथ , घायल सीने और बगल  के साथ, उन्होंने जो फोटो खिंचवाई इसे मैं अपनी अब तक खींची गयी , सबसे यादगार फोटो मानता हूँ !
इस पोस्ट को लिखने का उद्देश्य गीता भाभी की निडरता के साथ, एक पति हरिदास की तकलीफ से, पाठकों का परिचय करना था ! 
सीधा साधा यह जोड़ा जुग जुग जिए यही मंगल कामना है ! 

Monday, June 18, 2012

ब्लोगर साथियों के समक्ष, मेरे गीत का लोक समर्पण - सतीश सक्सेना

16 जून लगभग ५:३० सायं हिन्दी के प्रख्यात हस्ताक्षर डॉ राजेंद्र अग्रवाल जी, डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा , डॉ भारतेंदु मिश्र जी, श्री अशोक गुप्ता ,एवं प्रोफ़ेसर डॉ अम्बरीश सक्सेना, जिन्हें देश में मीडिया  गुरु का दर्ज़ा प्राप्त है , की उपस्थिति में, डॉ देवेन्द्र देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र " ने ज्योतिपर्व प्रकाशन के द्वारा प्रकाशित पुस्तक "मेरे गीत " का विमोचन किया !


वयोवृद्ध आचार्य  श्री देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" हिंदी के वरिष्ठ गीतकार हैं। उनकी 50 से अधिक पुस्तकें जिनमे गीत, कविता, ग़ज़ल और आलोचना की पुस्तके शामिल हैं, प्रकाशित हुई हैं ! दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी के सेवानिवृत्त प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष श्री इन्द्र पर कम से कम 20 विद्यार्थियों ने शोध किया है।यहाँ उपस्थिति ,टेलीविजन जर्नलिज्म के कद्दावर चेहरों में से एक डॉ अम्बरीश सक्सेना मेरे स्कूल दिनों के सहपाठी रहे हैं ! भयानक गर्मी में, सायं 5 बजे कड़ी धुप में,  घर से चलकर , एक किताब के विमोचन में पंहुचना आसान काम नहीं था , अतः साथियों का आवाहन करते समय मैंने यह पंक्तियाँ लिखी थीं !


आज तुम्हारे पदचापों  की ,
सांस रोककर आशा करता,
तेज धूप में घर से  निकलें
मैं दिल से,आवाहन करता,
देखें कितना प्यार मिला है,कितने घर तक पंहुचे गीत !
कड़ी  धूप में , घर से बाहर,  तुम्हें  बुलाते  मेरे गीत  !


इस दुनियां में मुझसे बेहतर
गीत, सैकड़ो लिखने वाले  !
मुझसे अच्छा कहने वाले,
मुझसे  अच्छा गाने वाले  !
भरी दुपहरी घर से निकलेसुनने आये मेरे गीत  !
मात्र उपस्थित होने से ही, गौरव शाली मेरे गीत !


इस गीत यज्ञ में उपस्थित गुरु जनों का स्वागत करने हेतु , कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं   ...


देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" मेरी नज़र में साक्षात् गीतेश भी हैं, उनके समक्ष गीत सुनाना, दुस्साहस सा लग रहा था ! मगर देव वंदना और गुरु वंदना किसी भी आयोजन में आवश्यक मानी गयीं हैं ...


बिल्व पत्र और फूल धतूरा
पंचामृत अर्पित शिव पर !
देवराज सम्मान हेतु, खुद
गज आनन्, दरवाजे पर  !
इन्द्रदेव को घर में पाकर ,शंख   बजाएं मेरे गीत !
आचार्यों की नज़र पड़ी है उत्साहित हैं मेरे गीत !


अपने श्रोताओं में , सहसा,
तुम्हे देखकर मन सकुचाया !
कैसे आये, राह भूलकरमैं
लोभी,कुछ समझ ना पाया !
साधक जैसी श्रद्धा लेकर, तुम भी सुनने आये गीत !
कहाँ से वह आकर्षण लाऊँतुम्हें लुभाएं मेरे गीत !


हमारी मूल पुस्तकों में लिखा है कि गुरुकुल में, उच्च कोटि के प्राध्यापकों में, आचार्य, गुरु और उपाध्याय होते थे जिनमें आचार्य सर्व गुण संपन्न थे वहीँ उपाध्याय अपनी जीविकार्जन के लिए कुछ धन लेकर विद्यार्थी को वेद का कोई एक भाग पढाने पर सहमति व्यक्त करते थे ! इस सभा भवन में मेरे समक्ष न केवल गुरुजन मौजूद थे  बल्कि आचार्यवर की  भी उपस्थिति थी और मैं एक ऐसा विद्यार्थी जिसे कभी उपाध्याय के पाँव छूने का अवसर भी न मिला हों, संकोच में था कि वह  आचार्य समुदाय के समक्ष कैसे सुनाये और क्या सुनाये ....






गीतों का आकलन हेतु ,
आचार्य ,गुरु दरवाजे पर
उपाध्याय के पांव न देखे
क्या जाऊं , दरवाजे पर
सत्यवाक,ध्रतिमान सामने,हतप्रभ होते मेरे गीत !
पद्मनाभ की स्तुति करते, संकोचित हैं, मेरे गीत !


आज हवन को पूरा करने
कमल अष्टदल, आये हैं !
अक्षत पुष्प हाथ में लेकर
गुरु जन, घर में आये हैं !
यज्ञ अग्नि में समिधा देने, मंत्रोच्चारण करते  गीत !
स्वस्ति ध्वनि के साथ,गरजते बादल,देखें मेरे गीत !


मेरे गीतों की रचना कभी भी पुस्तक का आकार अथवा आकर्षण केंद्र बनने के लिए नहीं की गयी ! इस पुस्तक में संकलित मेरे गीत , पिछले २३ वर्षों में लिखे गए थे , शुरू के दिनों के लिखे कुछ गीत अपने मूल स्वरुप और अनगढ़  अवस्था में हैं एवं उन्हें कभी व्यवस्थित करने का भी प्रयास नहीं किया गया ! अधिकतर गीत सामाजिक जीवन की सच्चाइयों से सबक लेकर लिखे गए !


जब भी व्यक्तिगत अथवा किसी मित्र की वेदना का अनुभव हुआ , उसी समय अक्सर बिना प्रयास, एक गीत रचना हुई !


समस्त गीत बेहद ईमानदार हैं , वे तालियों की चाह के लिए अथवा किसी प्रकार के धनोपार्जन के लिए नहीं रचे गए ! सभा में ५-६ मेरे ऐसे सहकर्मी मित्र भी उपस्थिति थे जो मुझे २५ वर्षों से जानते थे और वे  यह देख अचंभित थे कि मैंने यह गीत बरसों पहले लिखे थे और इन्हें पहले कभी नहीं सुनाया गया ! मैंने अपने लेखन कर्म की चर्चा , अपने सहकर्मियों में  कभी नहीं की थी !


जहाँ माता,पिता, बहिन, भाई और वृद्धजनों पर मैं अक्सर गीत अथवा लेख लिखता रहा हूँ वहीँ एक और विषय मुझे अक्सर मुझे उद्वेलित करता रहा है ,हर पिता की लाडली पुत्री की, शेष बचे जीवन के लिए, अपने घर से विदाई ....


यह मेरे लिए बेहद तकलीफ देह है ! मज़बूत पिता के कठोर बदन का यह सबसे कमज़ोर हिस्सा , हमेशा के लिए, नए लोगों के मध्य अपना नया घोंसला बनाने के लिए, विदाई लेता है ! घर की  सबसे नाज़ुक डाली ही अपने वृक्ष से , नव जीवन रचना के लिए,  काट दी जाती है !

अपने बचे हुए पूरे जीवन यह लडकियां अपने पिता और भाई को आशा भरी नज़र से देखती हैं कि वे उसे याद रखे रहेंगे !हमारा यह दायित्व है कि उनकी यह आशा हम हमेशा बनाए रखें और अपने घर के इस पौधे को, सदा हरा भरा रखने के लिए, उसके आसपास बने रहे ! अक्सर बेटी पर लिखे गीत पढ़ नहीं पाता , ऑंखें अक्सर साथ छोड़ जाती हैं ! आशा है पाठक इन भावनाओं के साथ इन गीतों को बेहतर आनंद ले पायेंगे ! 

इस सम्मलेन की विशेषता, दूर दूर से ब्लोगर साथी मेरा साथ देने को वहाँ उपस्थित हुए थे  यह मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य था ! हालाँकि अरुण चंद्र रॉय आशंकित थे कि कड़ी गर्मी में इस प्रकार के आयोजन में १० - १५ लोग से अधिक लोग नहीं आ पाते हैं वहाँ इस छोटे से सभागार में लगभग १०० लोग एकत्रित थे ! इसी समारोह  में सुश्री रश्मि प्रभा द्वारा संकलित गीतों के  एक संग्रह खामोश खामोशी और हम का भी विमोचन किया गया !   

उपस्थित सम्मानित ब्लागर साथियों में, समाज को अपनी सेहत के लिए जागरूक बनाते  सर्वश्री कुमार राधारमण  , दिल्ली सरकार से गोल्ड मैडिल सम्मानित न्यूक्लियर मेडिसिन फिजिशियन  डॉ तारीफ़ दराल , संजय भास्कर, अमरेन्द्र त्रिपाठी, अस्वस्थ होने के बावजूद अविनाश वाचस्पति, मितभाषी निशांत मिश्र , ब्लागरों में इकलौता बाबा , दीपक बाबा , जय बाबा बनारस का उद्घोष  करते पुरविया कौशल किशोर मिश्र , स्नेही जज्बाती  एम् वर्मा , पहली बार संजू जी के बिना उपस्थित,हंसाते रहो के मस्त मौला  राजीव तनेजा , जिन्दगी की राहों में अपना साफसुथरा रास्ता तैयार करते  मुकेश कुमार सिन्हा , नवजवान कवि विनोद पाण्डेय, प्रेमी ह्रदय के साथ प्रेमरस वाले शाहनवाज़ सिद्दीकी, तेजतर्रार मगर गुरु के आरुणि  संतोष त्रिवेदी, के अतिरिक्त महिला ब्लोगरों की उपस्थिति मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य रहा !

बेहतरीन स्नेही मेज़बान सुश्री सुनीता "शानू "पिलानी से खास तौर पर अपने सुदर्शन,सुसंस्कृत पुत्र के साथ वहाँ आयीं थी , वहीँ क्षितिजा फेम  संवेदन शील एवं स्नेही अंजू चौधरी  "अनु " करनाल से अकेली पंहुचीं थीं ! हंसमुख  वंदना गुप्ता को अनायास वहाँ पाकर मैं आश्चर्य चकित था ,उनके वहां पंहुचने की  कोई पूर्व सूचना नहीं थी   ! स्टार न्यूज़ एजेंसी की ग्रुप एडिटर फिरदौस खान ऐसे आयोजनों में बहुत कम जाती हैं , वे भी वहाँ पूरे सब्र के साथ अंत तक उपस्थित थीं ! निस्संदेह इन महिलाओं की उपस्थिति से कार्यक्रम की गरिमा बढ़ी है और मैं व्यक्तिगत तौर पर इसके लिए आभारी हूँ !

अनुज खुशदीप सहगल की अनुपस्थिति, उनके अस्वस्थ होने के कारण बहुत अधिक खलती रही .......

"मेरे गीत " के बारे में विद्वानों की राय ...


अंतर्मंथन : http://tsdaral.blogspot.in/2012/05/blog-post_19.html
गीत मेरी अनुभूतियाँ : http://geet7553.blogspot.in/2012/06/blog-post.html
क्वचिदन्यतोपि : http://mishraarvind.blogspot.in/2012/06/blog-post.html
बैसवारी : http://www.santoshtrivedi.com/2012/06/blog-post.html
हरिभूमि : http://epaper.haribhoomi.com/Details.aspx?id=5377&boxid=142647772
जख्म जो ...http://redrose-vandana.blogspot.in/2012/06/blog-post_17.html
पुस्तकायन : http://padhatehue.blogspot.in/2012/06/blog-post.html
न दैन्यं न पलायनम : http://praveenpandeypp.blogspot.in/2012/06/blog-post_20.html
पंजाब केसरी :http://www.punjabkesari.com/E-Paper/Magzine/adv_3.pdf
न्यूज़ ट्रैक इंडिया : http://www.newstrackindia.com/photogallery/images/view/1708-MERE-GEET---Book-Release.html

Thursday, June 14, 2012

ब्लोगर साथियों का स्नेह आवाहन -सतीश सक्सेना


इस दुनियां में मुझसे बेहतर 
गीत, सैकड़ो लिखने वाले  ! 
मुझसे अच्छा कहने वाले, 
मुझसे  अच्छा गाने वाले  !
यह प्रयास भी सार्थक होगा,अगर आप आ जाएँ मीत !
मात्र उपस्थित होने से ही ,  गौरव शाली   मेरे  गीत  !


आज तुम्हारे पदचापों  की     
सांस रोककर आशा करता 
तेज धूप में घर से  निकलें  
रफ़ी मार्ग,आवाहन करता 
देखें कितना प्यार भरा है,कितने घर तक पंहुचे गीत !  
कड़ी  धूप में , घर से बाहर, तुम्हें बुलाते मेरे गीत  !


कौन हवन को पूरा करने
कमल, अष्टदल लाएगा ?
अक्षत पुष्प हाथ में लेकर
कौन साथ में, गायेगा  ?
यज्ञ अग्नि में समिधा देने,तुम्हें बुलाते मेरे मीत !
पद्मनाभ की स्तुति करते , आहुति देते मेरे गीत !


मेरे गीत का पुस्तक परिचय संगीता स्वरुप जी की कलम द्वारा  उनके ब्लॉग "गीत मेरी अनुभूतियाँ " पर जानिये , उनकी शैली और कलम मिल जाने से निस्संदेह  मेरे गीत गौरवान्वित हैं !
आभार इस स्नेह के लिए !

Monday, June 11, 2012

स्वागत गीत - सतीश सक्सेना

चाहें दिन हों या युग बीतें , 
मैं आशा के गीत लिखूंगा !
जिसे गुनगुनाते,चेहरे पर 
आभा छाये,गीत लिखूंगा ! 
बरसों से , जो लिखा ह्रदय पर ,कैसे  भुला  सकेंगे  गीत ?  
क्या जाने किस घडी तुम्हारी,झलक  दिखाएँ  मेरे  गीत !

पूजा करते , जीवन  बीता  !
अब मुझको आराम चाहिए !
कौन यहाँ आकर के,समझे
मुझको भी, अर्चना  चाहिए ! 
काश कहीं से हवा का झोंका,मेरे बालों को सहला दे !
क्षमा करें,मालिक बनने की, इच्छा करते मेरे गीत !

रात स्वप्न में एक जादुई
छड़ी ,मुझे क्यों छूने आई !
आज बादलों के संग आके 
मेरी लट, किसने सहलाई
लगता दिल  के दरवाजे पर, दस्तक देते मेरे  मीत !
प्रियतम के आने की आहट,खूब समझते मेरे गीत !

जाने कब से राह देखते
अन्धकार में किरणों की 
सुना सूर्यपुत्री को शायद
आज जरूरत सारथि की
काश रुके रथ,पास में आकर,खुशी मनाएं मेरे गीत
जल कन्या की स्मृति से ही, शीतल होते मेरे गीत !

ऊबड़ खाबड़ , इन राहों में ,
कष्टों में , साझीदार मिले 
कुछ बिन मांगे , देने वाले ,
घर बार लुटाते, यार मिले  !
आज दोपहर घर पर मेरे,जो पग आये ,वे मृदुगीत !
नेह के आगे, शीतल जल से,चरण पखारें मेरे गीत !

कुछ झंकारों का रस लेने
आते है, सुनने  गीतों को  !
कुछ तो इनमें मस्ती ढूँढें,
कुछ यहाँ खोजते मीतों को
बिना तुम्हारे,ये इच्छाएं, कैसे  पार लगाएं  गीत  !
कष्टों के घर, बड़े हुए हैं,प्यार ना जाने मेरे गीत  !

अपने  श्रोताओं  में , सहसा, 
तुम्हे देखकर मन सकुचाया !
कैसे आये, राह भूलकर, मैं
लोभी, कुछ समझ न पाया !
साधक जैसी श्रद्धा लेकर, तुम भी सुनने आये गीत !
कहाँ से, वह आकर्षण  लाऊँ ,तुम्हें लुभाएं मेरे गीत  !

कौन यहाँ पर तेरे जैसा
हंस, नज़र में  आता है !
कौन यहाँ गैरों की खातिर
तीर ह्रदय पर , खाता है !
राजहंस को घर में पाकर, दीपावली मनाएं गीत  !
मुट्ठी भर भर मोती लाएं , करें निछावर मेरे गीत !

बिल्व पत्र और फूल धतूरा
पंचामृत, अर्पित शिव पर !
मीनाक्षी सम्मान हेतु, खुद
गज आनन्, दरवाजे  पर  !
पार्वती सम्मानित पाकर, शंख   बजाएं मेरे गीत !
मीनाक्षी तिरुकल्याणम पर,खूब नाचते मेरे गीत !
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