Friday, April 27, 2012

मैंने तो मन की लिख डाली -सतीश सक्सेना

उर्मिला दीदी 
बचपन में दो साल की उम्र की धुंधली यादों में मुझे , २० वर्षीया उर्मिला दीदी की गोद आती है जो मुझे अपनी कमर पर बिठाये, रामचंदर दद्दा अथवा प्रिम्मी दद्दा के घर, अपने एक हाथ से मेरा मुंह साफ़ करते हुए , घुमाने ले जा रही हैं ! ढाई साल की उम्र में मेरी माँ की म्रत्यु के बाद, शायद वे मेरी सुरक्षा के लिए सबसे अधिक तडपी थीं !कुछ समय बाद वे भी ससुराल चली गयीं, उन दिनों भी वे अक्सर पिता से, मुझे अपनी ससुराल, हज़रत पुर,बदायूं बुलवा लेतीं थी !
कुसुम दीदी 
माँ के असामयिक चले जाने के बाद , पिता शायद बहुत टूट गए थे ! वे मुझे कभी नानी के घर (पिपला ) और कभी उर्मिला दीदी के घर में, मुझे छोड़ जाते थे ! माँ के न रहने के कारण, खाने की बुरी व्यवस्था और पेट के बीमार पिता को उन दिनों संग्रहणी नामक, एक लाइलाज बीमारी हो गयी थी जिसके कारण उनका स्वास्थ्य बहुत ख़राब होता चला गया ! लोगो के लाख कहने ने बावजूद उन्होंने अपने इलाज़ के लिए, बरेली जाने को मना कर दिया था ! 
 उन्हें एक चिंता रहती थी कि वे बच नहीं पायेंगे और इस लाइलाज बीमारी के लिए वे अपनी पैतृक जमीन बेचना नहीं चाहते थे ! वे अंतिम समय, अपनी चिंता न कर, मेरे भविष्य के लिए अधिक चिंतित थे ! इस चिंता को वे अपनी दोनों विवाहित पुत्रियों से , व्यक्त किया करते थे ! माँ के जाने के कुछ ही समय बाद , पिता ने नानी के घर में अपनी अंतिम सांस लीं , अंतिम दिनों वे अपनी तकिये के नीचे , अपने ४ वर्षीय बेटे के लिए, खोये की गुझिया छिपा कर, अवश्य रखते थे !
               अंततः पिता के न रहने पर, बड़ी दीदी (कुसुम ) मुझे अपने साथ ले आयीं उसके बाद की मेरी परिवरिश बड़ी दीदी ने की, जिन्होंने अपने सात बच्चों के होते हुए भी, मुझे माँ की कमी महसूस नहीं होने दी ! अगर वे न होतीं तो शायद मेरा अस्तित्व ही न होता !
              अक्सर अकेला होता हूँ तो मन में, अपनी माँ का चित्र बनाने का प्रयत्न अवश्य करता हूँ ! बिलकुल अकेले में याद करता हूँ , जहाँ हम माँ बेटा दो ही हों , बंद कमरे में ....
              भगवान् से अक्सर कहता हूँ कि मुझ से सब कुछ ले ले... पर माँ का चेहरा केवल एक बार दिखा भर दे...बस एक बार उन्हें प्यार करने का दिल करता है, केवल एक बार ...कैसी होती है माँ ...??

मेरी माँ की सूरत की कल्पना करते , इस कविता की रचना हुई थी ...

कई बार रातों में उठ  कर 
दूध गरम कर लाती होगी
मुझे खिलाने की चिंता में खुद भूखी रह जाती होगी
मेरी तकलीफों  में  अम्मा, सारी रात, जागती होगी !
बरसों मन्नत मांग गरीबों को, भोजन करवाती होंगी !

रात रात भर ,सो गीले में ,
मुझको गले लगाती होगी
अपनी अंतिम बीमारी में ,
मुझको लेकर चिंतित होंगीं
बच्चा कैसे जी पायेगा ,वे निश्चित ही रोई होंगी !
सबको प्यार बांटने वाली,
अपना कष्ट छिपाती होंगी !

अपनी बीमारी में, चिंता
सिर्फ लाडले ,की ही होगी !
गहन कष्ट में भी , वे ऑंखें
मेरे कारण चिंतित होंगी !
अपने अंत समय में अम्मा ,मुझको गले लगाये होंगी !
मेरे नन्हें हाथ पकड़ कर ,फफक फफक कर रोई होंगी !


माँ ! यह एक ऐसा शब्द है जो मैंने कभी किसी के लिए नही बोला, मुझे अपने बचपन में ऐसा कोई चेहरा याद ही नही, जिसके लिए मैं यह प्यारा सा शब्द बोलता ! अपने बचपन की यादों में उस चेहरे को ढूँढने का बहुत प्रयत्न करता हूँ मगर हमेशा असफल रहा मैं अभागा !मुझे कुछ धुंधली यादें हैं उनकी... वही आज पहली बार लिख रहा हूँ ....
जो कभी नही लिखना चाहता था !

-लोहे की करछुली (कड़छी) पर छोटी सी एक रोटी, केवल अपने इकलौते बेटे के लिए, आग पर सेकती माँ....
-बुखार में तपते, अपने बच्चे के चेचक भरे हाथ, को सहलाती हुई माँ ....
-जमीन पर लिटाकर, माँ को लाल कपड़े में लपेटते पिता की पीठ पर घूंसे मारता, बिलखता एक नन्हा मैं ...मेरी माँ को मत बांधो.....मेरी माँ को मत बांधो....एक कमज़ोर का असफल विरोध ...और वे सब ले गए मेरी माँ को ....
बस यही यादें हैं माँ की .....
माँ के न होने की तड़प अक्सर महसूस होती रही है ...

इक दिन सपने में तुम जैसी,
कुछ देर बैठ कर चली गयी !

हम पूरी रात जाग कर माँ ,
बस तुझे याद कर रोये थे  !
इस दुनिया से लड़ते लड़ते , तेरा बेटा थक कर चूर हुआ !
तेरी गोद में सर रख सो जाएँ, इस चाह  को लेकर बैठे हैं !



जब से होश संभाला, दुनिया में अपने आपको अकेला पाया, शायद इसीलिये दुनिया के लिए अधिक संवेदनशील हूँ ! कोई भी व्यक्ति अपने आपको अकेला महसूस न करे इस ध्येय की पूर्ति के लिए कुछ भी , करने के लिए तैयार रहता हूँ !

आज के समय में परस्पर स्नेह, जैसे परिवार से मिटता जा रहा है !असुरक्षित पुरानी पीढ़ी,अपने ही बच्चों से , अपने संसाधन, छिपाने में लगे रहते हैं ! अपने ही खून से,झूठ बोल, सहयोग व सेवा की उम्मीद, परिवार शब्द का मज़ाक बनाने के लिए काफी है ! बदकिस्मती से आज समाज में हर रिश्ता, एक दूसरे के प्रति अविश्वास के लिए अपराधी है !

किसी से भी आदर पाने के लिए निश्छल स्नेह और आदर देना आवश्यक होता है ! और यही मजबूत घर की बुनियाद होती है !हमारे  होते , अपनों की आँख से आंसू नहीं गिरने चाहिए ,इन आँखों से गिरता हर आंसू , स्नेहमाला के टूटते हुए मोती हैं ....

गंभीर और कष्टकारक स्थितियों में, हमें अपने बड़ों का साथ देना चाहिए न कि हम उनका उपहास करें और उनकी कमियां गिनाते हुए उपदेश दें , ऐसे  उदाहरण, मात्र क्रूरता माना जायेंगे ! ममता भरे आंसुओं को न पहचान सकने वाले अभागे हैं , भविष्य और इतिहास ऐसे लोगों को कभी  प्यार नहीं करेगा !

सारा जीवन कटा भागते
तुमको नर्म बिछौना लाते   
नींद तुम्हारी ना खुल जाए
पंखा झलते  थे , सिरहाने

आज तुम्हारे कटु वचनों से, मन कुछ डांवाडोल  हुआ है  !
अब लगता तेरे बिन मुझको, चलने का अभ्यास चाहिए !

परिवार की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बहू को, शायद ही बिना उसके दोष निकाले,अपनी बच्ची की तरह, कभी प्यार किया गया हो जबकि हर बेटी ईश्वर से दुआ मनाती हुई, नए घर में प्रवेश लेती है कि वहां उसे एक माँ और पापा मिल जाएँ , मगर अक्सर वहां माँ की जगह सास की तौलती निगाहें और पिता के स्नेह की जगह,ससुर की गंभीरता ही पाती है और शुरू होता है तनाव के साथ, बेमन एक घर में रहने की विवशता ! अक्सर पति , माता पिता और पत्नी में बैलेंस बनाने के प्रयास में त्रिशंकु बना रहता है !

पुरानी पीढ़ी, अपने जमाने की सीखी सारी परम्पराएं, इन घबराई हुई लड़कियों(नव वधुओं) पर निर्ममता के साथ लादने की दोषी है ! मैंने कई जगह प्रतिष्ठित ओहदों पर बैठे लोगों के सामने भी यह परम्पराएं होती देखीं ! इन परम्पराओं के जरिये बहू को "शालीनता" के साथ बड़ों का "सम्मान" करना सिखाया जाता है ! कॉन्वेंट एजुकेटेड इंजिनियर और मैनेजर बहू, घूंघट काढ कर, बैठी रहे ...थकी होने पर भी सास ननद को काम न करने दे आदि आदि...

और अफ़सोस यह है कि शालीनता के पाठ को पढ़ाने में, उस घर की महिलायें सबसे आगे होती हैं ऐसा करते समय उन्हें अपनी बेटी की याद नहीं रहती जिसे यही पाठ जबरदस्ती दूसरे घर पढाया जाना है !


अपनी बच्ची के आंसू और घुटन महसूस होते हैं मगर दूसरों की बच्ची के आंसू हमें अपने नहीं लगते, २० साल बाद इसी गैर बच्ची(नव वधु) से,जो उस समय,घर की शासक होती है, हम प्यार और सहारे की उम्मीद करते हैं ! हमें अन्याय का विरोध, सड़क पर जाने से पहले,अपने घर से शुरू करना चाहिए !

 गृहस्वामिनी को,ससुराल में बेटी की चिंता करने से पहले, अपनी बहू का ध्यान रखना होगा ! समाज में बदलाव लाने के लिए हमें हिम्मत भरे काम करने होंगे ...
इस बार पकड़ना हाथ जरा, मजबूती से साथी मेरे !
घनघोर अँधेरी रात मध्य,मैं चाँद को लाने निकला हूँ !

अपने लेखों में, विभिन्न रिश्तों के मध्य तकलीफें बयान की हैं जो अगर हम सब महसूस करलें तो इन गीतों का लिखना सफल मानूंगा !
कवि ह्रदय की विशालता रचनाओं में अक्सर चर्चित रही है , एक निश्छल मन से बड़ा कोई नहीं , यह परमहंस सरीखा मन, समझना हर किसी के बस का नहीं ..

विस्तृत ह्रदय मिला ईश्वर से
सारी दुनिया ही, घर लगती
प्यार नेह करुणा और ममता
मुझको दिए , विधाता ने !
यह विशाल धनराशि प्राण, अब क्या में तुमसे मांगूंगा !
दर्द दिया है, तुमने मुझको , दवा न तुमसे मांगूंगा !



जिसको कहीं न आश्रय मिलता 
मेरे दिल में , रहने  आये !
हर निर्बल की रक्षा करने 

का वर मिला , विधाता से
दुनिया भर में प्यार लुटाऊं, क्या निर्धन से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको , दवा न तुमसे मांगूंगा !

मानव जीवन का उपभोग पूरी उन्मुक्तता के साथ करने के बजाय , छिप छिप कर खुश होने के अवसर तलाशना ,न केवल अपनी शक्ति के साथ धोखा है बल्कि खूबसूरत मानव जीवन के प्रति अपराध है ! नाटक छोडिये और जीवन में आज का, एक एक क्षण का, आनंद लें क्या पता कल सुबह होगी भी या नहीं होगी ....

जब तक जियेंगे, हम भी जलाये रहें दिया !
कब आसमान रो पड़े ?हमको पता नहीं !

गीत पढ़ते समय पाठक अपनी मनस्थिति के अनुसार उस गीत को परिभाषित करता है , कई बार अर्थ का अनर्थ भी महसूस किया जाता है, आशा है पाठक गण कवि ह्रदय की अनंत और असीम भावनाओं का आदर करेगा !

जो शब्द ह्रदय से निकले हैं 
उन पर न कोई संशय आये
वाक्यों के अर्थ बहुत से हैं ,
मन के भावों से पहचानें !
मैंने तो अपनी रचना की, हर पंक्ति तुम्हारे नाम लिखी
क्या जाने अर्थ निकालेगी, इन छंदों का, दुनिया सारी !


मैं एक नियमित खून दाता ( ओ प्लस ) हूँ और दिल्ली के कई हास्पिटल में अपना नाम लिखवा रखा है कि अगर किसी को मेरे खून की जरूरत पड़े तो मुझे किसी भी समय बुलाया जाए, उपलब्द्ध रहूँगा ! बीसियों मौकों पर,जब मैं अनजान लोगों को खून देने पंहुचा तो भरे पूरे परिवार के लोग कृतार्थ भाव से हाथ जोड़े खड़े पाए जाते हैं , कि चलो एक यूनिट मुर्गा तो फंसा, और रक्तदान के बाद मैं अक्सर इन स्वार्थी ,डरपोक रिश्तेदारों और तथाकथित दोस्तों पर हँसता हुआ ब्लड बैंक से बाहर आता हूँ !
एक फ़िल्मी गीत, जो बचपन से सबसे अधिक पसंद है, "सदियों जहान में हो चर्चा हमारा" अक्सर गुनगुनाता हूँ  ! जीवन में कुछ ऐसा करने की तमन्ना रही है जो कोई और न कर सका हो , कुछ ऐसा, जो दूसरों के लिए किया जाए , मानवता के लिए उदाहरण बनें ! अपने लिए भरपूर जीना ,और खुश रहना, कोई जीना नहीं हुआ !
                मृत्यु बाद, गैर भी रोयें और कहें कि  इस इंसान की अभी आवश्यकता थी , तब  जीना सफल माना जाये !

आहटें पैरों की सुनकर,साज़ भी थम जाएँ जब, 
देखकर हमको वहां , कुछ ढोल बजने चाहिए  !

मेरे गीत लिखने का उद्देश्य , लोग पढ़ कर तारीफ़ करें ,या प्रकाशित हों, पुरस्कृत हों, कभी न रहा ! यह रचनाएं , अपने मन में उठी इच्छाएं और विचारों को एक आकार प्रदान करने का प्रयत्न हैं !पूरे जीवन जो खुद भोगा या मित्रों से महसूस किया , कवि ह्रदय ने उन्हें ईमानदारी के साथ, कागज़ पर लिख दिया !

अगर अरुण चन्द्र रॉय  ( प्रकाशक ) न मिले होते तो यकीनन इस पुस्तक के छपने की मैं सोंच भी नहीं पाता ! यह नौजवान, हिम्मती प्रकाशक, अपना सर्वस्व दाव पर लगाकर, हम जैसे नवोदितों को प्रकाश में लाकर , अपने आपको, शर्तिया जोखिम में डाल रहा है ! ईश्वर से, मैं उनकी सफलता की कामना करूंगा !


इस गीतखंड के छपने के अवसर पर, अपने परिवार के साथ मैं , आज याद करना चाहता हूँ अपने उन प्यारों को,जिन्होंने मुझे खड़ा करने में मदद की !

सबसे पहले उन्हें, जिन्होंने मुझे उंगली पकड़ के चलना सिखाया , अगर वे हाथ मुझे सहारा न देते तो शायद मेरा अस्तित्व और यह भरा पूरा परिवार और मुझे चाहने वाले , कोई भी न होते ! उनमें से कुछ हैं और कुछ मेरी  अथवा परिवार की लापरवाही के कारण, समय से पहले, छोड़ कर चले गए  ! शायद उस समय उनकी अस्वस्थता पर मैंने उचित ध्यान दिया होता तो वे अभी मेरे साथ होते !  इन बड़ों के साथ, मैं अपने आपको हमेशा स्वार्थी महसूस करता हूँ , उनके साथ ही मैं सबसे कम कर पाया जिनके साथ सबसे अधिक करना चाहिए, हमेशा उनका ऋणी ही रहूँगा , उनका कर्जा लेकर मरना मेरी नियति होगी ...
इसके बाद वे, जो मेरे अपने नहीं थे , जिनसे कोई रिश्ता नहीं था उसके बावजूद इन "गैरों " ने, जब जब मुझे अकेलापन और अँधेरा महसूस हुआ , मेरा साथ नहीं छोड़ा !  मुझे लगता है, पिछले जन्म का कोई रिश्ता रहा होगा, जिसका बदला उन्होंने इस जन्म के कष्टों में, साथ देकर पूरा किया ! निस्वार्थ प्यार और स्नेह का कोई मोल नहीं होता ! जब भी अकेले में, मैं इन प्यारों का दिया संग याद करता हूँ तो आँखों में आंसू छलक आते हैं बस यही कीमत अदा कर सकता हूँ इन अपनों की ! और मेरे पास  इन्हें देने को कुछ नहीं है , शायद आभार भी इनके प्यार का अपमान होगा !

विधि गौरव, ईशान गरिमा यह दोनों जोड़े बेहद मेहनती एवं कुशाग्र बुद्धि हैं , निश्छल मन के साथ मेरे यह बच्चे आसमान की ऊंचाइयां छुएंगे, ऐसा मुझे विश्वास है !
अंत में आभारी हूँ ,गृहस्वामिनी दिव्या का जिनके सहयोग बिना मेरे गीत ही नहीं, परिवार भी अधूरा होता ,शायद पत्नी की अपेक्षाओं पर उतरना बेहद मुश्किल होता है और मैं भी अपवाद नहीं रहा ! जहाँ मैं उन्हें सहयोग नहीं दे पाया उसके लिए अपनी अयोग्यता को दोषी ठहराता हूँ...

रुचियाँ -जिनका कोई न हो उनकी मदद करना, "आँचल" ट्रस्ट का संस्थापक , सर्विस संगठन में कार्य करना, फोटोग्राफी , होमिओपैथी पढना और लिखना, जीवन को हँसना सिखाना ...

मेरी रचनाएं मौलिक व अनपढ़ हैं , इनका बाज़ार में बताई गयी किसी साहित्य शिल्प, विधा और शैली से कोई लेना देना नहीं ये उन्मुक्त है और उन्मुक्त मन से इनका आनंद लें ! 

Tuesday, April 24, 2012

सब झूम उठे ....-सतीश सक्सेना


कुछ ऐसा आज हुआ यारो
पग जहाँ उठे,रंग बरस उठें 
कुछ ऐसा रंग चढ़ा मन पर , 
हम जहाँ उठे, सब झूम उठे 
कुछ मौसम ने अंगडाई ली, 
गुलमोहर ने रंग बरसाए !
कुछ यार हमारे आ बैठे , महफ़िल में सुर झंकार उठे  !

दिल करे नाचने को यारों, 
माहौल सुगन्धित हो जाए  
जीवन के सुंदर पन्नों  में ,
चन्दन की गंध समा जाये 
मधु कलशों से अमृत छलके, 
मन वृन्दावन सा हो जाए !
बचपन से कभी जो सुन न सके, वे साज बजाए झूम उठे !

जीवन की सुंदर नगरी में ,
यह पहला कदम उठाया है 
अब साथ तुम्हारा पाते ही 
मन में उत्साह समाया है !
अब दिन भर तो रंग खेलेंगे  
हर रात मनेगी  दीवाली !
पायल छमछम, तबला  ठुमके, सब यार हमारे झूम उठें !

रो रोकर दुनिया जीती है 
हम हँसना उसे सिखायेंगे 
नफ़रत की जलती लपटों 
पर गंगा जल ही बरसाएंगे  
शीतल जल की फुहार बरसे ,
जब तपती धरती पर यारो 
रजनीगंधा के साथ साथ , घर का गुलमोहर महक  उठे !

Friday, April 20, 2012

शारदा पुत्र राजेश उत्साही -सतीश सक्सेना

जबसे ब्लॉग जगत से जुड़ा हूँ , ईमानदार लेखन, पढने  को लगभग तरस से गए !मगर हाल में गुल्लक पर लिखी राजेश उत्साही की आप बीती  "सूखती किताबों में भीगा मन " पढ़ते पढ़ते, मेरा मन अवश्य भीग गया !

राजेश उत्साही को, मैं ब्लॉग जगत के उन रत्नों में से एक मानता हूँ, जिसका आकलन करने की, उतावले ब्लॉग जगत के पास सामर्थ्य ही नहीं है , वे हिंदी साहित्य लेखकों के  उस विशिष्ट वर्ग से हैं ,जिन पर हिंदी भाषा को गर्व होगा ! कम से कम मैं उन लोगों में से एक हूँ ,जो गर्व से यह कहेंगे मुझे राजेश उत्साही ने स्वयं हस्ताक्षरित पुस्तक "वह जो शेष है " भेंट दी है ! ज्योतिपर्व प्रकाशन के अरुण चन्द्र राय एवं ज्योति राय  की पहल पर छपी, इस किताब में राजेश उत्साही की बेहतरीन रचनाओं का समावेश है ! दिलचस्प यह है कि संयोग से लेखक की तरह अरुण चन्द्र राय खुद बेहद प्रतिभाशाली और संवेदनशील लेखक हैं ! और उन्हें संवेदनशील रचनाओं की अच्छी पहचान है !  निस्संदेह ये दोनों पति पत्नी इस सफल प्रयास के हेतु बधाई के पात्र हैं !  
राजेश की लेखन शैली के बारे में जानना हो तो गुल्लक पर लिखा उपरोक्त लेख पढ़ लें ! अपने आपको बड़े लेखक  साबित करने में लगे हम लोग ,शायद इस लेखक  में ईमानदारी की एक गंध महसूस कर सकें !

बरसों से, बेशकीमत कलम का धनी यह लेखक ,अपने आपको स्थापित करने के संघर्ष में लगे, लेखकों में, हिम्मत की एक मिसाल है !
इस कविता संग्रह में एक कविता  " चक्की पर " की इन लाइनों पर गौर करें ....
स्त्रियाँ अपने में मगन 
सूप में फटकती रहती हैं चिंताएं 
लापरवाह अपनी देह के प्रति 
...
बहरहाल 
मैं और मेरा दोस्त 
चक्की की आवाज के बीच स्वतंत्रता से 
बात कर सकते हैं बिना किसी डर और 
झिझक के 
उनके और उनकी देह के बारे में !
अभावों से उनका सतत संघर्ष उनकी  रचनाओं में  मुखर हैं  ! सामाजिक विषमताओं से जूझते एक  आम आदमी की चीत्कार उनकी हर रचना में दिखाई देती है ! "छोकरा " "मैंने सोंचा " "कल रात" सोंचने को मजबूर कर देती हैं !
इस पुस्तक को पढ़कर राजेश उत्साही के प्रति श्रद्धा बढ़ी है !
इस शारदा पुत्र के सम्मान में, इस लेख को लिख कर, अपने आपको धन्य मान रहा हूँ !

Thursday, April 19, 2012

हम विदा हो जाएँ तो ...-सतीश सक्सेना

एक फ़िल्मी गीत, जो बचपन से सबसे अधिक पसंद है, आज बार बार सुना !  "सदियों जहान में हो चर्चा हमारा " अक्सर याद आता रहा है ! जीवन में कुछ ऐसा करने की तमन्ना रही है जो कोई और न कर सका हो , कुछ ऐसा, जो दूसरों के लिए किया जाए , मानवता के लिए उदाहरण बनें !
अपने लिए भरपूर जीना ,और खुश रहना, कोई जीना नहीं हुआ !
मृत्यु बाद, गैर भी रोयें और कहें कि  इस इंसान की अभी आवश्यकता थी , तब  जीना सफल माना जाये !  
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एक तड़प सी उठती रही 
अक्सर हमारी सांस से ,
जब तक रहेंगे हम यहाँ 
कुछ काम होंगे,शान से !
गीत कुछ,ऐसे रचें जाएँ ,
जो सब के मन बसें  !  
हम विदा हो जाएँ तो, पदचिन्ह रहने चाहिए !

बात तो तब है कि वे  
जगते रहे हों रात से !
और दरवाजे सजे हों 
प्यार, बंदनवार  से  !
आहटें पैरों की सुनकर,
साज़ भी थम जाएँ जब, 
देखकर हमको वहां , कुछ ढोल बजने चाहिए  !

हम जहाँ से गुजर जाएँ ,
महक जाएँ बस्तियां ,
हम जहां  ठहरें , वहां 
आबाद होगीं वादियाँ 
मेरे जगने पर सुनें, 
सब चहकना संसार का ,
और  जाने पर मेरे ,आंसू  छलकने चाहिए !

बात होगी खास , जब 
मरने पर मेरे ,दोस्तों 
रंजिशों को आके खुद   
आंसू बहाना चाहिए  !
अंत से पहले प्रभू  से , 
शक्ति इतनी चाहिए  !
द्वार से याचक, न खाली हाथ, जाने चाहिए !

गीत चाहें हों , अधूरे ,
गंध कस्तूरी की हो !  
आधी गागर, गीत की    , 
पर रागिनी भरपूरहो !
धीरे धीरे गीत मेरे, 
होठों  पर आ जायेंगे !
हम रहें या ना रहें ,ये गीत रहने चाहिए !

http://www.janwani.in/Details.aspx?id=35019&boxid=30276632&eddate=2/23/2014


Wednesday, April 18, 2012

नवगीत -सतीश सक्सेना


यह गीत नवजवानों के लिए लिखा गया  है , उन बच्चों  के लिए समर्पित है जो सीमाओं ,बंधन से मुक्त हैं ! निश्छल हंसी, और सीने में कुछ करने का अरमान लिए ,इन नवजवानों के रास्ते में आयीं, सारी बाधाएं दूर हों तब समाज और देश का भला हो ! 

हर देश के विकास और जागरूकता के लिए, गुणवान नवजवानों की जरूरत पर, जोर दिया जाता है !  संयुक राष्ट्र संघ ने भी युवकों में विकास हेतु ३ प्रमुख उद्देश्य निर्धारित किये हैं ! युवकों से जागरूक,संगठित तथा व्यस्त रखने के साथ साथ ,अपनी संस्कृति और पुरानी पीढ़ी के साथ उचित तालमेल रखने को  आवश्यक बताया है !
अगर देश में  नौजवान जागरूक और अवसाद मुक्त है तो देश का भविष्य भी उत्कृष्ट और सुरक्षित है ! देश के भावी कर्णधारों में कुंठाएं न आ पाए यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेवारी है !
श्रेष्ठ विश्व सरकारें, उनके नवजवानों में उत्कृष्टता बनाये रखने के लिए  प्रयत्नशील रहती हैं और फलस्वरूप वे देश विश्व सिरमौर बनने में कामयाब रहे हैं !  

ये बच्चे आसमान  छुएं ....यही कामना है !


कोई रंज नहीं 
कोई मैल नहीं 
यारों के दिल  
कोई गम नहीं 

जब वे रोकें ....
रफ़्तार बढे ...
तोड़ें बंधन  ...
फिर झूम उठें  ....

विश्वास रखें  ...
महसूस  करें ....
हुंकार उठे  ...
तबला बाजे ...

गुस्से में जब 
अंगार उठें ....
तब तार कसें ...
झंकार उठे ...

जब उठते हम 
अरमान जगें ..
जब चलते हैं 
धरती हिलती ...


बस मन में है 
अरमान  यही 
सब मस्त रहें 
अरमान फलें 

Tuesday, April 17, 2012

हम रंग जमा दें दुनिया में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

कुछ रंग नहीं, कुछ माल नहीं
कुछ मस्ती वाली बात नही,
कुछ खर्च करो, कुछ ऐश करो
कुछ डांस करें, कुछ हो जाए !
यदि मौज नहीं कोई धूम नहीं,हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


क्या कहते हो ? क्या करते हो
है ध्यान कहाँ ?कुछ पता नहीं
ना टाफी है, ना चाकलेट ,
ना रसगुल्ला, ना बर्गर है !
हम मस्त कलंदर धरती के, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


रंगीन हैं हम, दमदार हैं हम
मस्ती में नम्बरदार, हैं हम
यह समय बताएगा सबको
पढने में तीरंदाज़ हैं हम ,
हम नौनिहाल इस धरती के, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


हम धूम धाम, तुम टाँय टाँय
हम बम गोले,तुम कांय कांय
हम नयी उमर की नयी फसल
तुम घिसी पिटी भाषण बाजी
हम आसमान के पंछी हैं , हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


ना गुलछर्रे, ना हो हल्ला,
हम धूमधाम,तुम सन्नाटा
हम छक्के हैं तेंदुलकर के ,
तुम वही पुराना नजराना 
हम रंग जमा दें दुनिया में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


हम लड्डू हैं तुम हरा साग ,
हम चाकलेट तुम भिन्डी हो
हम मक्खन हैं,तुम घासलेट 
हम रंग रुपहले,तुम कालिख 
हम मस्ती मारें इस जग में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

Monday, April 16, 2012

वीणा के टूटे तारों में, झंकार जगाने निकला हूँ -सतीश सक्सेना

क्यों यहाँ अकेले बैठे हो , 
क्यों खुद से बातें करते हो 
ऐसी भी क्यों बेरुखी रहे 
गैरों सी, बाते करते हो !
इस बार पकड़ना हाथ जरा 
मजबूती से, साथी मेरे  !
घनघोर अँधेरी रात मध्य मैं चाँद को लाने निकला हूँ !

रास्ता दुष्कर,बाधा अनगिन 
विधि ने साँसे,  दी गिनी हुई ,
अंजलि भर जल से क्या होगा  
प्यासे की सांसें, छिनी हुई  ! 
चुक जाए समय,अजमाने में,
ऑंखें खोलो, विश्वास रहे !  
मंजिल है कोसों दूर मेरी, संजीवनि   लाने निकला हूँ  !


हर कष्ट सहा तुमने मेरा ,
हर रोज विदाई दी हंसकर
कष्टों में सारी रात जगीं ,
मेरे गीत सुनाये गा गाकर 
मेरे दर्दीले जीवन का , 
हर गीत तुम्हारे नाम हुआ !
अगले जन्मों में साथ रहे,नटराज मनाने निकला हूँ !

क्यों सृष्टि का उपहास करें ,
क्यों न जीवन से प्यार करें 
आओ जीवन में रंग भरें ,
नीरसता  को रंगीन करें  !
तबले में कोई ताल नहीं, 
मैं धनक उठाने निकला हूँ ! 
वीणा के  टूटे   तारों  से , झंकार जगाने निकला हूँ  !

Friday, April 13, 2012

मंदिर के द्वारे बचपन से , हम गुस्सा होकर बैठे हैं ! -सतीश सक्सेना

हम कैसे तुम्हें भुला पाएं
माँ जन्मे कोख तुम्हारी से
जो दूध पिलाया बचपन में ,
कैसे ऋण चुके, उधारी से
जबसे तेरा आँचल छूटा,

हम हँसना अम्मा भूल गए !
हम अब भी आंसू भरे , तुझे टकटकी लगाए बैठे हैं !

कैसे अपनों ने घात किया ?

किसने ये जख्म,लगाये हैं !
कैसें टूटे , रिश्ते -नाते ,
कैसे , ये दर्द छिपाए हैं ?
कैसे तेरे बिन  दिन बीते, 

यह तुझे बताने का दिल है !
ममता मिलने की चाह लिए,बस आस लगाये बैठे हैं !

बचपन में जब मंदिर जाता ,
कितना शिवजी से लड़ता था ?
छीने क्यों तुमने माँ, पापा
भोले से नफरत करता था !
क्यों मेरा मस्तक झुके वहां,

जिसने माँ की ऊँगली छीनी !
मंदिर के द्वारे बचपन से , हम गुस्सा  होकर  बैठे  हैं !

इक दिन सपने में तुम जैसी,
कुछ देर बैठकर चली गयी ,
हम पूरी रात जाग कर माँ ,
बस तुझे याद कर रोये थे !
इस दुनिया से लड़ते लड़ते , 

तेरा बेटा थक कर चूर हुआ !
तेरी गोद में सर रख सो जाएँ, इस चाह को लेकर बैठे हैं !

एक दिन ईश्वर से छुट्टी ले
कुछ साथ बिताने आ जाओ
एक दिन बेटे की चोटों को
खुद अपने आप देख जाओ
कैसे लोगों संग दिन बीते ? 
यह तुम्हें   बताने बैठे  हैं !
हम आँख में आंसू भरे, तुझे कुछ याद दिलाने बैठे हैं !

Thursday, April 12, 2012

प्रेम अभिव्यक्ति कराता कौन ? -सतीश सक्सेना

एक काफी समय पहले लिखा गीत को दुबारा प्रस्तुत कर रहा हूँ ....आनंद लीजिये !
शीतल मनभावन पवन बहे
बादल चहुँ ओर उमड़ते हैं 
जिस ओर उठाऊँ द्रष्टि वहीं
हरियाली चादर फैली है ,
मन में उठता है प्रश्न, पवन लहराने वाला कौन ?
बादलों के सीने को चीर बूँद बरसाने वाला कौन?


कल कल छल छल जलधार
बहे, ऊँचे शैलों की चोटी से
आकाश चूमते वृक्ष लदे
हैं , रंग बिरंगे फूलों से ,
हर बार रंगों की चादर से, ढक जाने वाला कौन ?
धरा को बार बार रंगीन बना कर जाने वाला कौन ?


चिडियों का यह कलरव वृन्दन 
कोयल की मीठी , कुहू कुहू ,
बादल का यह गंभीर गर्जन ,
वर्षा ऋतु की रिमझिम रिमझिम
हर मौसम की रागिनी अलग,सृजनाने वाला कौन ?
मेघ को देख घने वन में मयूर नचवाने वाला कौन ?

अमावस की काली रातें ,
ह्रदय में भय उपजाती क्यों ?
चाँदनी की शीतल रातें
प्रेमियों को भाती हैं क्यों
देख कर उगता पूरा चाँद , कल्पना शक्ति बढाता कौन ?
चाँद को देख ह्रदय में कवि के,मीठे भाव जगाता कौन ?


कामिनी की मनहर मुस्कान
झुकी नज़रों के तिरछे वार
बिखेरे नाज़ुक कटि पर केश
प्रेम अनुभूति जगाये, वेश ,
लक्ष्य पर पड़ती मीठी मार, रूप आसक्ति बढाता कौन ?
देखि रूपसि का योवन भार प्रेम अभिव्यक्ति कराता कौन ?

Sunday, April 8, 2012

हम लोग - सतीश सक्सेना

पुरानी पीढ़ी, अपने जमाने की सीखी सारी परम्पराएं, इन घबराई हुई लड़कियों (नव वधुओं) पर निर्ममता के साथ लादने की दोषी है ! मैंने कई जगह प्रतिष्ठित ओहदों पर बैठे लोगों के सामने भी, यह परम्पराएं होती देखीं हैं ! इन परम्पराओं के जरिये बहू को "शालीनता" के साथ बड़ों का "सम्मान" करना सिखाया जाता है ! कॉन्वेंट एजुकेटेड इंजिनियर और मैनेजर बहू, घूंघट काढ कर, बैठी रहे ...थकी होने पर भी, सास ननद को काम न करने दे आदि आदि...

और अफ़सोस यह है कि शालीनता के पाठ को पढ़ाने में उस घर की महिलायें सबसे आगे होती हैं ऐसा करते समय उन्हें अपनी बेटी की याद नहीं रहती जिसे यही पाठ जबरदस्ती दूसरे घर पढाया जाना है !

              अपनी बच्ची के आंसू और घुटन महसूस होते हैं मगर दूसरों की बच्ची के आंसू हमें अपने नहीं लगते, २० साल बाद इसी गैर बच्ची (आज की नव वधु) से, जो उस समय, घर की शासक होती है, हम प्यार और सहारे की उम्मीद करते हैं !  

हमें अपने घर में विरोध करना आना चाहिए .... 

Friday, April 6, 2012

स्वप्न रहस्य -सतीश सक्सेना

अली सय्यद सर  से आज फोन पर बात करते हुए उनके नए लेख की  चर्चा हुई जिसमें उन्होंने किशोरावस्था में किसी विदेशी लड़की को स्वप्न में  देखा था और उसका चेहरा मोहरा और आकृति आज भी उन्हें याद है ! समाज वैज्ञानिक अली जैसे विद्वान् के लिए भी यह गुत्थी पहेली जैसी है जिसका जवाब वह आज तक  नहीं खोज पाए हैं , और इस लेख के जरिये, पाठकों से उत्तर की अपेक्षा की है  !


ठीक ऐसी ही एक घटना मेरे साथ भी जुडी है जो मैं प्रबुद्ध पाठकों  के साथ बांटना चाहता हूँ !
१९७५  के आसपास की बात है , लगभग सुबह के चार बजे एक स्वप्न देखा था कि चारो और रुपयों की गड्डियाँ बिखरी हैं , और मैं उन्हें समेट रहा हूँ  ! एक किशोर को रुपयों का स्वप्न किसी भी  तरह असाधारण नहीं कहा जा सकता है मगर जो इस स्वप्न में असाधारण था वह हर गड्डी के ऊपर  एक अंक का लिखा होना और वह अंक  १००३०  बेहद स्पष्ट था ! यह सपना देख मैं जग गया था मगर थोड़ी देर बाद, फिर सोने के बाद, वही सपना  दुबारा  आया , फिर नोटों की गड्डियाँ और वही अंक १००३० , इस बार जागने पर मैंने वह अंक लिख लिया ताकि भूल न जाऊं  !

इस घटना के कुछ माह बाद, बाज़ार में नवभारत टाइम्स का वार्षिकांक १९७६ प्रकाशित हुआ  जिसमें  "स्वप्नों का अद्भुत संसार " नामक लेख में, एक वर्णन हालैंड के एक किसान का था जिसने सपने में कई बार "३६८४ " अंक देखा था, परेशान होकर वह आधी रात को बिस्तर से उठ बैठा ! कुछ समय बाद वह स्टेट लाटरी का इसी नंबर का टिकट खरीद लाया और उसी वर्ष मार्च १९४८ में उसे स्टेट लाटरी का पहला इनाम मिला ! उस लाटरी टिकट का नंबर वही था जो उसने स्वप्न में देखा था !


यह सब पढ़कर मैं वाकई रोमांचित था, वह स्वप्न इतना साफ़ एवं असरदार था की ऐसी असामान्य बातों को सिरे से खारिज करने वाला मैं आज भी यह विश्वास करता हूँ कि जब भी यह अंक मेरे जीवन से जुड़ेगा मुझे असामान्य धन लाभ होगा :-))


इस घटना के कुछ वर्ष बाद बरेली रेलवे स्टेशन  से बदायूं के लिए रेलगाड़ी  पर बैठा था  अचानक सामने के प्लेटफार्म पर खड़ी  ट्रेन के एक  कम्पार्टमेंट पर नज़र पड़ी , उस डिब्बे पर कम्पार्टमेंट नंबर १००२९ अंक लिखा देखा और मैंने अपनी चलती ट्रेन से छलांग लगा दी कि १००३० नंबर का डिब्बा, जरूर इस गाडी में होगा मगर साथ के कई और अंकों के बावजूद १००३०  नहीं मिला  हालाँकि इसे ढूँढने में मेरी वह ट्रेन चली गयी !


मैंने कभी लाटरी नहीं खरीदी मगर इस नंबर के लिए मैं मोहन सिंह पैलेस, दिल्ली गया था , जहाँ लाटरी का सेंटर था ! उसमें सबसे बड़े डीलर से बात करने पर मुझे आश्वासन मिला कि यह टिकट अगले हफ्ते आकर ले जाएँ मगर वह टिकट संख्या नहीं मिल सकी !


तेरी सूरत की किसी से नहीं मिलती सूरत 
हम जहाँ में तेरी तस्वीर , लिए फिरते हैं  !


एक और स्वप्न की चर्चा कर रहा हूँ, जिसके टूटते ही , सोते से उठ कर , एक गीत की रचना की थी , वह गीत "मुक्ता " में छप चुका है !


स्वप्न में आयीं वामा सी
स्नेहमयी तुम कौन हो ?
प्रबुद्ध पाठकों से अनुरोध है  कि  इस अछूते रहस्यमय  विषय  पर  अपने विचार व्यक्त अवश्य  करें  ...
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