Monday, June 27, 2011

परिवार में विषबेल बोते हम लोग - सतीश सक्सेना

मानव कुल में रहते हम लोग, शायद अपने सांस्कृतिक पारिवारिक गुणों को भूलते जा रहे हैं ! पीढ़ियों से चलता आया परस्पर पारिवारिक स्नेह, आज न  केवल  दुर्लभ नज़र आता है , बल्कि  एक चालाकी और चतुरता का भाव अवश्य सब जगह नज़र आता है , जिसके चलते हम लोग एक दूसरे के प्यार पर शक करते हुए भी, साथ रहने को बाध्य होते हैं !

पारिवारिक व्यवस्था में सबसे पहले बहू का स्थान आता है , यह नवोदित लड़की, आने वाले समय में इस घर की मालकिन होगी इस तथ्य को लोग कभी याद ही नहीं करना चाहते न कोई उसे यह अहसास दिलाता  है कि वह घर में प्रथम सदस्य का दर्ज़ा महसूस कर सके ! छोटे छोटे फैसले लेते समय भी, वह बच्ची अपनी सास अथवा पति के मुँह देखने को मजबूर रहती है और अक्सर परिवार के लोग इस बात पर खुश होते हैं कि बहू आज्ञाकारी मिली है ! शुरुआत के दिनों में, अपने ही घर में कोई निर्णय न ले सकने की, उस घुटन का अहसास, करने का कोई प्रयत्न नहीं करता ! समय के साथ ,अपने मन को अभिव्यक्त न कर पाने की तड़प, न चाहते हुए भी उस बच्ची को इस नए परिवार से दूरी बनाये रखने को, पर्याप्त आधार देने के लिए, काफी होती है  ! 

इस प्रकार एक अनचाहा  कड़वा बीज, घर के आँगन में कब लग गया, कोई नहीं जान पाता और हम लोग समय समय पर, अनजाने में, इसे खाद पानी और देते रहते हैं !

जहाँ तक माँ बाप का सवाल है वे अपनी ही असुरक्षा में घिरे रहते हैं ! अपनी ही औलाद से, अपनी जीवन भर की कमाई को, पढ़ाई लिखाई और बच्चों की परिवरिश पर खर्च हो चुकी, बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते ! उन्हें अक्सर यह लगता है कि बच्चों ने अगर बुढापे में मदद न की तो क्या होगा ? अतः अपनी शेष जमापूंजी आदि बच्चों की नज़र से दूर ही रखा जाए तभी अच्छा होगा ! उनकी यह समझ और झूठ , बच्चों को पता लगते अधिक देर नहीं लगती ! अपने ही बड़ों द्वारा, उन पर विश्वास न किये जाने पर, रिश्तों में ठहराव और एक बड़ी दरार आना स्वाभाविक हो जाता है ! 

अक्सर  अपनी असुरक्षा की भावना लिए, बड़ों की यह बेईमानी, उस परिवार में अपनों के प्रति शक के माहौल को पैदा करने में, बड़ी भूमिका निभाती है एवं अनजाने में एक भयंकर विष बीज और रोप दिया जाता है ! जहाँ ममता, स्नेह और सुनहरे भविष्य का मज़बूत आधार, परस्पर मिलकर तैयार किया जाना चाहिए वहीँ शक और शिकायतों का एक मजबूत आधार बन जाता है !   

मुझे याद आता है ,मेरे एक सीधे साधे साथी के रिटायरमेंट पार्टी पर, उनकी पत्नी तथा बच्चों ने मुझसे आखिरी चेक की रकम फुसफुसाते हुए जाननी चाही  और साथ ही यह भी कि उनके पति, को इस बारे में न बताया जाए , तो मैं  निशब्द रह गया !


पुत्री सबसे अधिक अपने परिवार से जुडी होती है ! कुछ समय बाद अपने घर से दूर हो जाने का भय उसे अपने परिवार के प्रति और भी भावुक बना देता है ! अनजाने में सबसे अधिक अन्याय इसी के साथ किया जाता है, अपने घर में भी और नए घर में भी ! अफ़सोस है कि उसकी माँ भी उसे यह अहसास दिलाने में आगे रहती है कि यह घर उसके भाई का है जबकि अधिकतर लड़कियां अपने भाई के लिए कुछ भी देने के लिए तैयार रहती हैं ! अगर भावनात्मक तौर पर ही भाई और माँ उसे स्नेह का विश्वास दिला दें तो शायद ही कोई लड़की अपने आपको अकेला महसूस करे  !


हर भाई को अपनी बहिन से स्नेह चाहिए मगर हर बार हम भूल जाते हैं कि परिवार वृक्ष  की यह सबसे सुन्दर टहनी ही सबसे कमजोर होती है और वह जीवन भर अपने पिता और भाई से प्यार की आशा लगाए रहती है ! और हम ...??
आइये, पूंछे अपने दिल से   !


( यह लेख दैनिक जागरण में दैनिक जागरण में ७ जुलाई २०११ को छपा है )

Monday, June 20, 2011

काश ऐसे लोग न मिलते .....

भौतिक सुविधाओं के हम किस कदर गुलाम हैं कि शायद कभी सोंचते ही नहीं कि अभी कितनी साँसे और बाकी है  ?? बस याद रहता है कि मरते मरते भी कुछ सुविधाएँ और लूट लें  और यह साधन जुटाने के लिए जितना गिरना पड़े .....गिरने को तैयार रहते हैं ! 
...एक पल भी नहीं सोंचते हैं कि कोई है  जो हमें देख रहा है  !
...एक पल भी नहीं सोंचते कि उसके दरवार में माफ़ी नहीं 
...सजा यहीं मिलेगी  !!
काश ऐसे लोग न मिलते .....

Monday, June 6, 2011

लेखन अमर होता है - सतीश सक्सेना

                    ब्लॉग लेखन एक ऐसी क्रांति है, जिसकी कुछ वर्षों पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी ! इस प्लेटफार्म के  आने से कितने ही प्रतिभाशाली लेखक, समाज में अपनी सफल उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब हुए हैं ! हिंदी जगत को, जो आसान रास्ता गूगल ने, अपने बलबूते पर, आसानी से उपलब्ध करा दिया शायद यह  काम किसी भी व्यवस्था के लिए एक बेहद कठिन और दुष्कर रास्ता साबित होता ! कम से कम मैं गूगल  का आभारी हूँ कि इसके जरिये न केवल अपनी अभिव्यक्तियों को साकार कर सका अपितु बहुत सारे बेहतरीन लोगों के सामने, अपने आपको पेश कर सकने में भी कामयाब हुआ !

                 लेखन अमर होता है ! एक बार लिखे गए शब्द, सुदूर क्षेत्रों में भी आज आसानी से पढ़े जाने के लिए उपलब्द्ध हैं और कालांतर में, स्मृतियों में जीवित रहते हुए पीढ़ियों यात्रा करने में सक्षम हैं !पाठक समूह रूचि, बुद्धि  और परम्परा अनुसार अपने अपने अर्थ लगाकार इन्हें अपनी स्मृतियों में सहेजे रहते हैं !

                       किसी भी लेखक को ,अपने श्रद्धालु पाठक से अपार सम्मान पाना, कोई चौंकाने वाली  बात नहीं है और हमारे परिवेश में, जहाँ अक्षरों को विद्या मानते हुए पूजा जाता है वहां लेखक को मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करना कोई असाधारण बात नहीं है ! अधिकतर साधारण मगर बेईमान लेखक अपने पाठकों की श्रद्धा की बदौलत , आसमान  को शिक्षा देते देखे जाते हैं ! अफ़सोस है कि प्रभावित श्रद्धालु , अपनी निश्छल श्रद्धा के कारण, अपने परिवार तक को हमेशा के लिए , इन चालाक शिकारियों का शिष्य बना देता है ! इस समय देश में ऐसे गुरुओं की कोई कमी नहीं है !
     
                  देश और समाज के प्रति प्रतिबद्धता को याद रखते हुए लिखे गए ईमानदार लेखन का लोग सम्मान करते हैं, यदि इस प्रकार के लेखन में व्यक्तिगत राजनैतिक प्रतिबद्धता को अलग रखा जाये , तो लेखक के  विचार, पाठकों के ह्रदय को छू लेने में, अक्सर कामयाब होते हैं !

                   समाज के लिए अहितकर एवं खराब लिखते समय हमें याद रखना चाहिए कि हमारे यह लेख, एक दिन हमारे बच्चे और परिवार जन भी पढेंगे  और तात्कालिक जोश में लिखे गए, कुछ लेख ही, हमारे व्यक्तित्व  का विस्तृत परिचय देने के लिए काफी होते हैं  !

आइये इसी परिप्रेक्ष्य में पंकज उधास की एक ग़ज़ल सुने , विडियो यू टयूब  से  साभार !
तुझे देखकर सब मुझे जान लेंगे .... 

अनुरोध  : आपके आने का आभार ...आगे से, मेरे गीत पर कमेन्ट न करने का अनुरोध है , आशा है मान रखेंगे  !   

Saturday, June 4, 2011

वे आँखें - सतीश सक्सेना

यह दर्द उठा क्यों दिल से है 
यह याद कहाँ की आई है  !
लगता है कोई चुपके से 
दस्तक दे रहा चेतना की 
वे भूले दिन बिसरी यादें ,
क्यों मुझे चुभें शूलों जैसी ! 
लगता कोई अपराध मुझे, है याद दिलाये करमों की !

रजनीगंधा सी सुन्दरता 
फूलों की गंध  उठे  ऐसे 
उन भूली बिसरी यादों से 
ये गीत सजे अरमानों के 
मैं कभी सोंचता क्यों मुझको,
संतोष,  नहीं है जीवन में  !
यह क्यों उठती अतृप्त भूख,सूनापन सा इस जीवन में !

लगता है, जैसे इंगित कर 
है ,मुझको याद करे कोई !
लगता ,कोई हर समय मेरी 
भूलों पर , रोता है   जैसे  !
वे कोई भरी भरी आँखें , 
यादों से जुडी हुई ऐसे  !
दिल में कैसा भी दर्द उठे, सम्मुख जीवित होती आँखें !  


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