Monday, January 31, 2011

हर लंगड़ा तैमूर दिखाई देता है -सतीश सक्सेना

सदियाँ गुज़री लेकिन तुमको दहशत
में , हर लंगड़ा तैमूर दिखाई देता है !

धोखा पहले पाप बताया जाता था
लेकिन अब दस्तूर दिखाई देता है !


सरवत जमाल  साहब के यह शेर हमारी असलियत बयान कर देते हैं ! शक और नासमझी की वदौलत हमारे अपने परिवार और प्यारे रिश्तों में पड़ी दरारें साफ़ नज़र आती हैं सिर्फ दिखावे के लिए आवरण डालकर एक दूसरे को सम्मान देते नज़र आते हैं ! बरसों बीत जाने के बाद भी  परिवारों की रंजिशें बरकरार हैं ! 
बरसों  पहले एक लंगड़े तैमूर ने जो जुल्म ढाया था  उसके निशान आज भी बाकी हैं ! मगर अगर उस भय को सीने में लिए, तैमूर के भूत से आज भी दहशतजदा होने को, सिवाय कायरता के और क्या कहा जाएगा ! परस्पर बढ़ते हुए अविश्वास के फलस्वरूप जो रंजिश नज़र आती है कई बार दिलों को छील कर रख देती है ! दोनों अपनी जगह पर ईमानदार हैं , दोनों बेहतरीन भी हैं  मगर एक दूसरे पर शक के गहराते बादलों के कारण, उत्पन्न संवाद हीनता ने स्थिति और बिगाड़ दी है !
अपने अपने खेमों में, तलवारों पर धार लगाते हम लोग, अपनी अपनी रक्षा की जुगत में , स्नेह लगभग भूल ही गए हैं ! कैसे समझेंगे हम कि एक गुनाहगार के कारण सारा परिवार बुरा नहीं होता है ! आपस की लड़ाई में ,दूसरों की गलतियाँ निकालते हम लोग,  अक्सर यह याद नहीं रख पाते कि हम दूसरों को नीचा दिखाने के लिए झूठ बोल रहे हैं और अनजाने में झूठ बोलने की शिक्षा अपने ही बच्चों को दे देते हैं !!    
बड़ी से बड़ी गलतफहमियां और झगडे बात करने से निपटाए जा सकते हैं !मगर पहल करना, हर पक्ष को अपमानजनक लगता है ! ऐसी विकट स्थिति में अपने पुराने प्यार को याद करें और बेझिझक पहल करें तो चेहरों पर मुस्कान आते देर  नहीं लगेगी !

Wednesday, January 26, 2011

कम ब्लागिंग -सतीश सक्सेना

मेरा विचार है कि अगर आपके पास समय है, तो व्यस्त रहने के लिए, ब्लागिंग से बेहतरीन और कुछ नहीं ! एक से एक बेहतरीन लोग यहाँ उपस्थित हैं जिनसे आप बहुत कुछ सीख सकते हैं !टिप्पणियों लेते और देते , कब एक दूसरे के नज़दीक होते चले जाते हैं पता ही नहीं चलता !

इस ब्लॉग परिवार में आपस में बढ़ते स्नेह के कारण मित्रों की अपेक्षाएं बढ़ना स्वाभाविक हैं ! फलस्वरूप ई मेल में अधिकतर, उनके लिखे लेखों पर, टिप्पणी करने के अनुरोध रहते हैं जिन्हें समयाभाव के कारण ,पूरा करना लगभग असंभव हो जाता है !

एक लती ब्लागर अमूमन ४ -६ घंटे रोज कम्पयूटर पर देता है और रोज इतना समय, एक व्यक्ति के लिए देना, आँखों और स्पाइनल कार्ड  को बीमार करने के लिए काफी होता है  :-(
अतः नए साल से एक निश्चय किया है कि सप्ताह में एक लेख से अधिक लिखने से बचूंगा  ! शायद अधूरे काम  आसानी से निपटा पाऊंगा  !

हालाँकि आदतें छोड़ना आसान नहीं होता..."कैफ" भोपाली का एक शेर है ..
आग का क्या है,पल दो पल में लगती है !
बुझते  बुझते, एक  ज़माना  लगता  है  !

आप सबको शुभकामनायें ! 

Wednesday, January 19, 2011

माँ - सतीश सक्सेना

कुछ समय पहले माँ की मर्ज़ी के बिना इस घर का पत्ता भी नहीं हिलता था, अक्सर उनकी एक हाँ से, कितनी बार हमारे जीवन में खुशियों का अम्बार लगा मगर धीरे धीरे उनकी शक्तिया और उन शक्तियों का महत्व कम होते होते आज नगण्य हो गया !
 अब अम्मा से उनकी जरूरतों के बारे में कोई नहीं पूछता, सब अपने अपने में व्यस्त है, खुशियों के मौकों और पार्टी आयोजनों से भी अम्मा को खांसी खखार के कारण दूर ही रखा जाता है ! 
बाहर डिनर पर न ले जाने का कारण भी हम सबको पता हैं..... कुछ खा तो पायेगी नहीं अतः होटल में एक और प्लेट का भारी भरकम बिल क्यों दिया जाये, और फिर घर पर भी तो कोई चाहिए ... 
और परिवार के मॉल जाते समय, धीमे धीमे दरवाजा बंद करने आती माँ की आँखों में छलछलाये आंसू कोई नहीं देख पाता !

Monday, January 17, 2011

ब्लाग प्रकाशन, भारतीय कानून एवं सजा - सतीश सक्सेना

                 ब्लॉग जगत में आजकल लेखन के नाम पर, सबसे अच्छा विषय, अपने स्वयंनिर्मित प्रभामंडल को और विस्तार देने के लिए, किसी के प्रति अपशब्द और कड़वाहट भरे शब्द लिखना रह गया है जिससे आसपास भीड़ इकट्ठी होती रहे और डुगडुगी बजती रहे ! अफ़सोस है कि ऐसी बातों का विरोध करना तो दूर लोग नापसंद करते हुए भी, तालियाँ बजाने को मजबूर किये जाते हैं ! और तालियाँ खूब बजती हैं ....

मुन्ना भाइयों पर.....
मुन्नी बाइयों पर ....

                 इन तालियों से ताकत पाकर यह भाई लोग और बाईयां सारे समाज को नपुंसक मानने में देर नहीं लगाते हैं और फलस्वरूप अगले दिन और ऊंचे बांस पर चढ़ कर करतब दिखाते हैं और किसी भी निर्दोष को सूली पर चढ़ा पब्लिक को दिखाते हैं और हम सब हिंदी ब्लागर तालियाँ बजाते रहते हैं !

                अगर हम जिम्मेवार समाज का हिस्सा हैं तो ऐसी हरकतों को रोकना ही चाहिए इसका विरोध करने के लिए मैं कानून के जानकारों से सलाह आमंत्रित कर रहा हूँ  !

                -मैं चाहता हूँ कि वकीलों का एक पैनल बनाया जाए जो भारतीय प्रावधानों के अंतर्गत ऐसे लोगों के विरुद्ध शिकायत मिलने पर, स्वचालित नोटिस देते हुए ऐसे व्यक्ति को कटघरे में खड़े करने की कार्यवाही शुरू करे जो व्यक्तिगत लांछन लगाने के दोषी पाए जाएँ ! मुझे भरोसा है कि पहले १० केस होते ही ऐसे लोगों का नशा उतर जाएगा जो  बेनामी या सुनामी बनकर रोज केवल ताल ठोंकने का काम ही करते हैं !
                  जो भी लोग आज के बाद, भारतीय कानूनों के प्रावधान के तहत, ऐसे लोगों को सूची बद्ध करते हुए आरोपित करेंगे और कोर्ट में कार्यवाही  करेंगे  ! उसके लिए एक सार्वजनिक फंड तैयार करने के लिए मैं प्रतिवद्ध हूँ ! जिसकी मदद से ऐसे दोषियों को सजा दिलाने की ठोस कार्यवाही भारतीय न्यायालय में शुरू की जाए ! इसके लिए ५ लोगों की कमेटी बनाने का विचार है जो इससे जुड़े फैसले लेगी !
                  
                   मैं उन समस्त लोगों से सुझाव आमंत्रित कर रहा हूँ जो बिना किसी के प्रति रंजिश की भावना को लेकर समाज के प्रति दायित्व की भावना रखते हों और स्वेच्छा से आगे आने को तत्पर हों ! इस लेख का तात्पर्य आपसे और कोई मदद मांगना नहीं है मेरा यह विश्वास है कि किसी अच्छे कार्य करने की पहल करने के लिए, केवल मात्र दृढ  संकल्प की आवश्यकता होती है और वह मुझमें पर्याप्त है !
कोर्ट और एडवोकेट के खर्चे की परवाह नहीं है .......समाज के कार्यों के लिए एक मज़बूत ट्रस्ट और उसके लिए प्रतिबद्ध साथी हैं मेरे पास !  
                  इसमें गलतियाँ क्या होंगी ? कहीं कोई भूल न हो जाये इसीलिए विचार आमंत्रित हैं !

Sunday, January 16, 2011

मेरे मरने के बाद ...- सतीश सक्सेना

कभी सोचा आपने कि हमारे जाने के बाद क्या फर्क आएगा हमारे परिवार में ....कुछ ऐसा काम कर चलें जिससे कुछ यादें दर्ज हो जाएँ हमेशा के लिए, जो हमारे अपनों को सुख दे पायें ! आज मैं याद करना चाहता हूँ अपने उन प्यारों को, जिन्होंने मुझे खड़ा करने में मदद की !
  • सबसे पहले उन्हें, जिन्होंने मुझे उंगली पकड़ के चलना सिखाया , अगर वे हाथ मुझे सहारा न देते तो शायद मेरा अस्तित्व और यह भरा पूरा परिवार और मुझे चाहने वाले , कोई भी न होते ! उनमें से कुछ हैं और कुछ मेरी  अथवा परिवार की लापरवाही के कारण, समय से पहले, छोड़ कर चले गए  ! शायद समय रहते उनकी अस्वस्थता पर उचित ध्यान दिया जाता तो वे अभी हम लोगों के साथ होते !  इन बड़ों के साथ, मैं अपने आपको हमेशा स्वार्थी महसूस करता हूँ , उनके साथ ही सबसे कम कर पाया और हमेशा उनका ऋणी ही रहूँगा , उनका कर्जा लेकर मरना मेरी नियति होगी ...
  • इसके बाद वे, जो मेरे अपने नहीं थे , जिनसे कोई रिश्ता नहीं था उसके बावजूद इन "गैरों " ने , जब जब मुझे अकेलापन और अँधेरा महसूस हुआ , मेरा साथ नहीं छोड़ा ! मुझे लगता है पिछले जन्म का कोई रिश्ता रहा होगा, जिसका बदला उन्होंने इस जन्म के कष्टों में, साथ देकर पूरा किया ! निस्वार्थ प्यार और स्नेह का कोई मोल नहीं होता ! जब भी अकेले में, मैं इन प्यारों का दिया संग याद करता हूँ तो आँखों में आंसू छलक आते हैं ...बस यही कीमत अदा कर सकता हूँ इन अपनों की ! और मेरे पास कुछ नहीं इन्हें देने को !      
  • पत्नी को किसी के आगे हाथ न फैलाना  पड़े , आज हमारे दोनों बच्चे बेहतरीन कंपनियों में मैनेजर हैं और अपनी माँ को बहुत प्यार करते हैं ! इतना है उनके पास कि  बचे शेष जीवन में वे इतनी मज़बूत रहें कि उनके आँख में कभी धन की कमी के कारण आंसू  न आ पाए  ! शायद पत्नी की अपेक्षाओं पर उतरना बेहद मुश्किल होता है और मैं भी अपवाद नहीं रहा . जो काम मैं नहीं कर सका उसके  लिए  मैं अपनी अयोग्यता को दोषी ठहराता हूँ  !
  • पिता के जाने के बाद, बेटी अपने को, अधिक असुरक्षित महसूस करती है , एक संतोष है कि अपने दोनों बच्चों के लिए मैंने बराबर किया है !  भाई के बेहद प्यार के बावजूद कही न कहीं  मायके में उसका भविष्य, भाभी के व्यवहार पर निर्भर होता है ! उम्मीद करता हूँ कि मेरा सुयोग्य बेटा अपनी प्यारी बहिन को कभी अकेले  महसूस नहीं होने देगा ! मेरी पुत्री का बेहद मेहनती और स्नेही होना, उसका सुखद भविष्य  सुनिश्चित करने को काफी है ! उसकी बेहतरीन कार्यक्षमता, दिन पर दिन निखरेगी इसका मुझे विश्वास है !  
  • पुत्र में, मैं अपना अंश और व्यवहार पाता हूँ ! चूंकि मैं अपने जीवन से संतुष्ट हूँ सो अपने बेटे पर पूरा विश्वास है कि वह जीवन में अच्छा करेगा और सारे कर्त्तव्य हँसते हुए पूरे करेगा ! मैं जानता हूँ कि मेरे द्वारा पैदा किया गया, शून्य उसे बहुत खलेगा ! कुशाग्रबुद्धि और आत्मविश्वास उसे अपनी कठिनाइयों पर विजय दिलाने में सहायक रहेंगे !              अपनी इच्छाएं सार्वजनिक करने का मतलब ताकि सनद रहे , मेरे न रहने पर, यह मेरे  प्यार का दस्तावेज होगा  उन सबके लिए जो मेरे बाद मेरी कमी महसूस करेंगे !

Saturday, January 15, 2011

मैं चिर-अभिलाषित, ममता का, रंजिश के द्वारे आ पहुँचा ! -सतीश सक्सेना

"मेरे कुछ मित्र मुझे ईश्वर द्रोही, धर्म विरोधी, इस्लाम विरोधी, हिन्दू विरोधी, ईसाई विरोधी आदि आदि न जाने क्या क्या कहते हैं, जबकि असलियत में मैं केवल कुतर्क,अतार्किकता व अवैज्ञानिकता का विरोधी हूँ...जब तक आप कोई तार्किक या समझ आने वाली बात कह रहे हैं...मैं भी आपके साथ हूँ...पर, यदि आप कोई अतार्किक बात कह रहे हैं या ऐसा कुछ कह रहे हैं जिसका हकीकत में कोई अर्थ ही नहीं निकलता...(जब आप कुतर्क कर रहे हों, अवैज्ञानिक या अतार्किक बातें कह रहे हों तो आपकी बातों से कोई भी अर्थ नहीं निकलेगा, यह निश्चित है!)...तो जहाँ तक मुझसे बन पढ़ेगा मैं आपका विरोध करूँगा...और मेरे इस कृत्य के लिये आप मुझे कुछ भी कह सकते हैं ! "


उपरोक्त शब्द चित्र है प्रवीण शाह का, जो मुझे अपने तीखे लेखों से हमेशा आकर्षित करने में सफल रहे हैं ! आज उनकी एक रचना के कुछ भाव मुझे बहुत पसंद आये ! मुझे रचना पढ़ते ऐसा लगा कि जैसे मैं अपने बारे में कह रहा हूँ ! यकीनन हम समान विचारों से प्रभावित होते हैं और क़द्र भी करते हैं ...सो प्रवीण शाह की इस रचना का ,मेरे शब्दों में आनंद लें .....

"मैं हमेशा अपने दिमाग को खुला रखते हुए, अपने समान विचार मित्रों में ही रहना पसंद करता हूँ ! आसपास होते अन्याय का मरते दम तक विरोध करूंगा एवं अपनी सम्पूर्ण ईमानदारी के साथ अपने दिल की आवाज पर कार्य करना पसंद करूंगा !


ईश्वर न करे कि मुझे अपने बेहतरीन ह्रदय के साथ, कभी किसी स्वयम्भू महात्मा की स्तुति गान करना पड़े ! एक दो बार अनजाने में मूर्ख बनने के बाद, परमपिता परमात्मा से इन स्वयम्भू महात्माओं को, ठोकर मारने की शक्ति मांगता हूँ !

ईश्वर शक्ति दे कि मैं समाज में गन्दगी फ़ैलाने वाले , तुच्छ जाहिलों और और विकृत मानसिकता वाले लोगों का विरोध कर सकूं और उन्हें आगे बढ़ने से रोक सकूं !

`
अगर यह गुटबंदी है तो मैं एक गुट बाज हूँ ! 
हँसते हुए प्रवीण शाह एक "बौने दोस्त " को संबोधित कहते हुए कहते हैं अगर यही गुटबाजी है तो मैं गुटवाज हूँ और अपनी सुविधानुसार परिभाषाओं वाला यह शब्द कोष तुझे मुबारक हो ! "
सो आज मैंने भी, प्रवीण शाह के गुट में अपने हस्ताक्षर कर दिए !

मेरी एक रचना की कुछ लाइनें पढ़ें ... 

कुछ यहाँ शिखन्डी भी आए

तलवार चलाते हाथों से,
कुछ धन संचय में रमे हुए,
वरदान शारदा से लेते !,
कुछ पायल,कंगन,झूमर के
गुणगान सुनाते झूम रहे ,
मैं कहाँ आ गया, क्या करने, दिग्भ्रमित बहुत हो जाता हूँ !
अरमान लिए आए थे हम , अब अपनी राहें भूल चले !

कुछ प्रश्न बेतुके से सुनकर
पंडित पोथे, पढने भागें,
कुछ प्रगतिवाद, परिवर्तन
के सम्मोहन में ही डूब गए
कीकर, बबूल उन्मूलन की
सौगंध उठा कर आया था ,
मैं चिर-अभिलाषित, ममता का, रंजिश के द्वारे आ पहुँचा !
ऋग्वेद पढाने आए थे ! पर अपनी शिक्षा भूल चले !! 

Thursday, January 13, 2011

आपातकालीन स्थिति और तमाशबीन भीड़ -सतीश सक्सेना

१९८७, कनाट प्लेस का एक सिनेमा हॉल, शायद  प्लाज़ा  की एक घटना ....
                दो वर्षीया गुडिया को गोद में लेकर, बालकनी में घुस ही रहा था कि अचानक अँधेरे में एक अजीब आवाज और धुआं उठने के साथ साथ शोर,  भागो बम फट गया ...बाहर भागो ...... 
                 और लोग एक दूसरे को धक्का देते हुए, बाहर भागने लगे ! बालकनी के एक कोने से तेज धुआं निकलने से सिनेमा हॉल में आग लगने का अंदेशा , भीड़ को दौड़ाने के लिए काफी था ! 
                  तुरंत फुर्ती से, गुडिया को सबसे अंत की सीट पर बैठा कर,भागते लोगों के विपरीत, मैं धुएं की स्रोत ( भीड़ का बम ) की ओर भागा , मन में यह चिंता थी कि अगर इस सिलेंडर को तुरंत बाहर नहीं फेंका तो हॉल में धुआं भर जाने के कारण , शो रद्द न हो जाए ! अँधेरे और दम घोंटू धुएं में आँखें बंद ,टटोल कर, आखिर जमीन पर गिरा, तेजी के साथ धुआं फेंकता वह सिलेंडर उठा कर बाहर भागा !
                    बाहर खड़ी तमाशबीनों की भीड़, मुझे अपनी ओर भागते देख, मुझे रास्ता देने की वजाय मेरे आगे आगे भागने लगी ! तेज आवाज के साथ धुआं फेंकते इस सिलिंडर को , सीढियों  फलांगते हुए ,जब बाहर खुले में पटका तब गुडिया की याद आयी कि उसे अकेला हाल में बैठा कर आया  हूँ ! 
                    उत्सुक लोगों और तालियाँ  बजाते तमाशबीनो को फिर धक्का देते हुए उसी स्पीड से सीढियाँ चढ़ते हुए हाल में दुबारा पंहुचा तो बुरी तरह हांफ रहा था , मगर बेटी को उसी सीट पर पाकर जान में जान आई ! 
                  अपनी बेटी को लेकर जब बाहर आया तो लोग और सिनेमा हॉल के कर्मचारी तालियाँ बजा रहे थे  !  जब उसे गोद में लिया तो वह बहादुर लड़की बिना रोये बैठी हुई थी ! १० मिनट देर से वह शो शुरू हो पाया !
                 अक्सर किसी भी प्रकार की दुर्घटना होने पर हम लोग तमाशबीनों की भूमिका छोड़, अगर मदद के लिए पहल करें तो और लोग भी आगे आते देखे जाते हैं ! पहल कौन करे ? नाज़ुक मौकों पर ,तुरंत फैसला कर कार्यवाही न कर पाने की हमारी कमी, किसी की जान ले सकती है !

Wednesday, January 12, 2011

कुछ अच्छी यादें , मित्रों से मिलने की-सतीश सक्सेना

समीर लाल के पुत्र अभिनव के विवाह उत्सव में कुछ यादें, यहाँ दिए कुछ नए फोटो मिलने से, ताजा हो गयीं ! खुशदिल समीर -साधना  के परिवार के साथ का यह ग्रुप फोटो, यकीनन एक स्नेही पति पत्नी की हमेशा याद दिलाती रहेगी ! समीर लाल से हम लोग पहले से ही, कहीं न कहीं जुडा महसूस करते रहे थे मगर साधना समीर लाल की आत्मीयता महसूस कर , समीर की किस्मत से कहीं न कहीं जलन सी लगी ! काश साधना भाभी की तरह  .........;-))  
दिगंबर नासवा को समीर भाई द्वारा बार बार पुकारना , इस विवाह उत्सव में उनकी व्यस्तता  और जिम्मेवारी बताने को काफी थी ! स्नेही दिगंबर के बिना रौनक में कोई न कोई कमीं अवश्य रह जाती ! 
दोनों पति पत्नी,  इस विवाह में शामिल होने के लिए,दुबई से यहाँ आकर मेहमानों के स्वागत सत्कार में लगातार व्यस्त रहे ! (साथ के फोटो में श्रीमती एवं श्री दिगंबर नासवा झुककर समीर लाल दम्पति के लिए फोटो में जगह बनाते हुए )


पूरे विवाहोत्सव में जिस व्यक्ति से मिलने को मैं सबसे अधिक उत्सुक था , अफ़सोस रहा कि अंत तक उसकी झलक नहीं मिल सकी ! मुझे बताया गया था कि ताऊ रामपुरिया यहाँ अवश्य आयेंगे मगर वे अपने को प्रकट न करने पर कायम हैं ,अतः उनका परिचय नहीं हो पायेगा ! हिंदी ब्लॉग जगत में , हास्य व्यंग्य को नए आयाम देने वाले, इस ब्लागर को ढूँढने के प्रयत्न में ,मैं हर बन्दर नुमा मेहमान में, ताऊ को ढूँढता रहा ...:-(
खैर कभी तो मौका आएगा .....देख लेंगे ताऊ तुझे भी .....!

Monday, January 10, 2011

प्रणय निवेदन -II - सतीश सक्सेना

आज स्वप्न में देख तुम्हें ,
झंकार उठी वीणा फिरसे ! 
शायद जैसे तुमने मुझको 
याद किया अन्तरमन से !
जैसे तड़प उठी हो सजनी  ! 
करके यादें,  प्यार   की !
लगता पहली बार महकती, बगिया अपने प्यार की !

कैसे भूल सकी होगी तुम ? 
मिलना पहली बार का  ! 
कैसे सह पायी होगीं इस 
तरह बिछड़ना प्यार का ?
लगता कोई सखी सहेली , 
याद दिलाये, प्यार की  !
मन में उठती आज महक ये, उसी हमारे प्यार की !

कैसे प्रिये ,छिपा पाऊं यह 
प्रीति भला अपने मन में !
कैसे , किसे,  बता पाऊं 
जो टीस उठे मेरे दिल में ! 
मन में  आता है  बतला दूं , 
सबको  बातें प्यार की  !
लगता सारा गगन पढ़ रहा, पोथी अपने प्यार की !

लोग पूंछते तरह तरह  के
प्रश्न, लिए शंका मन   में ,
किसको क्या बतलाऊं कैसा 
रंग  चढ़ा ?व्याकुल मन  में ,
गली गली में  चर्चा चलती, 
सजनी अपने  प्यार  की !
लिख लिख बारम्बार फाड़ता, चिट्ठी अपने प्यार की !

Ist part of this poem is available on following link ....

http://satish-saxena.blogspot.in/2010/03/blog-post_12.html

      

Saturday, January 8, 2011

प्रणय निवेदन -1 - सतीश सक्सेना

प्रथम प्यार का, प्रथम पत्र है 
लिखता, निज मृगनयनी को 
उमड़ रहे, जो भाव ह्रदय में 
अर्पित , प्रणय संगिनी को ,
इस आशा के साथ,  कि समझें  भाषा  प्रेमालाप  की ! 
प्रेयसि पहली बार  लिख रहा , चिट्ठी तुमको प्यार की !

अक्षर बन कर जनम लिया 
है , मेरे दिल के  भावों  ने  !
दवे हुए जो बरसों से थे 
लिखा उन्ही  अंगारों  ने  !  
शब्द नहीं लिखे हैं , इसमें  भाषा ह्रदयोदगार की  !
आशा है , सम्मान  करोगी, भेंट  हमारे  प्यार  की  !


तुम्हें दृष्टि  भर जिस दिन 
देखा उन सतरंगी रंगों में !
भूल गया मैं रंग पुराने ,
जितने खिले थे यादों में !
उसी समय से  पढनी सीखी , गीता अपने प्यार  की !
प्रियतम पहली बार गा रहा, मधुर रागिनी प्यार की !

अंतिम शब्द तुम्हारे ऐसे
लिखे हुए मानस पट पर

कभी नहीं मिट पाएंगे ये
जब तक जीवन है पट पर

निज मन की बतलाऊँ कैसे  ? बातें हैं  अहसास   की !
बहुत आ रही मुझे सुहासिन याद तुम्हारे  प्यार की !


(एक बेहद पुराना अप्रकाशित गीत......)अगला भाग पढ़ने के लिए प्रणय निवेदन - II पर क्लिक करें !

Thursday, January 6, 2011

नए वर्ष पर होमिओपैथी की सौगात -सतीश सक्सेना

एक साल बाद, ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट देख, मन झूम उठा ! मेरी बेटी का निष्क्रिय  थायरोइड ग्लैंड , अब बिलकुल स्वस्थ है ! ....लगभग दो साल पहले , एलोपैथिक दवाएं बंद कर,अपनी बच्ची का इलाज़, खुद करने का निर्णय लिया था और इस जटिल बीमारी और मेरे आत्मविश्वास की जंग में , अंततः होमियोपैथी  के साथ साथ मेरे होमिओपैथी अध्ययन की विजय हुई  !
रिजल्ट निम्न थे ....
6-1-09  - TSH  -  46.96  ( 0.35-5.50 )
23-9-09  TSH -   21.57   
13-12-09 -TSH - 7.05  
2-2-10    - TSH  - 6.29 
1-1-11    - TSH  - 3.83 ( normal )


शायद यह मेरे पूरे जीवन में, खुद के आत्मविश्वास के साथ ,सबसे बड़ी लड़ाई थी  जिसमें मेरे विश्वास की जीत हुई ! और साथ ही होमिओपैथी के प्रति मेरा यह विश्वास और बढ़ा है कि यह मानवता के प्रति वरदान है !

Tuesday, January 4, 2011

विदेश यात्रा पर जाने में डर -सतीश सक्सेना

 मेरा बेटा जब जब देश से बाहर गया हर बार उसका अनुरोध रहता कि पापा एक बार आप जरूर आ जाओ आपको अच्छा लगेगा ! हर बार मना करते हुए असली बात नहीं बता पाता था ! मुख्य कारण दो ही थे, विदेशियों से बात करने में  आत्मविश्वास की कमी एवं बहुत खर्चा होने का डर ....
मगर जब एक बार बाहर चले गए तब जाकर पता लगा कि बेबुनियाद भय, आत्मविश्वास को किस कदर कम करता है ! अतः सोचा कि अपना अनुभव अवश्य बांटना चाहिए ताकि ऐसी स्थिति और लोग न महसूस करें !
सबसे पहले पासपोर्ट हर घर में होना बहुत आवश्यक है, यह एक ऐसा डोक्युमेंट हैं जिसके जरिये भारत सरकार आपके बारे में, यह सर्टिफिकेट देती है कि पासपोर्ट धारक भारतीय नागरिक है तथा इस परिचयपत्र में आपके नाम और पते के अलावा जन्मतिथि,  तथा जन्मस्थान लिखा होता है ! किसी भी देश में प्रवेश लेने की परमीशन(वीसा) के लिए इसका होना आवश्यक है !
अगर दो माह पहले, किसी भी देश की फ्लाईट टिकिट बुक करायेंगे  तो लगभग आधी कीमत में मिल जाती है ! दिल्ली से पेरिस अथवा स्वित्ज़रलैंड जाने का सामान्य आने जाने का एक टिकट, लगभग ३० हज़ार का पड़ता है जबकि यही टिकट तत्काल लेने पर ६० हज़ार का आएगा ! सामान्यता एक अच्छा टूरिस्ट होटल ३००० रूपये प्रति दिन में आराम से मिल सकता है ! 
अगर आपकी ट्रिप ४ दिन की है तो एक आदमी के आने जाने का खर्चा लगभग मय होटल ४२०००.०० तथा भोजन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट  मिलकर ५०००० रुपया में ! अगर आप यही ट्रिप किसी अच्छे टूर आपरेटर के जरिये करते हैं तो आपका कुछ भी सिरदर्द नहीं, साल दो साल में  ५० - ६० हज़ार रुपया बचाइए और ४ दिन के लिए पेरिस, मय गाइड घूम कर आइये !
जहाँ तक खर्चे की बात है , हर परिवार में पूरे साल घूमने फिरने और बाहर खाने पर जो खर्चा होता है ,उसमें हर महीने कटौती कर पैसा बचाना शुरू करें तो एक वर्ष में ही आधा पैसा बच जायेगा, बाकी का इंतजाम करने में बाधा नहीं आएगी ! मेरा अगर आप लोग यकीन करें तो एक बार विदेश जाने के बाद आपके और बच्चों के आत्मविश्वास में जो बढोतरी आप पायेगे, उसके मुकाबले यह खर्चा कुछ भी नहीं खलेगा ! मेरा अपना सिद्धांत है कि जब तक जियेंगे, हँसते मुस्कराते जियेंगे ! एक बात हमेशा याद रखता हूँ कि  
" न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए ..."
       
विदेश जाकर अच्छी इंग्लिश न बोल पाने के लिए न बिलकुल न डरें , आप वहाँ पंहुच कर पायेंगे कि अधिकतर जगह पर, इंग्लिश जानने वाले बहुत कम हैं ! आपको लगेगा कि आप ही सबसे अच्छी अंगरेजी बोलते हैं :-))

Monday, January 3, 2011

समीर लाल और साधना भाभी को इतनी प्यारी पुत्रवधू के लिए बधाई -सतीश सक्सेना

समीर भाई के परिवार के साथ, इस महत्वपूर्ण विवाह उत्सव में , वर वधु ( अनुभव - प्रियंका )पर निगाह पड़ी तो ठगा सा देखता ही रह गया ! ईश्वर बुरी नज़र से बचाए इन फूल से बच्चों को ...ऐसी मनोहर सुदर्शन जोड़ी, कम ही देखने को मिलती है !
अपने दोनों बच्चों और बधुओं के साथ में खड़े समीर भाई और साधना भाभी को देख, मैंने खुशदीप भाई और डॉ दराल को कहा कि बच्चे तो साधना भाभी के ही लगते हैं ....


और बड़ी देर तक समीर लाल, खुशदीप और डॉ दराल के ठहाके गूंजते रहे समझ नहीं आया कि यह सब हँसे क्यों जा रहे हैं ?? मैंने गलत क्या कहा ...???  
;-) ( समीर भाई के दोनों पुत्र  बेहद सुदर्शन व्यक्तित्व के मालिक हैं ) . 
शांत और प्रभावशाली वातावरण में ,बेहद सादगी और बिना किसी भीड़ भाड़ के , अनुभव-प्रियंका का यह विवाह उत्सव  एक बेहद अनौपचारिक प्यार की मधुर गंध समेटे था ! पूरे उत्सव में समीर लाल - साधना भाभी के स्नेही स्वभाव के कारण हमें कहीं नयापन नहीं लगा ! लगा कि अपने घर में खुशियाँ मना रहे हों !


ब्लागर शिरोमणि समीर लाल के सरल  और स्नेही व्यक्तित्व से मिलने का दूसरा मौका था परिवार जनों के मध्य हम लोगों का जिस प्रकार वे ध्यान रख रहे थे वह बड़प्पन और स्नेह का अनुकरणीय  उदाहरण था ! जिस उत्साह से लोग देश विदेश से आकर  उनके उत्सव में शामिल हुए यह उनके प्रति सम्मान और प्यार का अहसास कराने के लिए काफी था !     


इतने सुगंधमय, खुशनुमा माहौल में,कविवर कुंवर बेचैन, पिट्सबर्ग वाले गंभीर अनुराग शर्मा , इंदौर के रहस्यमय ताऊ रामपुरिया ,ब्लोगवाणी वाले सुदर्शन मैथिली जी और सिरिल , दुबई वाले आत्मीय दिगंबर नासवा, और दिल्ली वाले मस्त खुशदीप भाई , स्नेही पद्म सिंह, हंसमुख डॉ दराल, मस्तमौला राजीव -संजू तनेजा के साथ,विद्वान् पंडित डी के शर्मा "वत्स" ,के साथ ,  उड़न तश्तरी द्वारा प्यार सहित परोसे, उस मीठे स्वादिष्ट भोज का आनंद चौगुना हो गया !


      
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