Tuesday, August 31, 2010

आदर पाने की चाह - सतीश सक्सेना

                             बिना आपको आदर दिए , हर इंसान आपसे यह उम्मीद रखता है,कि आप उसका आदर करें  ! एक भुलावा लेकर हम जीते रहते हैं कि हम आदर सम्मान के पूर्ण योग्य हैं ! हम यह सोचने का प्रयत्न क्यों नहीं करते कि अगर हमें सम्मान चाहिए तो सामने वाले को पहले देना होगा तब आपको तुरंत कृतज्ञता पूर्वक सम्मान मिलेगा !
                              दूसरों द्वारा हमारे प्रति सम्मान प्रदर्शन ,हमारे सुकार्यों के प्रति, एक स्वाभाविक मानवीय अभिव्यक्ति है ,जिससे हमें संतोष महसूस होता है ! मगर अधिकतर सम्मान दिखावे के लिए किया जाता है और मानवीय कमजोरियों के रहते, हम अक्सर अपने प्रति किये गए सम्मान का सदुपयोग न करके, दुरुपयोग अधिक करते हैं !
                                लेखकों के बारे में मेरी स्पष्ट राय है कि उनकी कोई भी कमजोरी ,बनावट अथवा नाम कमाने के लिए किये गए प्रयत्न ,लम्बे समय तक छिपाए नहीं जा सकते ! विभिन्न समय और मनस्थिति में लिखे उनके लेख उनकी कमजोरियां उजागर करने को काफी हैं ! इसी कारण ब्लागजगत में होती छीछालेदर में, अपने प्रति लगाये आरोपों के जवाब में मेरा यही कहना होता है कि पाठक अधिक विद्वान् होते हैं, उन्हें पढने दीजिये और फैसला भी उन्ही को करने दीजिये कि कौन क्या लिख रहा है !
                               अगर हम अपने कार्यो के प्रति ईमानदार नहीं है तो देर सबेर हमारी हरकतें समाज को पता चल ही जायेंगी  लम्बे समय तक लोगों को मूर्ख बनाना संभव नहीं है ! हार झूठ को छिपाने के लिए, अपने बोले हर झूठ को याद रखना और उसके विपरीत कार्य करने पर हमेशा अंकुश लगा कर रखना पड़ेगा जब भी चूके आपकी मक्कारी सबके सामने होगी ! इसी समाज में, हमारे आसपास  ही ऐसे लोग रहते हैं जो अपने से अधिक समझदार एवं चालाक और किसी को कुछ नहीं समझते  ! कहीं हम भी तो इन में से एक नहीं  ? मुझे लगता है कम से कम सप्ताह में एक बार अंतर्मन के शीशे में, अपनी इस विद्रूप छवि को पहचाननें का प्रयत्न अवश्य करें जिससे कि अपने मन की गन्दगी को, अगली पीढ़ी से छिपा सकें अन्यथा यकीन मानिए बदले में हर जगह से यही चालाकी मिलेगी !

Monday, August 30, 2010

डॉ अमर कुमार ! एक बेहतरीन व्यक्तित्व - सतीश सक्सेना

ब्लाग जगत में  जिन उस्तादों को पसंद करता रहा हूँ वे धीरे धीरे अपने असली रंग में दिखने लगे हैं और  मुझे अपनी नादान समझवश ,पहचानने में बहुत समय लगा ! मगर एक डॉ अमर कुमार जरूर  ऐसे रहे जो अपने आपको नहीं बदल पाए  ! तीखे और चुभने वाले कमेन्ट के लिए मशहूर अमर दादा कहीं नहीं बिक पाए ..... किसी गैंग में भी शामिल नहीं हो पाए ! सो यह जबरदस्त शख्शियत इस ब्लाग जगत में कम आकलन का शिकार सी रही है  ,आज का यह लेख उन्ही को समर्पित कर रहा हूँ !

कल उनका जन्म दिन था और मुझे पाबला जी द ग्रेट   की बदौलत आज ही पता चला !


कल  ब्लाग जगत के एक निठल्ले तरुण  ने  दुसरे निठल्ले पर एक बड़ी प्यारी पोस्ट लिखी  बदकिस्मती से यह बेहतरीन पोस्ट लोगों की निगाह में नहीं आ पायी अतः सोचा कि अमर दादा के लिए कुछ लिख कर अपने  बेकार लेखों  की श्रंखला में कुछ अच्छा भी लिख सकूं !   


मैं एक नासमझ ब्लागर के नाते, इस बेहतरीन निष्पक्ष ब्लागर को  आज तक समझ नहीं पाया , हर जगह और हर महत्वपूर्ण विषय पर आपको यह मिल जाते हैं अपनी विशिष्ट शैली में साफ़ साफ़ बोलते हुए ! शायद ब्लाग जगत के सबसे अच्छे जानकारों में से एक डॉ अमर कुमार को आम ब्लागर समझने में बहुत समय लगाएगा  ! मगर निस्संदेह वे उन सर्वश्रेष्ठ ईमानदार लोगों में से एक हैं जिन्हें ब्लाग जगत की सबसे अधिक समझ है  !     

कभी उलझे अमर , 
कभी दादा अमर, 
कभी जल्दवाज अमर, 
कभी गुस्सैल अमर, 
कभी महीनों गायब रहने वाले लडाका अमर, 
और कभी रख्शंदा जैसी प्यारी लड़की को दुलारते हुए अमर कुमार, पूरे ब्लाग जगत में अलग खड़े नज़र आते हैं ! मगर मैं इन्हें डरते हुए पसंद करता हूँ जो मस्त जवानों की ऐसी तैसी करने की सम्पूर्ण क्षमता रखते हैं और खुद मस्त रहते हैं !


लिंक्डइन प्रोफाइल में अनके प्रति मेरे कमेंट्स आपके लिए नज़र करता हूँ.... 

"Dr Amar Kumar, a Graduate in Medicine, is not only one of the most honest,empathetic in nature and a fearless writer of hindi language, but also having dynamic command over vast social subjects and heritage of Indian society and culture, he has the caliber to fight against injustice. Besides managing and practicing own nursing home successfully he is also able to devote time to serve his own national language with great zeal"

कहीं इन्हें हमारी नज़र न लग जाए .... 
खुदा महफूज़ रखे हर बला से हर बला से 



मगर मैं इनकी तारीफ़ क्यों कर रहा हूँ इससे तो ब्लागर इन्हें मेरा गुरु मान लेंगे :-( .....
ऐसा करते हैं यह लेख किसी अनाम का मान लें तो अच्छा होगा ! अपने नाम से तारीफ़ करना ठीक नहीं कहीं अमर कुमार से कल को लड़ाई हो गयी तो इन्हें गरिया भी न पाऊंगा  !

Thursday, August 26, 2010

भगवान् कहाँ हैं ? -सतीश सक्सेना

प्रवीण शाह अपने साइंटिफिक सोच और तथ्यपरक लेखों के लिए मशहूर हैं अक्सर अंधविश्वास के खिलाफ मोर्चा खोले रहते हैं और निस्संदेह उनके कथन पर अविश्वास करना आसान नहीं होता ! मगर आज मामला कुछ अलग सा था ! आज भाई प्रवीण शाह ने भगवान् को ही छेड़ दिया , खूब जम कर लिखा कि भाई लोग किस प्रकार हार -जीत दोनों का क्रेडिट भगवान् को ही देते हैं , लेख लिख तो दिया, मगर उसके बाद परेशान कि हे प्रभु आज लगता है कि कोई टिप्पणी नहीं आएगी वह तो भला हो कि इनकी प्रार्थना सुन ली गयी और घूमते घामते अली साहब कहीं से आ गए तब जान में जान आयी  !
फिर भी क्रेडिट भगवान् को नहीं दिया अली साहब को कहते हैं कि ...
@ अली साहब,
शुक्रिया आपका,
मुझे लग रहा था कि कहीँ खाता ( टिप्पणियों का ) ही न खुल पाये आज... ;)


उसके बाद मेरे कमेन्ट ये रहे ....

"प्रवीण भाई !
खाता न खुलने का अंदाजा था फिर भी पंगे जरूर लेना था हा...हा...हा...हा.....
भगवान् से भी पंगा... और कोई काम नहीं है क्या ?"
अली सा से दोस्ती मधुर रखना ...आड़े वक्त काम आते रहेंगे !
:-) "

प्रवीण जी उन लोगों में से हैं धारा के विपरीत तैरना पसंद करते हैं ! इनके द्वारा अपने विषय पर पकड़ और अभिव्यक्ति शैली  मुझे शुरू से आकर्षित करती रही है ! इस बार परम शक्ति को चुनौती दे डाली तो मुझे खूब हंसी आई ! घबरा तो प्रवीण भाई भी रहे होंगे सो अली साहब का कमेन्ट आते ही शुक्रिया अता कर दिया कि आज जाने कमेन्ट आयें भी या नहीं  !
प्रवीण भाई !
हमें भी क्या पता कि भगवान् होते हैं या नहीं मगर बचपन में एक शक्ति को माथा नवाने की आदत डाल दी गयी ! बड़े होकर जब कभी दिल घबराता है तो कभी कभी इनकी शरण में जाने का दिल करता है, उसमें बड़ी राहत मिलती है ! यकीनन मामला श्रद्धा का ही है ...फिर मत्था कहीं भी क्यों न झुक जाए ! ज्ञान भाई की गंगा मैया हो अथवा  खुद केशव  ...आनंद आ जाता है ..!
दिल है क़दमों पर किसी के गर खुदा हो या न हो 
बंदगी  तो अपनी फितरत है , खुदा हो या न हो  ! 
मानते हैं कि यह धर्म भीरुओं का हथियार है , मगर मानवीय कमजोरियों के चलते कहीं न कहीं सर झुकाने से राहत मिलती है तो नुकसान भी क्या ?
( चित्र गूगल से साभार )


ब्लॉग मैनर्स - सतीश सक्सेना

आज ब्लागजगत में हजारों हिंदी लेख रोज छापे जा रहे हैं, अक्सर हर व्यक्ति की एक ही इच्छा  होती है ! 
ऐसा कुछ कर पायें ..यादों में बस जाएँ 
सदियों जहान में हो , चर्चा हमारा  ! 
दिल करदा,हो यारा दिलदार मेरा दिल करदा ....

और यह सोई इच्छा पूरी कर दी मुफ्त में प्रकाशित हुए, उनके अपने लेखों ने, जो एक क्लिक के साथ सारे, विश्व में बिना कोई पैसा दिए, पढवाए जा सकते हैं  ! जिस सतीश सक्सेना को ४० किलोमीटर के दायरे में रहने वाले चंद लोग ही जानते थे  उसे आज हज़ारों मील दूर बैठे राज भाटिया और समीरलाल भी आसानी से बिना किसी प्रयत्न किये जान गए !

शुरू शुरू में चंद रचनाएँ लिखने के बाद, देखा कि कमेंट्स नहीं आते थे कोई पढता ही नहीं था  अतः ब्लाग जगत के मशहूर लोगों की एक लम्बी लिस्ट बनाई जिसमें दिग्गज समीरलाल ,ज्ञानदत्त जी, अनूप शुक्ल,देवाशीष  इत्यादि लोग शामिल थे  ! जब भी कोई पोस्ट लिखते, बिना इनकी तकलीफ को जाने ,अपनी  " बहुमूल्य रचना "   की कापी इन सबको मेल के जरिये भेज देते थे ! जवाब में केवल समीर लाल थे, जो टिप्पणी दे जाते थे ! एक दिन ऐसे ही मेरे एक इमेल का जवाब आया तो मन खुश हो गया ऊपर देवाशीष का नाम लिखा देख ! शुरू की लाइने पढ़ कर ही बहुत खराब लगा ......

कृपया मेरा नाम अपनी लम्बी मेलिंग लिस्ट से तुरंत हटा दें ....
मुझे भविष्य में कोई रचना न भेजें ...
मुझे जो पढना होता है उसके लिए मेरे पास बहुत तरीके हैं ...
आदि आदि 

उसके बाद गुस्से में पहला काम यह किया कि देवाशीष का नाम ही, अपनी लिस्ट के अलावा ,स्मरण लिस्ट से भी हटा दिया ! आज जब मुझे ग्रुप मेल मिलती है और उसके बाद अनजान अनचाहे पत्रों की बाढ़ आ जाती है तो पता चलता है कि देवाशीष बिलकुल ठीक कह रहे थे  !
मुझे याद है एक बार एक ग्रुप मेल २०० से अधिक ईमेल पतों के साथ आयी थी  और उसके बाद रोज नए पतों से मेरे पास इमेल का ताँता लग गया !

कैसे समझाऊँ ....बड़े नासमझ हो... 

Wednesday, August 25, 2010

तलाश एक लडकी की -सतीश सक्सेना

आजकल अपने पुत्र के लिए एक योग्य पत्नी ढूंढ रहा हूँ  !
-तलाश एक ऐसी बहू की जो मेरी डांट खा सके और मुझे अक्सर डांटने की हिम्मत भी रखे क्योंकि अपनी बेटी गरिमा की डांट खाते खाते लगता है कि मैं ही अधिक गलती करता हूँ !
-मैं विरोध करता हूँ ऐसे दहेज़ न लेने वालों का ,जो अपने होने वाली बहू के माता पिता से  यह कहते हैं कि हमें दहेज़ नहीं चाहिए हाँ आपके द्वारा, अपनी बेटी को जो कुछ देने की इच्छा हो उन पैसों को हमारे अनुसार ही खर्च करें ! और नवोदित बच्ची के घर आने से पहले ही, उसके घर बालों को निचोड़ कर, यह उम्मीद करते हैं कि यह बच्ची हमारे घर को स्वर्ग बनाने  में पूरा योग देगी !
-मैं विरोध करता हूँ ऐसे माँ बाप का , जो अपने ही बच्चों की खुलकर आर्थिक मदद नहीं करते हैं और अपनी सामर्थ्य और पैसा अपने भविष्य के लिए उनसे छिपाकर रखते हैं !
- मैं विरोध करता हूँ ऐसे माँ बापों का , जो अपने बेटे को बी टेक और अन्य प्रोफेशनल डिग्री दिलाने के लिए हर जगह डोनेशन देने के लिए भागते दौड़ते देखे जाते हैं वही अपनी पुत्री को सामान्य डिग्री दिलवा कर अधिक से अधिक पैसा बचाते हैं !
- मुझे आनंद आता है जब मुसीबत में, अपने समर्थ पुत्र को मदद न करते देख, भला बुरा कहते समय लोगों को देखकर , उस समय केवल बेटी ही इनके पास मदद के लिए बैठी दिखाई देती है !
- मुझे अफ़सोस है ऐसी बुद्धि और दुहरी मानसिकता पर जो जीवन भर ,अपनी करनी को दोष न देकर, प्रारब्ध और बच्चों  में दोष निकाल कर रोना रोते हैं !
"   बोया पेड़ बबूल का  आम कहाँ से होय "

Monday, August 23, 2010

बहिन के प्यार को न भूलें ?? - सतीश सक्सेना

रक्षा बंधन के त्यौहार पर बहिन आपने भाई की रक्षा की कामना करते हुए दीर्घायु के लिए कामना करती है कि मेरा  भाई सुरक्षित रहे जिससे इस दुनिया में मैं अकेली महसूस न करुँ ! परस्पर एक दूसरे की दीर्घायु की कामना करने की याद दिलाता यह पर्व, बहिन भाई के मध्य एक महत्वपूर्ण गाँठ का काम करता रहा है !  
विवाह के बाद अपने भाई से दूर चली गयी बहिन के लिए, यह दिन अपने भाई को याद करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है ! इस रक्षा सूत्र के जरिये बहिन व्रत रख कर ,अपना प्यार व्यक्त करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करती है ,कि मेरा भाई सुरक्षित रहे और मेरा विश्वास है कि हर बहिन अपने दिल की गहराई से यह चाहती है !मगर आज के समय में कितने भाई ऐसे हैं जिन्हें अपनी बहिन के प्यार में लिपटे इस कच्चे धागे का महत्व पता है ! 


शायद हमें यह दिन, बहिन के प्यार की कीमत के रूप में, बहिन को दिए जाने वाले चंद रुपयों के कारण "खर्चे का दिन "के रूप में ही याद रहता है  !  
परस्पर कम होते स्नेह के इन बुरे दिनों में, भाई को इसका महत्व सिर्फ चंद रुपयों के रूप में ही याद न रहे तभी यह पौराणिक समय से चलता आया पर्व सार्थक होगा !      

Thursday, August 19, 2010

बड़ी भयानक शक्ल छिपाए,रचते ढोंग फकीरी का -सतीश सक्सेना

पहन फकीरों जैसे कपडे
परम ज्ञान की बात करें
वेद क़ुरान,उपनिषद ऊपर 
रोज नए व्याख्यान करें,
गिरगिट को शर्मिंदा करते, 
हुनर मिला चतुराई का !
बड़ी भयानक शक्ल छिपाए , रचते ढोंग फकीरी का !

धन अर्जन को कैसे सुन्दर  
प्रभु सेवक का रूप रखें  ,
मीठी मीठी बातें कहकर
आवाहन ! शैतान करें !
दिन में घरघर ज्ञान बाँटते,
रात को मज़ा खुमारी का !
मीठी भाषा के बल अक्सर ,  मज़ा है लुच्चेदारी का !    

रंजिश पाले शिक्षा देते 
नयी नयी बातें बतलाते
अपना धर्म भूल कर भैया
औरों को शीशा दिखलाते 
दारू पीने वाले  अक्सर, 
चखते मज़ा पंजीरी का !
जो मनमोहक सा दीखे है,जाल इसी व्यापारी का !


नींद से जागो सोने वालो  
लगती सेंध, मकानों को 
जिस घर ऐसे सांप रेंगते, 
खतरा है , संतानों को ! 
रात में साकी और सुराही,
दिन में वेश फकीरी का !
वक्त पड़े पर बाप बना लें, वरना छुरा कसाई का !

एक ,दूसरे को ललचाते
स्वच्छ धर्म व्यापार बनाते !
आस्था तोड़ रहे औरों की 
अपने को अच्छा बतलाते !
खीर, मलाई और सिवैयां , 
मुफ्त काफिरों को बाँटें !
जहर मिले मटकों पर लेवल लगा है खीर मलाई का !


यही गीत अर्चना चाओजी को आवाज में सुनिए !



Monday, August 16, 2010

क्या हमारा मन आज़ाद है ? - सतीश सक्सेना

सुश्री डॉ अजित गुप्ता  की हाल की एक पोस्ट पढ़ कर, लिखने के लिए ,यह विषय मिल गया ! उनका कहना है कि मन आपके व्यक्तित्व की गिरफ्त में रहता है उसे आज़ाद कैसे कराएं  ? क्या यह कभी संभव हो पायेगा  ? 
बरसों से अर्जित, बड़प्पन की चादर को लेकर जीते हम लोग, ३०-४० साल तक कई बार सोचते भी थे कि इस चादर को फ़ेंक, बेफिक्री के साथ,बिना बड़प्पन की परवाह किये, हम भी यह गाना गा पायें कि ....
दिल करदा ...ओ यारां दिलदार मेरा दिल करदा
सदियों जहाँ में हो, चर्चा हमारा ......   
मगर  शालीनता , और सर्वजन सम्मानित हम लोग चाहते हुए भी यह हिम्मत नहीं कर पाते कि झमाझम होती वारिश में अपने घर के सामने बने पार्क में छप छप करते हुए दौड़ सकें... लोग कहेंगे कि भाई साहब को अथवा मैडम को  क्या हो गया है ? 
ख़ास से आम बनने का बड़ा मन है, मगर यह जगत सम्मान का प्रभामंडल लिए हम लोग चाहते हुए भी यह बेड़ियाँ नहीं काट पाते  ....
क्या आप लोग कुछ रास्ता सुझायेंगे हम लोगों को  ?? 

Friday, August 13, 2010

मस्जिद की मीनारें बोलीं मंदिर के कंगूरों से -सतीश सक्सेना

"मस्जिद की मीनारें बोलीं मंदिर के कंगूरों से,
  संभव हो तो देश बचा लो मज़हब के लंगूरों से"      


योगेन्द्र मौदगिल की यह पंक्तियाँ अपने आप में एक पूरा लेख है जो ब्लाग जगत का को गौरवशाली और धनवान होने का अहसास भी दिलाती हैं ,कि इतना बेहतरीन रचनाकार हमारे बीच है  !


योगेन्द्र जी का कहना है कि मस्जिद और मंदिर में प्यार की कोई कमी न पहले महसूस होती थी और न अब है , ये दोनों तो पहले की तरह ही बहिनों की तरह परस्पर प्यार के साथ खड़ीं हैं मगर यह गवाह हैं, यहाँ सीधे साधे लोगों को, अपनी मीठी मीठी बातों से बहकाते, धर्म के ठेकेदारों की हरकतों के लिए !


चिंतित हैं वे ( योगेन्द्र मौदगिल ) कि इनकी लगाई गयी आग से देश पर असर पड़ने से रोका जा पायेगा ! कहीं ऐसा न हो कि इनके बोये जहर से आम आदमी सड़क पर आ जाये !


परेशान हैं वे कि देश को इन मज़हबी लंगूरों से कैसे बचाया जाए ?? ये न केवल लोगों के दिलों में आग लगा रहे हैं बल्कि इनसे देश की बुनियाद तक को खतरा है ! शायद इनका मकसद ही यही है ! 


अफ़सोस है कि लोगों में विद्वेष बढाते यह लोग यह नहीं जानते कि अपनी जिस विद्वता पर तुम्हे नाज़ है और जिसका दुरुपयोग कर तुम दूसरों की श्रद्धा का मज़ाक उड़ा रहे हो वैसे विद्वान् दूसरे धर्म में भी सैकड़ों हैं कहीं वे भी तुम्हारा खेल खेलने लगे तब क्या होगा ?? मुझे विश्वास नहीं होता कि तुम लोग  शायद यही चाहते हो ?


शायद तुम्हारे आकाओं का सपना पूरा हो जाएगा तुम्हें इस खूबसूरत कौम और समाज को बर्बाद करने का प्रयास करते देख ...मगर तुम और और तुम्हारी नस्ल भी तबाह हो जाएगी मूर्खों  ! यह घ्रणा का खेल बंद कर दो .....दूसरे धर्म की खिल्लियाँ उड़ाने का प्रयास बंद कर दो ! 

Thursday, August 12, 2010

हमारी ईमानदारी - सतीश सक्सेना

                             मेरे एक लेख "  कुछ घर में नफरत फैलाने के खिलाफ भी लिखें  "  में अंतर सोहिल के दिए कमेंट्स ने यह लेख लिखने को मजबूर कर दिया !

"....बल्कि किसी को बुराई ही लिखनी है तो सबसे पहले अपने कुयें की लिखनी चाहिये। जिसका पानी वो जन्म से पीता आया है, जिसमें रहता आया है, जिसमें डुबकी लगाता आया है। दूसरे के कुयें से ज्यादा हमें अपने कुयें के पानी की मिठास का पता होता है।  "

                            अंतर सोहिल के कमेंट्स बहुत कम नज़र आते हैं , मगर जब भी उनका कमेंट्स आता है , उनके व्यक्तित्व के बारे में बताने को काफी होता है !


                         अफ़सोस है कि  हम लोग अपनी तरफ देखते ही नहीं कि हम कितने घटिया हैं , ईश्वर ने आँखें भी ऐसी जगह  बनायी हैं कि न अपना चेहरा नज़र आता है न उस समय  अपनी आँखों में छिपे धूर्तता के भाव जब हम किसी को बेवकूफ  बनाते हैं ! मैं खुद अपने आपकी गलतियाँ  समझने में चूकता रहा हूँ ! अगर अपने "ईमानदार "जीवन की कमियों पर द्रष्टि डालता हूँ , तब कुछ भूलों पर अपने आप पर शर्म आती है कि यह मैंने क्यों कर किया होगा !मगर यह मैं खुद था जब मैंने अच्छे और यकीनन अपने से अच्छे लोगों को बेईज्ज़त किया और उस समय मेरे चहरे पर शिकन तक नहीं आई ! उसके बाद भी अक्सर मैं अपने आपको एक अच्छा आदमी समझने का दम भरता हूँ ! क्या प्रायश्चित्त करुँ इन बेवकूफियों का  ??


हम कितने अच्छे काम कर रहे हैं ? यह न देख कर हमारी कमियाँ क्या रहीं ? अगर यह देखने लगें तो  हम बहुतो को हंसाने में कामयाब रहेंगे ! 

Wednesday, August 11, 2010

कुत्तों का फैसला - सतीश सक्सेना

भारत के पूरे कुत्ता समुदाय के लिए डूब मरने की घटना हो गयी कि गिरिजेश राव को एक मासूम पामेरियन ने काट लिया   ! जूली  डार्लिंग को यह नहीं पता था कि जिसे वह अपने घर में अतिक्रमण करते, दो पैर का कुत्ता समझ कर काटने जा रही है, वह गिरिजेश राव हैं एक बहुत बड़े ब्लागर  और इस खरोंच लगने के कारण वे जानवरों से प्यार करते कुत्ते नुमा इंसानों पर एक पूरी पोस्ट लिख कर यह साबित कर देंगे कि उन्हें कुत्तों जैसे उन इंसानों से भी डर लगता है जो रोज सुबह कुत्तों के साथ ही खाते पीते हैं ! 
खैर मुझे गिरिजेश राव की यह पोस्ट पढ़कर बड़ा गुस्सा आया जूली पर ,कि इस बेवकूफ जूली  ने कुत्तों के साथ, हमें भी बदनाम कर दिया और गूफी ( मेरा जर्मन शेफर्ड ) को अपने दरवार में हाज़िर होने की आवाज लगायी आखिर कुत्तों का सरदार मैंने पाला हुआ है या पता नहीं उसने मुझे पाला है !
गूफी ने सारी कहानी सुनने के बाद , जूली  का पक्ष जानने के लिए, एक दिन की मोहलत मांगी कि आयोग बैठाना है और जूली  -गिरिजेश राव प्रकरण के गवाहों से बात भी करनी है !
अगले दिन कोने के पार्क में , मज़बूत बदन वाले और गंभीर मगर इंसानों की सोहबत पसंद करने वाले गूफी ( जर्मन शेफर्ड ) की अध्यक्षता में एक मीटिंग हुई जिसकी सेक्रेटरी  एक लेब्राडोर कुतिया को बनाया गया जो कि इंसानों को प्यार करने के लिए मशहूर है ! प्रधान और सेक्रेटरी के चुनाव पर रॉटवेलर, बुलमॉसटिफ और डाबरमैन ने यह कहते हुए विरोध किया  किया कि इन पोस्टों के लिए ,हमारा नाम इसलिए नहीं लिया गया क्योंकि गूफी का मालिक सतीश सक्सेना , गिरिजेश राव का दोस्त है और हमारी जाति को बदनाम करने के लिए कमेटी में सीधे साधे कुत्तों को लेकर , जूली को सज़ा दिलाना चाहता  हैं ! इन तीनों ने यह भी धमकी दे डाली कि अगर जूली डार्लिंग को कुछ भी कहा गया तो हम गिरिजेश राव से सीधे निबटेंगे ! 
 मगर गूफी ने उनकी आपत्ति यह कहते हुए खारिज कर दी कि यह  एग्रेसिव कुत्तों को न लेने की सावधानियां  इसलिए  भी जरूरी थीं कि कोई इंसान यह न कह सके कि गिरिजेश राव के साथ कुत्तों ने न्याय नहीं किया !

पूरे दिन चली मीटिंग में निम्न बातें निकल कर सामने आयीं !..
१. इस घटना के समय बुद्धिमान जूली  को गिरिजेश राव की संदेहात्मक हरकतें पसंद नहीं आई थीं और ऐसी हरकतें पूरी कुत्ता कौम को बदनाम करती हैं ..जूली  के वकील का यह सबसे महत्वपूर्ण कथन था !
२.हद तो तब हो गयी जब जूली  को यह पता चला कि गिरिजेश राव एक ब्लागर है अगर यह जूली  को पहले ही मालूम होता तो वह उसे घर में ही न घुसने देती और यह हादसा टाला जा सकता था !
३.गिरिजेश राव अपने अधिकतर कुत्ता प्रेमी पड़ोसियों  को, कुत्ता समझते रहे हैं , यह देख सभी कुत्तों में उनके प्रति बरसों से ,बहुत गुस्सा था  और मौके की तलाश में थे !
४. शुक्र मानना चाहिए कि वे जूली डार्लिंग के घर गए जिसकी दंतुली ही चावल के दानों जैसी थी  अगर प्रवीण पाण्डेय अथवा सतीश सक्सेना से मिलने गए होते तब उन्हें पता चलता कि कुत्ते( जर्मन शेफर्ड ) और कुत्तों को पालने वाले (प्रवीण पाण्डे , सतीश सक्सेना ) कुत्ते कैसे होते हैं ! यहाँ तो मालिक भी काटने वालों में से हैं !
कुत्तों की मीटिंग से निकले यह रहस्योदघाटन, सुनकर सन्न हूँ समझ नहीं आता गिरिजेश राव को कैसे  तसल्ली  दी जाये ! 
( कृपया इस पोस्ट को गंभीर न लें यह महज़ हास्य है ! गिरिजेश राव जी से क्षमा याचना सहित  :-) )

Tuesday, August 10, 2010

तेरा स्वागत है लड़की -सतीश सक्सेना

             कुछ दिन पहले अपने भतीजे की सगाई समारोह में अपने खींचे हुए फोटोग्राफ्स देखते देखते एक फोटो पर निगाह पडी तो उसे देखता ही रह गया  ! वास्तविक जीवन में स्नेह प्रदर्शन का यह दुर्लभ फोटो आज के समय में असंभव जैसा है ! सास बहू के मध्य प्यार की कोई कमी नहीं अपने देश में मगर दोनों के चेहरे पर प्रथम मिलन की ऐसी ख़ुशी , इस चित्र को दुर्लभ बना देती है !
मानव फोटोग्राफी में विभिन्न मौकों पर, चेहरे की अभिव्यक्तियों  का छायांकन मेरा बहुत पुराना शौक रहा है ! मगर ऐसी स्वाभाविक अभिव्यक्ति यहाँ मिलेगी, मैंने यह कल्पना भी नहीं की थी !
इस चित्र में सास अपनी होने वाली बहू का स्वागत ,समारोह स्थल के द्वार पर कर रही हैं , एक हाथ में स्वागत थाल पकडे ,बहू को कुंकुम लगाती आँखों का स्नेह , बरसों की प्रतीक्षा, पूरी होने की साफ़ साफ़ सन्देश दे रहा है !
और दूसरी ओर  "अम्मा मैं आ गयी " सन्देश देती ख़ुशी में अश्रुपूरित यह ऑंखें , इस फोटो को अनमोल बना गयी  !
किसी भी फोटोग्राफर के लिए, प्यार की यह स्वाभाविक अभिव्यक्ति ,कैमरे में ठीक समय पर कैद करना लगभग असंभव सा हो जाता है !
काश टी वी सीरियल पर सास बहुओं को आपस में लड़ाते हमारे प्रोडयूसर ,डायरेक्टर तथा लेख़क ऐसे स्नेह को महसूस कर सकें ! 

Monday, August 9, 2010

कम्पयूटर के वे आरंभिक दिन और पीसी बुलेटिन बोर्ड सर्विस - सतीश सक्सेना

आज PC Quest मैगज़ीन के पुराने पेज देखकर बुलेटिन बोर्ड सिस्टम से लेकर ब्लाग लेखन तक का सफ़र याद आ गया ! सोचा आप लोगों से साझा करुँ !
१९९२ में मैंने 40 MB हार्ड ड्राइव और 1 MB RAM,5.25" floppy drive युक्त अपना पहला कम्पयूटर लिया था तो दोस्तों ने मुझे पागल बताया था क्योंकि मैं उतने पैसे में अच्छी कंडीशन की फिएट ले सकता था ! उन दिनों कम्पयूटर के जानकार, मार्केट में उपलब्ध नहीं थे बिना किसी जानकारी के कम्पयूटर लेकर घर आया और पीसी क्वेस्ट मैगजीन लेकर, घंटो कम्पयूटर के सामने बैठ, ऑटो एक्सिक बैच और कॉन्फिग फ़ाइल में सर खपाता रहता था ! अगले दिन कम्पयूटर सीखने की कक्षा में एडमिशन लेने के बाद गया तो टीचर के बचकाने तरीके को देख, जमा पैसे छोड़कर घर बापस आ गया था और पी सी क्वेस्ट मैगज़ीन को गुरु मानकर साउंड कार्ड ...वीडियो कार्ड ...मेमरी मैनेजमेंट में सर खपाता रहता था !

               पीसी क्वेस्ट मैगज़ीन पढ़ कर मैं अपनी जानकारी को अपडेट करता रहता था नेहरु प्लेस में अपने मित्र की जिस दुकान से मैं कम्पयूटर के पार्ट्स खरीदता था वहां मेरी कम्यूटर जानकारी की अच्छी भली धाक थी ..जब भी मैं दुकान में जाता उसके मेकेनिक, अनसाल्व्ड प्रोब्लम मुझसे डिस्कस करते थे और मुझे भी बड़ा आनंद आता था उन्हें समझाने में !

               सबसे अधिक समस्या अमेरिका से मंगाए गए जूम १४.४ केबीपीएस मोडेम को इंस्टालेशन और उसे चलाने में में हुई जिसमें अंततः काम पोर्ट पर मुझे जीत हासिल हुई ! पहली बार मोडम हैण्ड शेक की आवाज सुनकर जो ख़ुशी हुई उसका वर्णन मैं यहाँ नहीं कर सकता ! उसके बाद रात रात भर लोकल बुलेटिन बोर्ड सर्विस का उपयोग कर एक दूसरे से जानकारी शेयर करना कम रोमांचक नहीं होता था !

             उन दिनों कम्पयूटर जानकारी जुटाना बहुत दुर्लभ मानी जाती थी, उस माहौल में मैं पी सी क्वेस्ट और डाटाक्वेस्ट नामक मैगजीन बहुत अच्छा कार्य कर रही थीं ! भारत में, मैं कम्यूटर के प्रति जागरूकता बढ़ाने में पी सी क्वेस्ट मैगज़ीन का बहुत बड़ा हाथ मानता हूँ और उन्हें धन्यवाद देता हूँ !

(चित्र गूगल से साभार )

Saturday, August 7, 2010

साइंस द्वारा चमत्कार को मान्यता - सतीश सक्सेना

                       इंडियाना यूनिवर्सिटी द्वारा, हाल में की गयी एक स्टडी के जरिये , विज्ञान को अब पता चला है :-)कि किसी बीमार के लिए, उसके पास बैठकर की गयी प्रार्थना का चमत्कारिक फायदा मिलता है और असाध्य बीमारियों में भी इसकी भरपूर उपयोगिता पायी गयी है ! उपरोक्त स्टडी, प्रोफ़ेसर ब्राउन की देखरेख में ,मोजाम्बिक के ग्रामीण एरिया में, मेडिकल डाक्टर और वैज्ञानिकों की टीम की मदद से किया  ! उनके द्वारा यह निष्कर्ष निकाला है कि आंशिक अंधे और बहरे लोगों में , इस प्रार्थना प्रयोग के बाद, आशातीत सुधार हुआ है ! इनके प्रयोग का उद्देश्य , बीमारों के ऊपर प्रार्थना  के असर का अध्ययन करना था !
                     भगवान् का शुक्र है कि विज्ञान गाहे बगाहे यह आश्चर्यजनक  तथ्य स्वीकार करने लगता है कि  "कुछ तो है " जो हम समझ नहीं पाते "   ! काश  भाई प्रवीण शाह भी इसे जल्दी समझ लें ....
                     विश्व में बरसों से एलोपैथी का प्रभुत्व स्थापित है मगर आज भी दूरदराज के क्षेत्रों में ऐसी संस्कृतियाँ और परम्पराएं जाग्रत हैं जो  सदियों से वैकल्पिक चिकित्सा पर ही निर्भर हैं और सफलता पूर्वक इलाज़ कर स्वस्थ जीवन व्यतीत कर रहे हैं !
                    होमिओपैथी और रेकी आदि में प्राण शक्ति का बड़ा महत्व हैं  ! स्थूल शरीर की चिकित्सा न करके सूक्ष्म शरीर ( वाइटल फ़ोर्स ) को स्वस्थ करने का प्रयत्न किया जाता है ! अगर वाइटल फ़ोर्स  स्वस्थ है तो शरीर भी स्वस्थ महसूस करेगा ! सवाल सिर्फ सूक्ष्म शरीर को समझने का है  ! 
                     भारतीय योग विद्वानों द्वारा इच्छाशक्ति और मानसिक शक्तियों  के द्वारा मृतःप्राय व्यक्तिओं को  जीवनदान देने की बहुत घटनाएं हुई हैं , एकाग्रचित्त हो ध्यान लगा कर अस्वस्थ व्यक्ति के स्वस्थ होने की कामना करने एवं स्पर्श द्वारा रोग उपचार करने की अनगिनत घटनाएं उपलब्ध हैं ! यह प्रयोग करने के लिए कोई योगी होना आवश्यक नहीं है बल्कि एक मज़बूत इच्छा शक्ति वाला व्यक्ति इस प्रकार का प्रयोग कर सकता है और हर बार बेहतर परिणाम सामने आते हैं ! 
                      रेकी इसी ज्ञान का परिष्कृत रूप है, जिसमें स्पर्श द्वारा रोगी व्यक्ति पर साधक, शक्तिपात कर रोग को ठीक करने में समर्थ है ! रेकी के अभ्यास करने वाले सबसे पहले  ५ सिधान्तों का पालन करते हैं !
सिर्फ आज भर के लिए गुस्सा न हों, चिंता न करें, कृतज्ञ बनें ,निष्ठां के साथ कार्य करें  एवं दूसरों के प्रति दयालु बनें  ! प्यार और स्नेह पर आधारित यह शक्तिपात हो और स्वस्थ न हों यह कैसे हो सकता है !

Friday, August 6, 2010

कुछ घर में नफरत फैलाने के खिलाफ भी लिखें - सतीश सक्सेना

                      मेरा यह मानना है कि हिंदी ब्लाग जगत में विद्वानों कि कमी नहीं है , यहं लेख़क ब्लागर से कहीं अधिक संख्या में विद्वान् पाठक हैं जो हमें पढ़ते हैं और हमारी योग्यता और ईमानदारी, पढने, समझने  की पूरी क्षमता रखते हैं !ऐसे पाठक अक्सर कमेंट्स नहीं करते हैं ! ऐसे ताकतवर ब्लागजगत के ज़रिये ,आज मैं आपका ध्यान ब्लाग जगत में चल रहे धार्मिक अतिरंजना और वैमनस्य पर खींचना चाहता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि एक लेख अवश्य इस पर लिखें जिससे देश और समाज में कुछ सार्थक जागरूकता फैलाने में मदद मिले !

                        इस समय कुछ "समझदार" लोग एक दूसरे की धार्मिक आस्थाओं में खोट निकाल कर खूब मज़ाक उड़ा रहे हैं ! जब हम दूसरे की गालियाँ देखते हैं तो बहुत गुस्सा आता है मगर हम खुद क्या लिख रहे हैं , इसको देखने की जहमत नहीं उठाते मगर यदि हम कुछ लोगों के कारण, पूरी कौम पर शक कर रहे हैं, तो हम भयानक भूल कर रहे हैं ...एक ही घर में शंकित मन, के साथ रहते , इन भाइयों के मन में, ये बीज डाल हम अपने बच्चों का सबसे अधिक अहित कर रहे हैं ! आने वाली पीढ़ी हमेशा शक ,रंजिश और एक भय लेकर जीयेगी शायद इस तथ्य को आप भी नकार नहीं सकते ! शक्तिशाली भारत के जनमानस और सरकार के होते अब द्विराष्ट्रवाद की कल्पना भी नहीं की जा सकती तब इस घ्रणित माहौल को ख़त्म करने की चेष्टा क्यों न करें ! आइये क्यों न हम , अल्लाह ओ अकबर और हर हर महादेव के जोशीले नारों के मध्य कमर कस ,घर में बोये गए, नफरती बबूल के यह पेंड़ , उखाड़ने के लिए प्रतिबद्ध होने की कसम खाने की चेष्टा करें !

                        एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मुस्लिम भाइयों के आधे रिश्तेदार पाकिस्तान में हैं और इस कारण अब भी हो रहे शादी विवाहों के कारण उनकी दुआ रहती है कि भारत पाकिस्तान से रिश्तें अधिक न बिगड़ें ! मगर युद्ध की दशा में मुस्लिम, आपसी शक के बावजूद ,हमारे दुश्मनों से अपने देश की रक्षा में खूब लडें हैं और शहादत दी है , यह एक तथ्य है ! हम बहुसंख्यक और सहिष्णु हैं इस नाते उनपर शक करना और उनकी मान्यताओं पर चोट करना, छोड़ने का प्रयत्न कर, आशा की लौ तो जगाएं ! यह मत भूलिए कि हम हर धर्म का आदर करते हैं और यह सहिष्णुता ही हमारी पहचान है जो हमें औरों से, अलग पहचान देती है !

                         अफ़सोस है कि हमारे कुछ भाइयों ने कुछ लोगो अथवा अनाम लोगों के कारण, या जान बूझ कर अनाम लोगों का सहारा लेकर, गाली का बदला गाली से देने का विकल्प खोजा हुआ है यकीनन इससे साम्प्रदायिक सद्भाव को कम करने की कोशिश की जा रही है फलस्वरूप अकल्पनीय नुक्सान होगा ! ब्लाग जगत में फैलते, इस विद्वेष का जिम्मेवार किसी व्यक्ति विशेष को ना माने मगर उन लोगों को पहचानने का प्रयत्न करें जो भावनाएं भड़का कर अपने आपको, नेता स्थापित करने का प्रयत्न कर रहे हैं ! 

                         इस विषय की उपेक्षा कर ,आप,अपने आपको, आने वाले विषाक्त बादलों को न रोकने का प्रयास करने में सहभागी पायेंगे ! आशा है देश में फैले इस जहर के खिलाफ आपकी शक्तिशाली कलम जरूर उठेगी ! मैं यह उम्मीद करता हूँ कि संकीर्ण भावनाए भूल कर, आपकी कलम ईमानदारी से आगे आयेगी !

                        अंत में इन तथाकथित विद्वानों से निवेदन है ...अपने धर्म के खिलाफ छींटाकशी करने के विरोध के बहाने, ये कडवाहट तुरंत बंद कर दें ...और अगर मेरे कहे पर विश्वास न हो तो कृपया अपने ही लिखे लेख दुबारा पढ़े यह सिर्फ सौम्यता के साथ एक दूसरे का मखौल उडाना है, और माहौल को जहरीला बनाना है !

                        ऐसा करके निस्संदेह आप हमारे देश की शानदार और बेहतरीन सभ्यता के प्रति गुनाहगार सिद्ध होंगे और आपकी आने वाली पीढी भी , दूसरों के धर्म का मज़ाक बनाने वाली, आपकी कलम का सम्मान कभी नहीं करेगी !
                       मैं उन लोगों को भी लानत देता हूँ जो ब्लागजगत में नाम बदल बदल कर, अपमान जनक शब्द बोल कर आपको ऐसा लिखने का सुनहरा मौका देते हैं !


Thursday, August 5, 2010

पारब्रह्म परमेश्वर के गुण गाते ये ज्ञानी जन -सतीश सक्सेना

इस आधुनिक,प्रगतिशील और खूबसूरत देश में ये बबूल क्यों बोये जा रहे हैं  ? 
                           काश इन चालाक महा ज्ञानियों की समझ आ जाये जो सारे संसार को समझाने के लिए, ५० फूट ऊंचे तख़्त पर चढ़ कर, रोज प्रवचन कर, अपने आपको विश्व गुरु स्थापित किये बैठे हैं ! जिनका काम अपने और दूसरे धर्म में तुलना कर, दूसरों की मान्यताओं को तुच्छ साबित कर, अपने धर्म को अच्छा बताना मात्र है !
                           जिन्होंने न इतिहास से कोई सबक लिया, न वर्तमान में अपनी स्थिति जाननें की, कोई इच्छा और समझ है ! मंदबुद्धि, अनपढ़ चाटुकारों से घिरे, दुनियां को अपनी तुच्छ और संकीर्ण बुद्धि से तौलते यह लोग, मानव समाज के लिए कोढ़ हैं !
                           पूरे समय, पारब्रह्म परमेश्वर की बात करते यह ढोंगी लोग, इस खूबसूरत दुनिया और आने वाली नस्ल को बर्बाद करने पर कमर कसे हैं ....ईश्वर बच्चों को, इनके द्वारा फैलाई हुई बदबू से बचाए !

Wednesday, August 4, 2010

काऊ दिन उठ गयो मेरो हाथ, बलम तोय ऐसो मारूंगी -सतीश सक्सेना

आज जब भी भारतीय पारिवारिक संस्कृतिक उत्सव और शादी समारोहों में डी जे स्टेज देखता हूँ, मुझे वे मधुर कर्णप्रिय गीत याद आते हैं जो अपनी मधुरता के साथ, साथ प्यार का एक सन्देश भी देते थे ! उस मधुरता पर आज भी सैकड़ों डी जे गाने न्योछावर करने का दिल करता है !   


शादी की तैयारियों के साथ साथ नवविवाहिता का श्रंगार और उसको वर्णन करता यह गीत दिल में झंकार पैदा कर देता है !  बन्नों तेरी अंखिया सुरमे दानी    , इस तरह बन्नों की भाभियाँ और बहिने ,उसके वस्त्रों गहनों और रूप की तारीफ़ कर, उसको हंसाने और अपना घर छोड़ने की तकलीफ भुलाने में कामयाब रहती थीं ! 


लोकगीतों में प्यार की अभिव्यक्ति को याद करें तो हाल का ही यह मशहूर मधुर गीत जिसमें अपने सैयां के प्यार में डूबी नवविवाहिता, अपनी ससुराल की सारी परेशानियों को कैसे हँसते हँसते स्वीकारती है ,  सास गारी देवे, देवर जी समझा लेवे, ससुराल गेंदा फूल  !


३५ -४० साल पहले सुना, ब्रज भाषा के एक लोकगीत का मुखड़ा और उसकी धुन आज तक याद है ,शादी व्याह के अवसर पर महिलाएं अपने पति के प्रति पर अपने प्यार का इज़हार, गुस्से के प्रदर्शन के साथ , कुछ ऐसे करती थीं ...


   "काहू दिन उठ गयो मेरो  हाथ, बलम तोहे  ऐसो मारूँगी  !
   ऐसो मारूंगी ...बलम तोहे ऐसो मारूंगी ..काहू दिन उठ गयो ...   


कितना प्यार छिपा है, इस मारने की धमकी में , मगर लोक चरित्र को पहचानने वाले अब कितने हैं जो इन लाइनों में छिपे प्यार को पहचानते हैं !


और अंत में  " दल्ली सहर में म्हारो घाघरो जो घूम्यों ..." लोकगीतों को आधुनिक समय में लोकप्रिय बनाने के प्रयत्नों में, इला अरुण का नाम नहीं भुलाया जा सकता ! गज़ब की आवाज़ और अंदाज़  के साथ उनको सुनते हुए, लगता है गाँव के मेले में बैठे हों  !  
( चित्र गूगल से साभार )

Tuesday, August 3, 2010

आप खूने इश्क का अंजाम अपने सर न लें -सतीश सक्सेना

" आप खूने इश्क का अंजाम , अपने सर न लें ! 
 आपका दामन सलामत अपने कातिल हम सही "


बचपन से किसी अनाम शायर का यह शेर मुझे बहुत पसंद है , और अपने जीवन में अक्सर चरितार्थ होते देखता आया हूँ ! कोई कितना ही बड़ा दोषी क्यों न हो मगर अपनी भूल अथवा किसी का दिल दुखाने की बात स्वीकार कर, कोई अपनी ही नज़र में छोटा नहीं बनना चाहता और ब्लाग जगत में तो खास तौर पर नहीं, जहाँ सारी दुनिया पढ़, समझ रही है ! 
यहाँ हर व्यक्ति के लिखने का उद्देश्य, बताना आसान नहीं मगर एक उद्देश्य देर सबेर सबका है कि लोग मुझे जान जाएँ और मेरी इज्ज़त करें ! ऐसे लोगों में मैं खुद भी शामिल हूँ और मैं इसे खराब नहीं मानता !
कई बार स्नेह अथवा प्यार वश ऐसी परिस्थितियाँ बन जाती है जिसमें अगर आप सच्चाई बयान करें तो आपका एक प्यारा फँस जाता है और न करें  तो आप खुद लोगों से गाली खाते हैं ! ऐसे में क्या करेंगे आप ...? मुझे लगता है खुद गाली खा लेना बेहतर है न कि किसी अपने को नंगा कर देना  !  
यह बेहतर होगा कि  ऐसे लोगों को वक्त ही समझाए ...सो कभी कभी चुप रहना बेहतर होता है  ! मगर ऐसी घटना मेरे जीवन में बहुत कम आयी है, जब मुझे सच्चाई छिपानी पड़ी ! 
इससे बहुत सारे मित्रों की मुहब्बत के बारे में पता चला  कि वक्त आने पर दुनिया के सामने यह "बहुत ईमानदार " लोग भी अपनी  "असलियत " छिपा नहीं पाते हैं .....
खैर, कुछ अपनों को छोड़ना ही बेहतर होता है कम से कम और तो दिल नहीं दुखेगा  !


"इंशा अब इन्ही अजनबियों  में, चैन से सारी उम्र कटे ! 
 जिनके खातिर बस्ती छोड़ी नाम न लो उन प्यारों का  "  

Sunday, August 1, 2010

सर्दी की गुनगुनी धूप में ममता भरी रजाई अम्मा ( डॉ अमर ज्योति )

डॉ अमर ज्योति के जन्मदिन पर प्यार सहित ....
आइये एक अनूठे शायर के बारे में बात करते हैं ....सर्वहारा वर्ग  और समाज के लिए, इनकी तीखी कलम से जो रचनाएं दी गयी है, वे अमर और अमूल्य हैं ! आधुनिक समय में जब एक से एक बेहतरीन रचनाकार इन्टरनेट के कारण आसानी से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में समर्थ है ! उस समय भी डॉ अमर ज्योति अपने तीखे और सूफियाना अंदाज़ के कारण अलग ही खड़े नज़र आते हैं !
हिंदी, इंग्लिश में एम. ए. तथा इंग्लिश में पी एच डी  डॉ अमर ज्योति एक बैंक अधिकारी हैं !

डॉ अमरज्योति " नदीम " का प्रथम ग़ज़ल संग्रह  "आँखों में कल का सपना है " का लोकार्पण कवि सम्राट गोपालदास नीरज के हाथों पिछले वर्ष किया गया है !

इस लेख की शुरुआत  "अम्मा " की याद से करते हैं , कितनी तड़प है इस रचना में माँ को याद करते समय  इनके भाव देखिये .....

सर्दी में गुनगुनी धूप में ,  ममता  भरी रजाई  अम्मा ,
जीवन की हर शीत लहर में बार बार याद आई अम्मा 
बासी रोटी  सेंक  चुपड़  कर , उसे परांठा  कर देती थी ,
कैसे थे अभाव और क्या क्या करती थी चतुराई अम्मा   

बरसात का मौसम कुछ लोगों के लिए दुखदायी भी होता , अमर ज्योति अपनी नज़र से वह देखते हैं जो शायद बहुत कम लोगों को ही दिखता होगा ! 
बदली के छाने से,  मोरों  के आने से
दहशत सी होती है सावन के आने से 
सारे फुटपाथों पर ,पानी भर जाता है  !
रात भर भटकते हैं बिस्तर छिन जाने से 
सर्वहारा वर्ग के लिए उनकी लेखनी  द्वारा खींचे गए चित्र  दिल में एक टीस पैदा करते हैं  !
दलितों के प्रति उनका कष्ट वर्णन देखें !

"दूर से ही सुनीं वेदों की ऋचाएं अक्सर
यज्ञ में तो कभी शम्बूक बुलाए न गए
इसी बस्ती में सुदामा भी किशन भी हैं नदीम
ये अलग बात है मिलने कभी आये न गए "
इनकी एक ग़ज़ल में दर्द की थाह नहीं मिलती ....
"तुम तो कहते थे हर रिश्ता टूट चुका
फिर क्यों रोये रातों की तन्हाई में "
आज के आधुनिक कवियों और लेखकों से मुस्कराते हुए कहते हैं ...

राजा लिख रानी लिख
फिर से वही कहानी लिख ..
अपने गरीब पापा से एक बच्चे की उम्मीदें देखिये ..

"अबकी बार दिवाली में जब घर आयेंगे मेरे पापा
खिल मिठाई दिए फुलझड़ी सब लायेंगे मेरे पापा "
तकलीफ छुपाने की एक बानगी देखिये ...

"वो ठहाके बहुत लगता था
दर्द दिल में छिपा रहा होगा "
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