Monday, April 26, 2010

आभूषण रहित धरा को कर क्यों लोग मनाते दीवाली ? -सतीश सक्सेना

कितने कवियों ने मौसम की
गाथा गायी कविताओं में !
अब मौसम पर कविता लिखते
लेखनी ठहर क्यों जाती है !
बरसों बीते , दिखती न कहीं 

हर ओर छा रही हरियाली !
अब धुआं भरे इस मौसम में क्यों लोग मनाते दीवाली ?


धरती की छाती से निकली 
सहमी सहमी कोंपलें दिखे
काला गहराता धुआं देख
कलियों में वह मुस्कान नहीं
जलवायु प्रकृति को दूषित कर 

धरती लगती खाली खाली
विध्वंस हाथ से अपना कर , क्यों लोग मनाते  दीवाली  ?

प्रकृति का चक्र बदलने को 
काटते पेड़ निर्दयता से  !
बरसात घटी बादल न दिखे
ठंडी जलधार बहे कैसे  !
कर रहीं नष्ट ख़ुद ही समाज,  

कालिदासों की संताने !
आभूषण रहित धरा को कर,क्यों लोग मनाते दीवाली ?

अब नहीं नाचता मोर कहीं
घनघोर मेघ का नाम नहीं !
अब नहीं दीखता इन्द्रधनुष 
सतरंगी आभा साथ लिए !
कर उपवन स्वयं तवाह अरे 

क्यों फूल ढूँढता है माली ?
जहरीली सांसे लेकर अब,  क्यों लोग मनाते दीवाली ? 

Saturday, April 24, 2010

मैं कभी मंदिर नहीं जाता , मगर गर्व है कि मैं हिन्दू हूँ !- सतीश सक्सेना

   मेरा  आज का संस्मरण  ! 
  • ३ बजे की धूप में , कार स्टेपनी के पहिये के पंक्चर ठीक कराने एक दुकान के सामने गाड़ी रोक , देखा भयंकर गर्मी में दुकान में एक आदमी सो रहा था ! होर्न सुनकर धूप में बाहर आते उस व्यक्ति से, में उसका रेट पूंछा ! साहब २० रुपया  !सोते हुए आदमी को जगाकर केवल २० रुपये में इतनी मेहनत करवाना मुझे अच्छा नहीं लगा ! जब मैंने उसे ५० रूपये देकर, चेंज लेने से मना कर दिया  और उसको कहा कि मेरे हिसाब से यह वाजिब मेहनत का पैसा है इसे रख लो ! तो उसके शब्द थे आप कैसे आदमी हो साहब यहाँ लोग ५ रूपये के लिए भी  मरने मारने पर उतारू होते हैं और आप ५० रुपये जमाने से ज्यादा दे रहे हो !  
  • इसी दिन अगली रेड लाइट चौराहे पर , एक सभ्रांत से दिखने वाले एक वृद्ध युगल सामने आकर खड़े हो गए और कहा  कि "  हम भिखारी नहीं है , पैसे कम हैं हो सके तो कुछ मदद करें "   आम तौर पर संगठित भिखारियों को मैं कुछ नहीं देता, मगर इन वृद्धों में अपने माता पिता क्यों नज़र आये , मैं नहीं जानता और पर्स में से १०० रूपये का एक नोट जब उनको दिया तो उनकी आँखों की चमक और मेरे सर पर रखे कांपते हाथ को मैं महसूस कर पा रहा था !
और मुझे लगा कि वर्षों से बिना मंदिर गए ही , फिर मंदिर का प्रसाद मुझे मिल गया  ! हर बार ऐसे बेतुके काम कर के मुझे ऐसा ही लगता है !

Friday, April 23, 2010

सूना मंदिर - सतीश सक्सेना

बरसों पूर्व लिखा गया एक बहुत पुराना गीत आपको पढवाना चाह रहा हूँ , कृपया ध्यान रखें मेरे गीतों में शायद शिल्प का कोई स्थान नहीं मिलेगा क्योंकि गीत शिल्प का मैं बिलकुल जानकार नहीं हूँ , जो भाव मन में उठे वे ही लिखे गए ! अतः विद्वान् जनों से क्षमा प्रार्थी हूँ  ! आम लोगों को शायद यह गीत पसंद  आएगा !


फूलों भरी अंजली लेकर तुम पथ भटक यहाँ क्यों आई !
लगता है मन्दिर के बदले, रास्ता भूल चली आई हो !

खड़ी , भव्य दीवारें मेरी
कलश कंगूरे ध्वज और तोरण
घंट ध्वनि, मंत्रोच्चारण से
लगता घर मेरा मन्दिर सा
यह सब सच है !मगर कामिनी पूजा यहाँ न अर्पण करना !
तुमको दुख होगा कि यहाँ पर मन्दिर है पर मूर्ति नहीं है !

बाहर से देवता सरीखा,
सौम्य लगूँ आराध्य सरीखा
तुम मुझसे वर लेने आईं,
मैंने मांग लिया तुमको ही
अब भी जागो स्वप्नसुंदरी, गीत यहाँ न समर्पित करना !
इस सूने मन्दिर में देवी  ! कविता है,  सौन्दर्य नहीं है  !

मीरा जैसा प्यार लुटाती,
घर बाहर की लाज छोड़ कर
शुभ्र पुष्प अंजलि में लेकर,
किस मोहन को ढूँढ रही हो
पूजन लगन देख मनमोहिनि, मैं भी हूँ नतमस्तक तेरा !
तेरी पूजा ग्रहण योग्य, मन्दिर तो है , आराध्य नहीं है !

Sunday, April 18, 2010

कुरआन शरीफ पर कुछ भी लिखने को मेरी कलम नहीं चलती -सतीश सक्सेना

                             विधर्मियों के लिए, हज़ारों वर्ष पूर्व की परिस्थितियों में लिखी गयीं , अन्य धर्मों की पवित्र पुस्तकें पढ़कर, उनकी मज़ाक बनाना बेहद आसान हो जाता है , और आजकल यह कुछ तथाकथित विद्वानों की मेहनत के कारण और भी आम होता जा रहा है !
                             मैंने जब ब्लागिंग शुरू की थी तो सोचा इस देश के दोनों बच्चों  को  मिलाने का प्रयत्न करूंगा ! बहुसंख्यक होने के नाते यह हमारा फ़र्ज़ है कि अल्पसंख्यक समुदाय को किसी भी हालत में असुरक्षित महसूस न होने दें अतः हम बड़े भाई का फ़र्ज़  अदा करने का पूरा प्रयत्न करें ! 
                                अभी कुछ समय से लगता है कि यहाँ किसी को समझाने की आवश्यकता नहीं है यहाँ तो कमर कस रखी है कि दूसरे धर्मों की कमियां लिख लिख कर बताई जायेंगी ! ५ वक्त की नमाज़ पढने वाले, गीता पढ़ाने का प्रयत्न कर रहे हैं ! और विद्वान् पंडित नमाजियों को नमाज़  सिखा रहे हैं !
                                 नफ़रत की आग में जलते इन लोगों को न कुरआन के सम्मान का ख़याल है और ना शास्त्रों  का ! भगवान् न करे कोई अनहोनी घटे सबसे पहले यही कायर बिलों में जा घुसेंगे और हमारे बच्चों को इस आग में जलते देखने का आनंद लेंगे ! 
                                हे  ईश्वर ! अपने घर में, अपने ही बच्चों को खाने की कोशिश करते , इन विषैले  नागों को सदबुद्धि दे ! 

Saturday, April 17, 2010

ज़न्नत और दोज़ख - सतीश सक्सेना

आज सुबह सुबह प्रवीण शाह का एक लेख के ज़रिये धार्मिक असलियत जान भौचक्का सा रह गया ! यह जानकारी किसी के लिए भी नयी नहीं होगी मगर शायद हम लोग उसपर ध्यान नहीं देते हैं ! प्रवीण भाई ने शायद साफ़ साफ़ हमें बताया कि धर्म से हमें क्या मिल रहा है ...... 
ऐसा होगा नर्क-जहन्नुम-Hell
यह कैदखाना कमोबेश सभी जगह एक सा है... प्रताड़नाओं में शामिल है आग से जलाना, भूखा-प्यासा रखना, खौलता पानी शरीर पर डालना, खौलता पानी पीने को देना, बिना इलाज के छोड़ देना आदि आदि... बहुत गंदा और बदबूदार !


नर्क तो आदमी और औरत दोनों का है पर स्वर्ग केवल पुरूषों के लिये ही बनाया प्रतीत होता है अधिकाँश धर्मों मे...यहाँ मिलेंगी अति सुन्दर चिर-कुंवारी, चिर-यौवना अप्सरायें या हूरें... जिसे चाहें भोगें... पानी की जगह नालियों में बहती होगी 'सुरा' या शराब... सुगंध होगी... संगीत होगा... एअर कंडीशनिंग भी होगी वहाँ!
अब यह बात दीगर है कि इन्ही सब चीजों का जिन्दा रहते निषेध करता है हर कोई 'धर्म'...

मैंने टिप्पणी के जरिये प्रवीण भाई से पूछा है कि .....

मौत के बाद जन्नत - तथाकथित धार्मिक लोगों के लिए पाप ( खूब शराब और सुंदरियों के साथ ) करने की जगह, जो धर्म द्वारा ही स्वीकृत है 
मौत के बाद दोज़ख उन्हें - जो बिना धार्मिक परमीशन के, इस जनम में तथाकथित जन्नत ( खूब शराब और सुंदरियों को ) भोगने का प्रयत्न करते हैं ....
क्या करना चाहिए हमें ??

Wednesday, April 14, 2010

आज किसी की रक्षा करने , साईं तुझे मनाने आया !


वर्षों पहले जब इस महानगर में कदम रखा था तो एक सीधे साधे लड़के राकेश से, एक ही कार्यालय में कार्य करने के नाते मित्रता हुई, और उसने रहने के लिए घर की व्यवस्था कराई ! उसके बाद बहुत सी यादें, एक दूसरे की शादी में योगदान...... दुःख के समय में साथ....मुझे याद है राकेश के द्वारा साईं बाबा के मन्दिर में ले जाने की जिद, और मेरा न जाना.....मेरी भयानक बीमारी पर साईं बाबा का प्रसाद लाकर घर में खिलाना और यह विश्वास दिलाना की अब आप ठीक हो जाओगे ! उसकी बहुत जिद और इच्छा थी कि मैं एक दिन उसके साथ शिरडी अवश्य चलूँ, जो मैंने कभी पूरी नही की !

और एक दिन वही, बिना मां,बाप, भाई, बहिन वाला राकेश, गंगाराम हॉस्पिटल पर स्ट्रेचर पर, अर्धवेहोशी, आँखों में आंसू भरे मेरी तरफ़ बेबसी में देख रहा था, तब मेरे जैसा नास्तिक, पहली बार साईं दरबार में विनती करने के लिए भागा !वहीं यह विनती लिखी गयी, बावा को मनाने हेतु , पर शायद बहुत देर हो गई थी......... !

ना श्रद्धा थी , ना सम्मोहन
ना अनुयायी किसी धर्म का
कभी न ईश्वर का दर देखा
अपने सिर को नहीं झुकाया
फिर भी मेरे जैसा नास्तिक,
बावा ! तेरे द्वारे आया !
मुझे नहीं मालुम क्यों, कैसे ? आज चढावा देने आया !

पूजा करना मुझे न आए
मुख्य पुजारी मुझे टोकते
कितनी बार लगा है जैसे
जीवन बीता, खाते सोते,
अगर क्षमा अपराधों की हो
तो मैं भी, कुछ लेने आया
आज किसी की रक्षा करने, का वर तुमसे लेने आया !

आज कष्ट में भक्त तेरा है
उसके लिए चरणरज लागूं
कष्टों की परवाह नहीं है ,
अपने लिए नहीं कुछ मांगू,
पर बावा उसकी रक्षा कर
जिसने तेरा दर दिखलाया
आज ,किसी की जान बचाने, तेरी ज्योति जलाने आया !

कई बार सपनों में आकर
तुमने मुझको दुलराया है
बार - बार संदेश भेजकर
तुमने मुझको बुलवाया है
बाबा तुझसे कुछ भी पाने
मैं फल फूल कभी न लाया !
आज एक विश्वास बचाने , मैं शरणागत बनके  आया !

कितने कष्ट सहे जीवन में
तुमसे कभी न मिलने आया
कितनी बार जला अग्नि में
फिर भी मस्तक नही झुकाया
पहली बार किसी मंदिर में
मैं भी , श्रद्धा लेकर आया !
आज तेरी सामर्थ्य देखने , तेरे द्वार बिलखने आया !
आज किसी की रक्षा करने,साईं तुझे मनाने आया !

Tuesday, April 13, 2010

होमिओपैथी और आपकी असाध्य बीमारियाँ -सतीश सक्सेना

          
आदरणीय दिनेश राय द्विवेदी द्वारा लिखित क्या होमिओपैथी अवैज्ञानिक है ? पोस्ट पर बड़ी मनोरंजक प्रतिक्रियाएं पढने को मिलीं कुछ लोगों को होमिओपथी पर भरोसा था और कुछ इसे नितांत झोला छाप विद्या बता रहे थे !

                 कल यही मैंने अपने मित्र आदरणीय डॉ अमर कुमार , को कहने का प्रयत्न किया था कि जब आप एलोपैथ हो तो उस पैथी से, जिसपर आपका विश्वास ही नहीं है , नाराज क्यों हो ? एक एलोपैथिक डॉ की नाराजी स्वाभाविक है, जब उनके रोगी, उस बीमारी से स्वस्थ होने की खबर उन्हें देते हैं, जो एलोपैथिक नज़रिए से असाध्य है ! तो एक सबसे अधिक पढ़े लिखे आदमी ( एम् बी बी एस , एम् एस ) का झल्ला जाना स्वाभाविक है :-)

               जहाँ तक वैज्ञानिक विवेचना का सम्बन्ध है, तो आज तक विज्ञान ईश्वर शब्द पर ही भरोसा नहीं कर पाया है, तो उसकी बनाई शक्तियों को कैसे पहचानेगा सिर्फ उनके अहसास होने पर, अपने आपको चमत्कृत ही पाता है ! मैंने यहाँ कुछ सज्जनों को बिना समझे ही, होमिओपैथी का मज़ाक बनाते देखा है ! सबूत और इनामी राशि देने की बात कही जा रही है.....

               कम से कम, मैं जो एक होमियोपैथी श्रद्धालु और ३० साल से इन पुस्तकों का एक विद्यार्थी मात्र हूँ, इस मूर्खता पूर्ण बहस को, और चैलेन्ज को स्वीकार नहीं करूंगा, डरने के कारण नहीं बल्कि विद्वान् मगर इस महान वैकल्पिक चिकित्सा के प्रति,नासमझ लोगों की जमात के सामने, अपने आपको खड़ा करने में झिझक के कारण !

              अब आप मेरी शौक से मज़ाक उड़ाइए ... बेहतरीन विश्वासों की ऐसी मज़ाक हज़ारों सालों से, आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा उड़ाई जाती रही हैं सो मैं होमिओपैथी की मज़ाक उड़ाने पर, आपको मुस्कराते हुए शुभकामनायें  देता हूँ !

             आरोप लगने से, पहले मैं बता दूं कि बचपन से अंधविश्वासों और अंध धार्मिक आस्थाओं का घोर विरोधी रहा हूँ ! सवाल सिर्फ अपनी अपनी शिक्षा का और समझ का है !

             मैं एलोपैथिक मत पर विश्वास रखता हूँ परन्तु एलोपैथिक डॉ से बहुत डरता हूँ क्योंकि अक्सर वे भयभीत रोगी से पहला सवाल " क्या करते हो " का ही करते हैं, और बदकिस्मत रोगी अगर सर्जन के सामने हो तो भगवान् ही मालिक है  :-)

            मेरे एक सर्जन मित्र जो एक मशहूर क्लिनिक में कार्य करते थे इस लिए नौकरी छोड़ने को विवश होना पड़ा क्योंकि उन्होंने एक रोगी को, बिना आपरेशन ही ठीक कर दिया था ! आज से लगभग २६-२७ वर्ष पहले दिल्ली के मशहूर आर्थो स्पेशलिस्ट डॉ विरमानी ने मुझे गले में कालर लगाना और मोटर साइकिल छोड़ना अति आवश्यक बताया था ! उस समय स्पोंडलाइटिस के दर्द से कराहते हुए, मैंने अपनी इच्छा शक्ति को चैलेन्ज करते हुए, अपने आपको बिना किसी डॉ से सहायता लिए, ३ महीने में इसी होमिओपैथी से ठीक किया था और तब से आज तक अपने परिवार का ही लाखों रुपया डॉ को देने से और अपने शरीर को गिनी पिग बनाने से बचा लिया !

            मैं यहाँ यह जरूर बताना चाहता हूँ, सैकड़ों गरीबों और जरूरत मंदों की अनगिनत भयानक बीमारियाँ मैंने खुद निशुल्क ठीक की हैं उनमें गैंग्रीन, जिसमें पैर कटाने की तारीख मिल चुकी थी, स्पाइनल स्लिपडिस्क जिसमें ३ ओपरेशन बताए गए थे, आदि बहुत उदाहरण हैं ! इस वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के के कारण मैंने पिछले २५ वर्षों में मैंने अपने परिवार पर, एलोपैथिक डॉ को कोई पैसा नहीं दिया :-)

           अफ़सोस यह है कि होमिओपैथी को जानने वाले सैकड़ों जगह जगह मिल जायेंगे और बीमारी का नाम सुनकर ही दवाएं देने वाले भी हर जगह मौजूद हैं (जिनके कारण होमिओपैथी बदनाम है ) !अतः होमिओपैथी का इलाज़ करते समय डॉ का चुनाव बहुत अहम् है !


          मेरा विश्वास है कि अगर कोई होमिओपैथिक डॉ आपके मानसिक व्यव्हार को भली भांति जानता है तो और आपको ठीक करना चाहता है तो भयानक और असाध्य बीमारियों को भी आसानी से ठीक कर सकता है !

          अगर आप सही समझ के साथ पिछले १० वर्षो से होमिओपैथी के प्रभाव में हैं तो यकीन करें कि आपकी उम्र, सामान्य से १० वर्ष अधिक होगी !

          होमिओपैथी एक आश्चर्यजनक विधा है और कुशल डॉ की देख रेख में ,बेहद खतरनाक बीमारियों से तुरंत आराम दिलाती है !

Sunday, April 11, 2010

वहीं रचा जाता है गीत -सतीश सक्सेना

वर्षों  पहले  कुछ दोस्तों की चलते फिरते फरमाइश रहती थी कि कोई गीत अभी लिख कर दिखाओ  और मैं हमेशा मना करने पर मजबूर होता था कि कम से कम मेरे लिए यह संभव ही नहीं है ,कविता और गीत लेखन न कभी सीखा और न सीखना चाहता हूँ , जो मन में भाव उठाते हैं कभी कभी गीतों का रूप ले जाते हैं ... शायद इन्ही दोस्तों के कारण एक दिन यह गीत लिख गया था ...इसे पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ !  



सरल भाव से सबको देखे,
करे सदा सबका सम्मान
अपना अथवा गैर न जाने
सबका स्वागत करे समान
ममता, करुणा, श्रद्धा रहती , उसी जगह होता संगीत !
निश्छल मन और दृढ विश्वास,वहीं रचा जाता है गीत !

प्रिये गीत की रचना करने,
पहला कवि जहाँ बैठा था
अश्रु आँख में भरकर उसने
गाया वो अपूर्व मीठा था
कष्ट मिट गए होंगे सबके,जो सुन पाया पहला गीत !
निश्चय ही वसुधा के मन में , फूट पड़ा होगा संगीत !

कविता नहीं प्रेरणा जिसकी,
गीत नहीं, भाषा है दिल की
आशा और रुझान जहाँ पर,
प्रिये वही रहता है, गीत !
शब्दकोष हाथों में लेकर कब लिख पाया कोई गीत !
दिल की भाषा सारे जग में, करें प्रसारित मेरे गीत !

Saturday, April 10, 2010

ये पुरुष -सतीश सक्सेना

मैं मेट्रो द्वारा घर से आफिस जाते हुए,एक बात अक्सर नोट करता हूँ उसे लेकर जो कुछ दिमाग में आया  वह  "मानसिक हलचल "करने के लिए स्वाभाविक था ! सोचा क्यों न आप सबसे बाँट लूं  !  

  • अधिकतर जगह पर खड़ी महिलाओं के सामने बैठे पुरुषों  को गहरी नींद आ रही होती है  , चेहरे पर भारी थकान का भाव, जैसे कई दिनों बाद सोने को मिला है !

Friday, April 9, 2010

हमारे आसपास ये "रिटायर" लोग -सतीश सक्सेना

                                     पहली मुलाक़ात खुशदीप सहगल से  अविनाश वाचस्पति के यहाँ हुई थी ! उनसे थोड़ी देर बात करके लगा कि जैसे यह एक मिनी ब्लागर मीट न होकर सत्संग हो गया हो ! मुहल्ले के वृद्धों के वारे में कुछ करने का सुझाव, खुशदीप सहगल से पाकर लगा कि संत नगर में आना सफल हो गया है , यह सुझाव मेरा एक बहुत पुराना सपना है जिसे खुशदीप सहगल भी देख रहे थे !
                                     याद करिए अपने बचपन के दिनों को जब वे घर में आते थे तो हाथ में पकडे थैले में  पड़े सामान को जानने की उत्कंठा हम सबमें रहती थी और सुबह ऑफिस जाते समय व्यस्त अम्मा की तेज झल्लाती आवाज , छुट्टी के दिन पापा का  मनपसंद भोजन और शाम को अक्सर बाहर की पार्टी  आदि ....
                                      पूरे जीवन जिसने सारे घर का जिम्मा लेकर बड़ी शान से अपना समय व्यतीत किया , वही आज कार्य से रिटायर हो चुके हैं ! अब किसी को समय नहीं है उनसे बात करने के लिए ...पूरे दिन अखबार  में मुंह छिपा कर व्यस्त दिखने का प्रयत्न करते यह अब घर के मुखिया पद से भी रिटायर कर दिए गए हैं ! ६० साल बाद सरकार से रिटायर और ६१ साल में धीरे धीरे घर से सारी शक्तियां छीन ली गयीं !
                                        घर में पड़े पड़े बोर न हों अतः सुबह दूध सब्जी लाने और बच्चे को घुमाने का काम सौपा गया है ! किटी पार्टी के दिन बाहर रहने की हिदायत है ! मोहल्ले में अपने को व्यस्त रखने के लिए  चौकीदारों की व्यवस्था , उनके लिए पैसे कलेक्शन करने हेतु, हर घर जाकर चंदा इकट्ठा करने के कारण "मम्मी चौकीदार अंकल आये हैं " जैसी पहचान बन गयी है !

Thursday, April 8, 2010

कहाँ हैं आप सब ? समस्त बड़े छोटों से विनम्र अपील - सतीश सक्सेना

         कहाँ हैं आप सब ? क्यों नहीं बोल रहे अपने ही घर में हो रहे इस अघोषित शीतयुद्ध पर ?
           उस घर में कभी शांति नहीं हो सकती जब तक बच्चों के वैमनस्य पर बड़े खामोश बैठे रहें  ! यहाँ पर बड़ों से तात्पर्य उम्रदराज होने से नहीं बल्कि समझ और परिपक्वता से है ! आपस में एक दूसरे को बुरा भला कहते हम लोग, एक दूसरे की आस्थाओं ,मान्यताओं पर जम कर गालीगलौज करते हमारे देश वासी,नफरत के सैलाब की और बढ़ रहे हैं यह कोई शुभ शकुन नहीं है फिर आपकी खामोशी का क्या मतलब है ! मुझे नहीं लगता जहरीले  माहौल पर न बोलना या उस समय उदासीन होना माहौल को शांत कर देगा !

                              ये बबूल के  बीज घर में डाले जा रहे हैं और समझदार लोग भी रोते हुए इन्हें सींच रहे हैं ! अपमान के कष्ट में रोते हुए इन विद्वान्, मगर कम उम्र जिद्दी बच्चों को, समझाने की शक्ति, किसी एक के बस की नहीं है अगर हम सबके हाथ नहीं मिले तो यह सुगन्धित दिया बुझ जाएगा जिसे जलाए रखने का प्रयत्न हम जैसे कुछ लोग कर रहे हैं  !
                            अतः आप सबसे प्रार्थना है कि एक ही घर के दो बच्चों में, बढती वैमनस्यता की खाई पाटने में मदद करने आगे आयें जिससे कि हँसते हुए, साथ बैठने उठने  का जज्बा पैदा हो ! मुझे पूरा विश्वास है कि देश का जनमानस इस अपील पर अवश्य ध्यान देगा ! अविश्वास के माहौल में कम से कम एक बात मान जाएँ  !
"जिस बात से हमारा दिल दुखता है वही हम दूसरों से न कहें "

Tuesday, April 6, 2010

याद तो फिर भी आओगे - सीमा गुप्ता !

                                पंकज सुबीर की पहचान शक्ति की तारीफ़ करनी होगी !  सीमा गुप्ता के  कविता संकलन  की पहली लाइनें ही दिल छू गयीं और इस लेख का शीर्षक बन गयीं  ! कुछ लम्हे पर  पंहुचते ही महसूस हो जाता है कि आप किसी असीमित क्षमता के धनी ,भावुक कलाकार के घर आये हैं  ! इस रचना में उठाया विषय बिछड़ों के बारे में हैं ,क्या हमारे जीवन से दूर चले जाने वाले हमारे अपने, कभी भी हमारी यादों से धूमिल हो पाते हैं ? 
  
"ह्रदय के जल थल पर अंकित 
चित्र  ! धूमिल कर  जाओगे !
याद  तो फिर भी  आओगे  !"


हँसना रोना ,  गीत  पुराना  !
सुर सरगम का साज बजाना 
शब्द ताल ही ले जाओगे ...
याद तो , फिर भी आओगे  !


सूनी राहें दिल थाम के चलना 
साथ  बिठाये पलों का  छलना 
यही,  खाली  कर  जाओगे ...
याद तो ,  फिर भी  आओगे   ! 


                                  अपनों से दूर होने की व्यथा की ऐसी गहरी अभिव्यक्ति और बिछड़ गए इन अपनों से, यह उदास शिकायत, शायद हर संवेदनशील ह्रदय के जीवन का एक भाग होगी ,जिसे हम व्यक्त नहीं कर पाए  और सीमा ने बेहद खूबसूरती से व्यक्त कर दिया ....

Sunday, April 4, 2010

अम्मा , भीख मांगने आती है ! - सतीश सक्सेना

                             योगेन्द्र मौदगिल   कहने को तो हास्य कवि हैं मगर जब भी मैंने उन्हें पढ़ा , हर बार
एक एक प्रभाव एक छाप रह गयी दिल पर  ! गज़ब की धार है उनकी रचनाओं में ! आज उनकी एक सूक्ष्म रचना पढी तो यह दो लाइनें ही हिला गयीं !
" चौराहे की मिटटी को भई जम कर लज्जा आती है 
 दर्जन भर बेटों  की  अम्मा , भीख  मांगने  आती है !"
                     जिस माँ ने अभावों में जिन्दगी काटते हुए हमारा भविष्य बनाने के लिए अपने बचाई हुई सारी पूँजी लुटा दी और हमारी पढाई और भविष्य की चिंता में अपने बुढापे के लिए, कुछ न बचाया , उस अम्मा को  हमने क्या दिया ? 
                     इस मार्मिक रचना में , शायद ही कुछ बचा होगा जो कवि ने कह न दिया हो , लज्जा इंसानों को या बेटों को तो आने से रही , तो कवि  किससे उम्मीद करे सिवाय चौराहे की मिटटी के अलावा , लज्जा तो धरती की  मिटटी को ही आयेगी ! 
                    क्या उस के प्यार का एक अंश भी हम दे पा रहे हैं ! और हमें अपने ऊपर लज्जा भी नहीं आती  ?



Friday, April 2, 2010

डैथ ट्रेप : जब मेरा पूरा परिवार मौत से बाल बाल बचा था ! - सतीश सक्सेना


वह रात मेरे परिवार के लिए, जीवन की सबसे बुरी रात थी और शायद उस दिन हमें किसी अद्रश्य शक्ति ने बचा लिया था अथवा आज यह लेख लिखने को भी जीवित नहीं बचते !
जून १९८८ की रात , नॉएडा में पूरी रात बिजली नहीं थी ११-१२ बजे तक तो पसीने से भीगे हुए जागते रहे, दोनों 
बच्चों (गौरव ८ वर्षीय और गरिमा ३ वर्षीय )को बेहाल देख , मैंने केनोपी में खडी मारुति ८०० के एयर कंडिशनर के ध्यान आया और हम पति पत्नी, दोनों बच्चों को लेकर गाडी में बैठ गए ! खडी गाड़ी को स्टार्ट कर, ऐ सी चला दिया , पसीने में सराबोर हम सबको इस ठंडक को मिलते ही ऐसा लगा कि जैसे एक वरदान मिल गया हो ! देखते ही देखते नींद कब आ गयी पता ही न चला !

पता नहीं शायद अचानक गुडिया की आवाज सुनकर मेरी नींद खुली , और मैंने अन्दर की लाइट जलाने के लिए हाथ उठाया तो लगा जैसे हाथों में दम नहीं रही , लाइट जलते ही मैंने अर्धबेहोशी की हालत में गौरव को सीट के नीचे बेहोश गिरा पाया और गुडिया पिछली सीट पर हाथ पैरों को, अजीब तरह से पटक रही थी ! खतरे का अहसास होते ही मैंने दरवाजा खोला ,गिरता पड़ता बाहर निकला उस समय खुले लान में चारो तरफ धुआं ही धुंआ था ! शरीर बिलकुल काबू में नहीं था , पत्नी को चीख कर कहा बच्चो को जल्दी बाहर निकालो मगर उनकी स्थिति भी काबू में नहीं थी ! पता नहीं कहाँ से ताकत आ गयी मुझमें ! गाड़ी को बाहर रोड पर लाकर खडी की , बापस घर में आकर बच्चों को गोद में लेकर, लगभग भागते हुए गाडी में डाला , और नॉएडा मेडिकेयर सेण्टर कैसे पहुंचा हूँ, कुछ याद नहीं ! डॉ से जाते ही कहा तुरंत ओक्सिजन चाहिए ,गैस पोइजन के शिकार हैं हम लोग ! सबसे पहले बच्चों को ओक्सिजन दी गयी ! लगभग ३० मिनट में हम लोग व्यवस्थित हो पाए ! डॉ के हिसाब से अगर ५ मिनट हम और सोते रहते तो शायद कोई नहीं बचता !

कई साल बाद जब मैंने अखबार में, गराज के अन्दर खड़ी गाड़ी में, दो बच्चों की लाशें मिलने की खबर पड़ी तो मैंने एरिया डी सी पी को फ़ोन करके अपनी घटना बताई तो वे भी अचम्भे में रह गए थे !

उस रात बिलकुल हवा नहीं चल रही थी , एग्ज्हास्ट पाइप से निकला धुआं गाड़ी के चारो ओर जमा हुआ और चलते एयर कंडिशनर ने धुंए को फिल्टर करते हुए कार्बन मोनो आक्साइड को अन्दर खींच लिया ! अगर मेरी नींद न खुलती तो ......??
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