Wednesday, August 12, 2009

एक कवि का दर्द !!

"जिन्दगी से थका हारा ये योद्धा आज आत्मसमर्पण करता है क्योंकि वो औरों के लिए जिया और अपनी शर्तों से ज्यादा दूसरों की भावनाओं को मान देता रहा."....
.....
हे घाव देने वालों, तुम जीत गये. मेरी जिन्दगी की समझ, जो संस्कारों से मैने पाई थी और बदलते सामाजिक मूल्यों में अपनी मान्यता खो चुकी मेरी कल्पना की उड़ान हार गई. अब जो चाहो, मेरे साथ सलूक करो मैं प्रतिरोध नहीं करुँगा. मैं एक हारा हुआ योद्धा हूँ - खुद की करनी के चलते, इसमें किसी का कोई दोष नहीं "


"जिन्दगी से थका हारा ये योद्धा आज आत्मसमर्पण करता है क्योंकि वो औरों के लिए जिया और अपनी शर्तों से ज्यादा दूसरों की भावनाओं को मान देता रहा."


बढ़ती उम्र के साथ शक्तिहीनता का अहसास, और इस वक्त अपनों का साथ न देना, किसी भी योद्धा की जीवनीशक्ति को धराशायी करने के लिए पर्याप्त है ! जिनके लिए, अपने सुख की विना परवाह किये, पूरे जीवन संघर्ष रत रहे वे सब अपने अगर जीवन के उत्तरार्ध में एक साथ इकट्ठे होकर, उँगलियाँ उठाना शुरू कर दें तभी ऐसे अवसाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है !

पूरे जीवन सबको हंसने और हँसाने का मंत्र देने वाले,महारथी , कई बार अपने आपको खुद कितना असहाय और कष्टपूर्ण स्थिति में पाते हैं और ऐसे में उनका साथ देना वाला कोई नहीं होता !

इस दर्द में एक शायर का शेर याद आ रहा है ....

"यकीं ना आये तो इक बात पूछ कर देखो ,
जो हंस रहा है वो जख्मों से चूर निकलेगा !"

और बच्चन जी की यह पंक्तियाँ..

"जिसके पीछे पागल होकर
मैं दौरा अपने जीवन भर
जब मृगजल में परिवर्तित हो
मुझ पर मेरा अरमान हंसा , तब रोक न पाया मैं आंसू !
मेरे पूजन आराधन को
मेरे सम्पूर्ण समर्पण को
जब मेरी कमजोरी कहकर
मेरा पूजित पाषाण हंसा , तब रोक न पाया मैं आंसू !"

मगर गहन अवसाद में डूबे हुए इस निर्मल ह्रदय कवि को, मैं अपनी लिखित इन पंक्तियों के द्वारा, इस गहरी नींद से जगाना अवश्य चाहूँगा...

दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

समझ प्यार की नही जिन्हें है
समझ नही मानवता की
जिनकी अपनी ही इच्छाएँ
तृप्त नही हो पाती हैं ,
दुनिया चाहे कुछ भी सोचे कभी न हाथ पसारूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

चिडियों का भी छोटा मन है
फिर भी वह कुछ देती हैं
चीं चीं करती दाना चुंगती
मन को हर्षित करती हैं
राजहंस का जीवन पाकर क्या भिक्षुक से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

विस्तृत ह्रदय मिला इश्वर से
सारी दुनिया ही घर लगती
प्यार नेह करुना और ममता
मुझको दिए विधाता ने
यह विशाल धनराशि प्राण अब क्या में तुमसे मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

जिसको कहीं न आश्रय मिलता
मेरे दिल में रहने आये
हर निर्बल की रक्षा करने
का वर मिला विधाता से
दुनिया भर में प्यार लुटाऊं क्या निर्धन से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

गर्व सदा ही खंडित करता
रहा कल्पनाशक्ति कवि की
जंजीरों से ह्रदय और मन
बंधा रहे गर्वीलों का ,
मैं हूँ फक्कड़ मस्त कवि, क्या गर्वीलों से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

Tuesday, August 11, 2009

समीर लाल का दर्द !


"जिन्दगी से थका हारा ये योद्धा आज आत्मसमर्पण करता है क्योंकि वो औरों के लिए जिया और अपनी शर्तों से ज्यादा दूसरों की भावनाओं को मान देता रहा."

समीर लाल के यह शब्द और यह लेख पढ़ कर ऐसा महसूस हुआ कि इस शानदार संवेदनशील व्यक्तित्व को कोई गहरा आघात लगा है, और वह भी किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसे यह अपना मानते रहे हैं !

कुछ लोग संवेदनशीलता का मज़ाक ही नहीं उडाते बल्कि उन्हें कमज़ोर,मूर्ख और नपुंसक जैसे शब्द कहते हुए, यह सबूत देते नज़र आयेंगे कि आप सर्वथा अयोग्य हैं और इन लोगों को कोई सरोकार नहीं कि समीर के दिल में उस व्यक्ति के प्रति भी कोई दुर्भावना नहीं है बल्कि वे हर समय विनम्रता के साथ, सेवा भाव लिए, हाथ जोड़े तत्पर हैं !

इस दुनिया में निस्वार्थ किसी अन्य की मदद करने का अर्थ, अपने प्यार, स्नेह और सेवा भाव पर शक का प्रश्नचिंह लगवाना है और ब्लाग जगत में तो ऐसे उदाहरण हर जगह नज़र आयेंगे !

मगर भौतिकता वादी जगत के रहने वाले सामान्य नागरिकों को , जिन्हें बात बात में "बदले में" , "हमें क्या फायदा.."कोई क्या समझेगा " "मेरा है " जैसे तकिया कलाम, बचपन से पारिवारिक विरासत के स्वरुप में मिले है, क्या यह संवेदनशीलता को समझ पाएंगे ? क्या कुछ लोग इस योग्य भी हैं कि वे इस दर्द को महसूस भी कर सकें !

भावुक और सच्चे इंसान प्यार के लायक ही होते हैं ! ऐसे लोगों को अगर सहयोग या सम्मान देना नहीं सीख पाए हैं, तो कम से इनका अपमान नहीं करना चाहिए .... आज के निष्ठुर समय में ऐसे लोग वास्तव में दुर्लभ हैं !

ऐसे प्यारों के साथ सम्मान और इज्ज़त का ही व्यवहार होना चाहिए जिसके यह सर्वथा योग्य है !

Tuesday, August 4, 2009

आधुनिक पीढी से !

क्या आपको कभी कभी ऐसा लगता है ?
-कि अपने व्यस्त समय के कारण, कुछ बहुत आवश्यक चेहरों को भूलता जा रहा हूँ ! एक समय, जिन चेहरों के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता था, आज वे धुधले पड़ते जा रहे हैं !!
-आजकल बीमार माँ की अब उतनी याद नहीं आती जिसकी उँगलियों से खाया खाना, कभी तृप्ति का पर्याय लगता था !!
-इन दिनों असहाय और कमज़ोर पिता की भी, अब उतनी याद नहीं आती जिसकी उंगली पकड़ कर, मैं अपने आपको, दुनिया का सबसे शक्तिशाली बच्चा समझता था !!
-दुनिया में सबसे अधिक मुझे प्यार करने वाली बहिन या भाई, को जानबूझ भुलाने का प्रयत्न करना !!

बहुत आसान होता है अपनी जिम्मेवारियों से मुक्त हो जाना...... बस अपनी सोच को थोडा सा परिवर्तित करना है, और हमें सारी समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है ! !
-सोचिये कि आपके माता-पिता आर्थिक तौर पर सर्व समर्थ हैं और वे मेरे बिना भी अपनी समस्याएं सुलझा सकने में समर्थ हैं !!
-सोचिये कि माँ को कोई बीमारी नहीं हैं क्योंकि वे आज भी अपना सारा काम बखूबी अंजाम देती हैं !!
-सोचिये कि बहन भी मुझे अब पहले जैसा प्यार नहीं करती !!
और यकीन रखें माँ बाप की यह मजबूरी है कि वे बच्चों के सामने अपने आपको स्वस्थ और हंसमुख दिखाने का प्रयत्न करते रहें, और पड़ोसियों और मित्रों के सामने हमेशा की तरह आपकी तारीफ करते रहें !!

Saturday, August 1, 2009

डॉ अमर ज्योति के जन्मदिन पर !

आज सुबह सुबह, डॉ. अमर ज्योति के जन्मदिन के अवसर पर, माँ शारदा पुत्र - राकेश खंडेलवाल की चार पंक्तियाँ पढ़कर अनायास मेरे जैसे लापरवाह व्यक्ति को भी, अमर ज्योति की कुछ रचनाओं की याद आगई !

अपना कष्ट भूल कर ( लम्बे समय से डॉ अमरज्योति एक सड़क दुर्घटना के कारण लगभग बिस्तर पर ही हैं ) कमज़ोर, गरीबों के बारे में हमारी आँखे खोलने का प्रयत्न करते अमर वास्तव में माँ शारदा के सच्चे सुपुत्र हैं ! अंधे बहरे समाज के लिए उन्होंने वह सब लिखा जो हमारी आँखे खोलने को पर्याप्त होता.... अमर ज्योति लेखकों से कहते हैं ...
राजा लिख और रानी लिख, फिर से वही कहानी लिख , बैठ किनारे लहरें गिन, दरिया को तूफानी लिख गोली बारी में रस घोल रिमझिम बरसा पानी लिख रामराज के गीत सुना हिटलर की कुर्बानी लिख राजा को नंगा मत बोल परजा ही बौरानी लिख फिरदौसी के रस्ते चल , मत कबीर की बानी लिख

उपरोक्त कविता में आज के लेखकों पर तीखा व्यंग्य है , उनकी अधिकतर कवितायें कमजोरों और जीवन को ढोते हुए लोगों का प्रतिनिधित्व करती है ! उनकी हर ग़ज़ल, दर्द में तडपती हुई जिंदगियों की, हकीक़त दिखाती नज़र आती है !

एक गरीब विधवा रज्जो की अम्मा का शब्दचित्रण देखिये आपको एक जवान बेटी की विधवा गरीब माँ के जीवन का यह चित्र बहुतों के लिए शायद कल्पना ही होगा मगर अगर आप बुंदेलखंड के किसी सुदूर ग्राम में जाएँ तो यह आम समस्या है !

राम के मंदिर पर लिखते हुए अमर को अपने देश में कप प्लेट धोते लव कुश याद आ रहे हैं ! इनका पूछना है कि "रख सकेंगे क्या अंगूठे को बचा कर एकलव्य;रामजी के राज में शंबूक जी पायेंगे क्या!"

एक और बानगी देखिये- कि कुछ लोगों को शायर और कवियों के लिए पसंदीदा मौसम सावन और बदली छाये माहौल से दहशत होती है, बदली के छाने से .....यह भी जीवन है ! कितने लोग इनके बारे में सोचते हैं

डॉ अमर ज्योति random rumblings की रचना को एक बार पढ़ कर मन नही भरता ! हर रचना एक वास्तविक चित्रण करती है एक सच्चाई का जिसको हम आम जीवन में नज़रन्दाज़ करते हैं ! विनम्रता की हालत यह है, अपने परिचय में एक पूरी लाइन भी नही लिखी ! जनाब इंग्लिश साहित्य में Ph.D. हैं, और सेवा हिन्दी की कर रहे हैं ! डॉ अमर ज्योति जैसे स्वच्छ लेखक हिन्दी जगत की आंख में गुलाब जल के समान हैं जो बेहद शीतलता देते हैं !

जन्मदिन पर मेरी शुभकामनयें और ईश्वर से प्रार्थना है ,वे इस लम्बी बीमारी से शीघ्र ठीक होकर सानन्द जीवन व्यतीत करें !
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