Saturday, August 23, 2008

भारत मां के यह मुस्लिम बच्चे ! (दूसरा भाग)

आज नवभारत टाईम्स के पहले पेज पर दो पर्दानशीं हिन्दुस्तानी लड़कियों की गोद में, बाल कृष्ण को, मोर मुकुट, पीले वस्त्र, लंबा तिलक धारण किए, देखा तो बरबस ही भक्त सूरदास के पद याद आ गए !

"अखियाँ हरि दर्शन की प्यासी ।देखो चाहत कमल नयन को, निस दिन रहत उदासी ॥केसर तिलक मोतिन की माला, वृंदावन के वासी ।"
उक्त चित्र इतना सुंदर था कि समझ नही आता कि तारीफ कैसे करूँ, भावः विह्वल एक चित्र कर सकता है ? कल्पना से परे कि बात लगती है ! अपनी इन मुस्लिम बहनों को प्रणाम, साथ ही नवभारत टाईम्स की जागरूकता को भी !
-लोगो से सुना था कि हमारे मुस्लिम दोस्त, बहुत कट्टर होते हैं, अपने धर्म के अलावा औरों को पसंद नही करते हैं ! उनको एक शानदार जवाब इन मुस्लिम लड़कियों ने जन्माष्टमी के त्योहार पर अपने बच्चों को कृष्ण रूप देकर दिया है ! क्या सुनी सुनाई मानसिकता थी मेरी, मैं आज अपनी उस सोच पर सचमुच शर्मिन्दा हूँ !

Saturday, August 16, 2008

ये समझ नहीं आता इनको -सतीश सक्सेना

स्वतंत्रता दिवस पर उग्रवादियों और तथाकथित जेहादियों को एक संदेश ! 

लूटें घर को, मारें मां को
पल पल में, हुंकारे भरते
गर्दन ऊंची, छाती चौडी,
है शर्म नाम की चीज नहीं,
जब बाल पकड़ यमराज इन्हें,

परदेश में लाकर मारेगा !
तब आँख, फटी रह जायेगी , कोई न बचाने  आयेगा  ! 


किसको धमकी तुम देते हो ,
लाखों मरने को हैं तैयार !
बच्चों का रक्त बहाने को
आओ लेकर सब हथियार!

मारो बम कितने मारोगे, 
इक दिन ऐसा भी आयेगा !
जब, मौत तुम्हारी आने पर , आंसू कोई न बहायेगा !

तुम मासूमों का खून बहा,
ख़ुद को इंसान बताते  हो
औ मार नमाजी को बम से
इस को जिहाद बतलाते हो

जब मौत तुम्हारी आयेगी,
तब कोई न फूल चढ़ायेगा !
मय्यत में कंधा देने को , घर से भी न कोई आयेगा !


Monday, August 11, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री के नाम ! ( चौथा भाग )


यहाँ एक दुखी पिता अपनी लाडली को विवाह की आवश्यकता बताने, समझाने का प्रयत्न कर रहा है ! भारतीय समाज की सबसे मजबूत गांठ, आज पाश्चात्य सभ्यता समर्थन के कारण खतरे में है ! नारी अपने बिभिन्न रूपों को भूल कर अपने एक ही रूप को याद करने का प्रयत्न कर, तथाकथित जद्दोजहद कर रही है ! एवं आधुनिकीकरण की तरफ़ भागता समाज, हमारी शानदार व्यवस्था भूल कर चमक दमक में खो रहा है ! ऐसे समय में ,यह कविता बहुतों के माथे पर बल डालेगी, मगर यह एक भारतीय पिता की भेंट है अपनी बेटी को !

बचपन यहाँ बिताकर अब तुम
अपने नए निवास चली हो !
आज पिता की गोद छोड़ कर
करने नव निर्माण चली हो !
केशव का उपदेश याद कर, 

कर्म भूमि में तुम उतरोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

इतने दिन तुम रहीं पिता की
गोद , 
मातृ  का मान बढाया,
अब जातीं घर त्याग अकेली
एक नया संसार बसाया ,
जब भी याद पिता की आये ,

अपने पास खड़े पाओगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

कोई नन्हा जीवन तेरा ,
खड़ा हुआ बांहे फैलाए !
इस आशा के साथ,उठाओगी
तुम , अपनी बांह पसारे !
ले नन्हा प्रतिरूप गोद में , 

ममता मयी तुम्ही दीखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही लगोगी !

श्रष्टि नयी की रचना करने,
विधि है, इंतज़ार में तेरे !
सुन्दरता की नन्ही उपमा
खड़ी, तुम्हारी आस निहारे
तृप्ति मिलेगी रचना करके

मां की गरिमा तुम्हे मिलेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्ही रहोगी !

नर नारी के शुभ विवाह पर
गांठ विधाता स्वयं बांधते,
शायद देना श्रेय तुम्ही को
जग के रचनाकार चाहते !
जग की सबसे सुंदर रचना 

की निर्मात्री तुम्ही रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्ही रहोगी !

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