Sunday, July 27, 2008

पता नहीं मां ! सावन में यह आँखें क्यों भर आती हैं - सतीश सक्सेना

जिस दिन एक बेटी अपने घर से, अपने परिवार से, अपने भाई,मां तथा पिता से जुदा होकर अपनी ससुराल को जाने के लिए अपने घर से विदाई लेती है, उस समय उस किशोरमन की त्रासदी, वर्णन करने के लिए कवि को भी शब्द नही मिलते !
जिस पिता की ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई, उन्हें छोड़ने का कष्ट, जिस भाई के साथ सुख और दुःख भरी यादें और प्यार बांटा, और वह अपना घर जिसमे बचपन की सब यादें बसी थी.....इस तकलीफ का वर्णन किसी के लिए भी असंभव जैसा ही है !और उसके बाद रह जातीं हैं सिर्फ़ बचपन की यादें, ताउम्र बेटी अपने पिता का घर नही भूल पाती ! पूरे जीवन वह अपने भाई और पिता की ओर देखती रहती है !

राखी और सावन में तीज, ये दो त्यौहार, पुत्रियों को समर्पित हैं, इन दिनों का इंतज़ार रहता है बेटियों को कि मुझे बाबुल का या भइया का बुलावा आएगा ! अपने ही घर को  वह अपना नहीं कह पाती वह मायके में बदल जाता है ! !
नारी के इस दर्द का वर्णन बेहद दुखद है  .........

याद है उंगली पापा की 
जब चलना मैंने सीखा था ! 
पास लेटकर उनके मैंने 
चंदा मामा  जाना था !
बड़े दिनों के बाद याद 
पापा की गोदी आती है  
पता नहीं माँ सावन में, यह ऑंखें क्यों भर आती हैं !

पता नहीं जाने क्यों मेरा 
मन , रोने को करता है !

बार बार क्यों आज मुझे
सब सूना सूना लगता है !
बड़े दिनों के बाद आज, 
पापा सपने में आए थे !
आज सुबह से बार बार बचपन की यादें आतीं हैं !

क्यों लगता अम्मा मुझको

इकलापन सा इस जीवन में,
क्यों लगता जैसे कोई 
गलती की माँ, लड़की बनके,
न जाने क्यों तड़प उठी ये 
आँखे झर झर आती हैं !
अक्सर ही हर सावन में माँ, ऑंखें क्यों भर आती हैं !

एक बात बतलाओ माँ , 

मैं किस घर को अपना मानूँ 
जिसे मायका बना दिया या 
इस घर को अपना मानूं !
कितनी बार तड़प कर माँ 
गुड़िया की यादें आतीं हैं !
पायल,झुमका,बिंदी संग , माँ तेरी यादें आती हैं !

आज बाग़ में बच्चों को
जब मैंने देखा, झूले में ,

खुलके हंसना याद आया है,
जो मैं भुला चुकी कब से
नानी,मामा औ मौसी की 
चंचल यादें ,आती हैं !
सोते वक्त तेरे संग, छत की याद वे रातें आती हैं !

तुम सब भले भुला दो ,
लेकिन मैं वह घर कैसे भूलूँ 
तुम सब भूल गए भैय्या

पर मैं वे दिन कैसे भूलूँ ?

छीना सबने आज मुझे 
उस घर की यादें आती हैं,
बाजे गाजे के संग, बिसरे घर की यादें आती है !

Sunday, July 20, 2008

अम्मा ! -सतीश सक्सेना

किस अतीत की याद आ रही 
कौन ध्यान में तुम खोई हो !
चारों धामों का सुख लेकर,
किस चिंता में पड़ी हुई हो !
ममतामयी कष्ट में पाकर, 
सारी खुशियां खो जाएंगी 
एक हँसी के बदले घर में , फिर से मस्ती छा जायेगी !

सारे जीवन , हमें हंसाया, 
सारे घर को स्वर्ग बनाया,
कितने कष्ट उठाकर तुमने
हम सबको मजबूत बनाया
तुमको अब कष्टों में पाकर,
खुशियाँ कैसे हंस पाएंगी !
एक हँसी के बदले अम्मा, फिर से रौनक आ जायेगी !

कष्ट कोई न तुमको आए
हम सब तेरे साथ खड़े हैं,
क्यों उदास है चेहरा तेरा,
इन कष्टों में साथ खड़े हैं !
ऐसे दुःख में अम्मा मुंह में, 
कैसे रोटी चल पाएगी !
एक हँसी के बदले अम्मा, घर में दीवाली आयेगी !

सबका, भाग्य बनाने वाली,
सबको राह दिखाने वाली
क्यों सुस्ती चेहरे पर आयी
सबको हँसी सिखाने वाली 
तुमको इस दुविधा में पाकर ,
घर में मायूसी छायेगी !
तेरी एक हँसी के बदले,सबकी दुनियां खिल जायेगी !

भारत मां के ये मुस्लिम बच्चे ! (प्रथम भाग)


"...............हिंदी लेखन-पत्रकारिता में जान खपा रहे मुस्लिम साथियों की दर्द-ए-दास्तान बहुत तवील है भाई ।फिर कभी. कहीं नागवार गुजरी हों तो क्षमा करेंगे."
आपका अनुज
शहरोज

उपरोक्त लाइने एक मर्म स्पर्शी ख़त का हिस्सा है ,जो शहरोज ने मुझे लिखा हैं ! शहरोज एक हिन्दी विद्वान्, जिससे मेरा परिचय सिर्फ़ चंद खतों तक सीमित है, जिसने मेरी रचनाओं को छपवाने के लिए, अपनी सहायता का वायदा किया, उस दिन मुझे यह बिल्कुल आभास नहीं था की जो अपनी रचनाओं को छपवाने के लिए ख़ुद परेशान है, वह अपनी परेशानी भूल कर मेरी मदद को आगे आ रहा है ! प्रकाशकों और सरकारी तंत्र का चक्कर लगाते हुए भी शहरोज, हम जैसे अनजान लोगों की मदद में तत्पर नजर आते हैं !
"शब्द सृजन" को लिखे गए मेरे एक लाइन के पत्र ( ६ जुलाई ०८ ) "मेरे निम्न लिंक्स पर क्लिक कर, अगर छपने योग्य हों तो कृपया सूचित करें ! मैं अपना मूल्यांकन करने मैं असमर्थ हूँ " का शहरोज़ ने इस प्रकार जवाब दिया,
"रचनाकार होने और प्रकाशनों में काम करने के दोरान मिले अनुभव से ये जाना कि पुस्तक प्रकाशन और खरीद बिक्री , फिर लेखकों की रोयल्टी में कितनी बेईमानी शैतानी होती है .ऐसा नहीं है कि कथित मुख्य धारा के नामवर लेखक इन से अनजान हों .चकित करने वाला और शोक की सूचना ये है कि कई जगहों पर ये नामी-गरामी साहित्यकार प्रकाशकों की मदद करते ही दिखलाई देते हैं .यदि आपका कोई आका नहीं है तो पुस्तक प्रकाशन के लिए शायद ही कोई प्रकाशक मिले"इन सारी विषम परिस्थितियों के मद्देनज़र हम कुछ नवजवान मित्रों ने प्रकाशन योजना की शुरुआत की है .-हमारा उद्देश्य लाभ अर्जन न होकर साहित्य -सेवा कहूँ तो अत्युक्ति नहीं .-ये एक समान धर्मा युवा रचनाकारों का अपना मंच है "

पिछले १२ दिनों में लिखे, शहरोज़ का हर ख़त सहेजने योग्य है, दूसरों की मदद में तत्पर, हिन्दी भाषा की सेवा में लगा, भारत का यह सपूत, नौजवानों में एक आदर्श कायम करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है !

अपने देश के समाज की मुख्य धारा में आने के लिए जद्दोजहद करते हुए, अपने इन मुस्लिम बच्चों को देख, मेरी मां का दिल आज रो रहा होगा ! कहीं नही लगता कि यह वही देश है जिसकी सहिष्णुता की हम दुहाई देते कही नहीं थकते,

अभी बहुत काम बाकी है....... बरसों पहले, जब देश में जबानी एकता की दुहाई दी जा रही थी, कोई सोच भी नही पाता होगा कि उर्दू जैसी खूबसूरत भाषा के आँगन में पले और बड़े हुए, हमारे ये बच्चे एक दिन हिन्दी भाषा के उत्थान के लिए, हिन्दी भाषियों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर आगे चलेंगे ! और आज ये चल ही नही रहें हैं, हिन्दी के महा विद्वानों में से एक हैं, मगर चंद हिन्दी भाषी, इन्हे रास्ता चलते, गिराने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते ! संकीर्ण मन यह विश्वास ही नहीं कर पा रहा कि यह भी इस क्षेत्र के जानकर हो सकते हैं और हमसे बेहतर भी हो सकते हैं !

हिन्दी सिर्फ़ हिन्दुओं की भाषा नहीं, बल्कि सारे देश की जबान है, अगर हमारे मुस्लिम भाइयों ने, अपनी मादरी जबान, उर्दू पर, इसे तरजीह देकर इसे खुशी के साथ अपनाया है तो इसका कारण ,देश के लिए उनका अपनापन और सब कुछ करने के अरमान है ! विपरीत परिस्थितियों में हिन्दी का अध्ययन, कर हिन्दी के विद्वानों में शामिल होने की कोशिश..... यह कोई मामूली बात नहीं ! जहाँ हमें आज आगे बढ़ कर, अपने इन छोटे भाइयों का शुक्रिया अदा करना चाहिए था वहीं उल्टा हम उन पर छींटा कशी कर रहे हैं !चंद बरस पहले जहाँ कभी हिन्दी का एक भी मुस्लिम लेखक नज़र नहीं आता था वहीं आज नासिर शर्मा, असद जैदी, असग़र वजाहत,अब्दुल बिस्मिल्लाह, शहंशाह आलम, अनवर सुहैल , मजीद और शहरोज़ जैसे लोग चर्चा में हैं ! तकलीफ तो इन्हें उर्दू जबान के नुमाइंदों से मिलनी चाहिए थी पर मिल रही है उनसे, जिन्होंने इन्हे गले लगाना चाहिए ! हमें गर्व होना चाहियें अपने देश के इन मुस्लिम हिन्दी विद्वानों पर, जो सही मायनों में इस देश कि संस्कृति का एक हिस्सा बनकर, इसे हर तरह आगे बढ़ाने में मदद कर रहें हैं !

मैं अपने देश के विशाल ह्रदय को अच्छी तरह से जानता हूँ , और अपने मुस्लिम भाइयों को यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मेरे जैसे हजारो दोस्त, और सच्चे भारतीय हैं जो इस शुरूआती दर्द में आपके साथ देंगे , भले ही वह परोक्ष रूप में सामने नहीं दिखाई पड़ रहे ! मेरा यह भी विश्वास है कि एक दिन हिन्दी जगत से वह आदर - सम्मान आपको जरूर मिलेगा जिसके आप हक़दार हैं !
मेरा यह मानना है , लेखक तथा कवि , चाहे वह किसी भाषा के क्यों न हों , संकीर्ण स्वाभाव के हो ही नहीं सकते ! संकीर्ण स्वभाव का अगर कोई लेखक है तो वह सिर्फ़ पैसा कमाने के लिए, बना हुआ लेखक है उसे आम पाठक , उन्मुक्त ह्रदय से कभी गले नहीं लगायेगा ! ऐसे व्यक्तियों को लेखक नहीं कहा जाता ! वे सिर्फ़ अपने ज्ञान का दुरुपयोग करने आए है और ढोल बजाकर चले जायेंगे ! कवि ह्रदय, समाज में अपना स्थान सम्मान के साथ पाते हैं और शान के साथ पाते हैं !

जहाँ ह्रदय में धारा बहती
प्रेम भरे अरमानों की,
प्यार हिलोरे लेता रहता,
वहीं रचा जाता है गीत

नहीं द्वेष पाखंड दिखावा
नही किसी से मन में बैर
जहाँ नही धन का आड्म्बर,
वहीं रचा जाता है गीत !

सरल भाव से सबको देखे
करे सदा सबका सम्मान
निश्छल मन और दृढ विश्वास,
वहीं रचा जाता है ,गीत !

प्रिये गीत की रचना करने
पहला कवि जहाँ बैठा था
निश्चय ही वसुधा के मन में,
फूट पड़ा होगा संगीत !

कविता नहीं प्रेरणा जिसकी
गीत नहीं भाषा है दिल की
आशा और रुझान जहाँ पर
प्रिये उसे कहते हैं गीत !

Friday, July 18, 2008

मत पढिये इन ब्लाग्स को !

                           मैंने कुछ समय पहले, कहीं पढ़ कर, ब्लाग के बारे, सोचना, शुरू किया था,! मेरा मानना था कि अपने विचार व्यक्त करने का यह अच्छा साधन है, और इसके ज़रिये शायद समाज सेवा करने का अपना शौक पूरा कर पाउँगा ! जिन मशहूर ब्लाग्स के बारे में अखबारों में पढा था कि वे बहुत अच्छा कार्य कर रहें हैं, उन्हें रोज पढ़ना शुरू किया, मगर जल्दी ही समझ में आ गया कि कहीं कोई बड़ी गड़बड़ है, और लगभग २ महीने बाद, अब तो यह समझ ही नही आता कि किस ब्लाग को अच्छा कहूं और किस को बुरा, जिसको अच्छा कहता हूँ वही कुछ दिन में अपनी असलियत पर आ जाता है !
                       हर ब्लाग पर अपने अपने ग्रुप बने हुए हैं, जो हमले से बचने और दूसरे से मुकाबला करते हैं , और यह सभी स्वनामधन्य साहित्यकार और मशहूर पत्रकार हैं जिनसे सब कोई डरते हैं, यह वो हैं जो दावा करते हैं कि देश को कभी सोने नहीं देंगे ! आज एक बहुत मशहूर ब्लाग ( जिसको मैं बहुत पसंद करता हूँ/ था शायद नाम के कारण ) के द्बारा, बताई गयी एक ब्लाग पर गया तो लगा कि किसी पॉर्न ब्लाग पर आ गया, अपने विश्वास को बहुत गालियाँ दी और बाहर आ गया, साथ ही एक तकलीफ भी कि पढ़े लिखे व्यक्ति जिम्मेवार क्यों नहीं हैं ? क्या उनका कोई परिवार नही है या कभी होगा भी नही, इंटरनॅशनल नेटवर्क पर हम भारतीय क्या दे रहे हैं ? हर एक ब्लाग बेहतर प्रदर्शन करने के लिए नए हथकंडे आजमा रहा है, और जो ब्लाग लोकप्रिय हैं, वे भी एक दूसरे की टांग खींचने पर लगे हैं !
                       अजीब स्थिति में हूँ, कष्ट के साथ !मैं किसी कि आलोचना नहीं करना चाहता, क्योंकि सब कहीं न कहीं अच्छा कार्य भी कर रहे हैं ! मगर चाहता हूँ कि यह अपनी एनर्जी देश हित में लगाये, उस से ही भला होगा, अपनी विद्वता का उपयोग इस कम पढ़े लिखे देश में, हम जैसे कम पढ़े लोगों को, कुछ अच्छा देकर, सुखी बनायें !

Wednesday, July 16, 2008

असद जैदी और इरफान !

इस तकलीफ में कोई बोलता क्यों नही ?
कम से कम साहित्य तथा प्रकाशन क्षेत्र में कार्य करने बाले लोगों में, संकीर्ण विचारधारा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए ! मुझे आश्चर्य है कि जब प्रतिष्ठित विद्वान् भी असंयत भाषा का उपयोग करने लगते हैं ! यह कौन सी विद्वता है और हम क्या दे रहे हैं, अपने पढने वालों को ? अगर हम सब मिलकर अपनी रचनाओं में १० % स्थान भी अगर, सर्व धर्म सद्भाव पर लिखें , तो इस देश में हमारे मुस्लिम भाई कभी अपने आपको हमसे कटा हुआ महसूस नहीं करेंगे, और हमारी पढ़ी लिखी भावी पीढी शायद हमारी इन मूर्खताओं को माफ़ कर सके !
दोनों भाइयों ने इस मिटटी में जन्म लिया, और इस देश पर दोनों का बराबर हक है ! हमें असद जैदी और इरफान सरीखे भारत पुत्रो के अपमान पर शर्मिन्दा होना चाहिए !
कवि और लेखक स्वाभाविक तौर पर भावुक और ईमानदार होते हैं , विस्तृत ह्रदय लेकर ये लोग समाज में जब अपनी बात कहने जाते हैं तो वातावरण छंदमय हो उठता है , कबीर की बिरादरी के लोग हैं हमलोग, न किसी से मांगते हैं न अपनी बात मनवाने पर ही जोर देते हैं, नफरत और संकीर्ण विचार धारा से इनका दूर दूर तक कोई रिश्ता नही हो सकता ! ऐसे लोगों पर जब प्रहार होता है तो कोई बचाने न आए यह बड़ी दर्दनाक स्थिति है ! न यह हिंदू हैं न मुसलमान , इन्हे सिर्फ़ कवि मानिये और इनके प्रति ग़लत शब्द वापस लें तो समाज उनका आभारी होगा ! एक कविता पर गौर करिए ....

बहुत दिनों से देवता हैं तैंतीस करोड़
हिस्से का खाना-पीना नहीं घटता
वे नहीं उलझते किसी अक्षांश-देशांतर में
वे बुद्धि के ढेर
इन्द्रियां झकाझक उनकीं
सर्दी-खांसी से परे
ट्रेन से कटकर नहीं मरते......

उपरोक्त कविता लिखी है विजय शंकर चतुर्वेदी जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार ने और इसे प्रकाशित किया है " पर मैं हाथ तक नहीं लगाऊंगा चीज़ों को नष्ट करने के लिए " नाम के शीर्षक से "कबाड़खाना " में ! http://kabaadkhaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_14.html

ताज्जुब है कि कोई पहाड़ नहीं टूटा , न तूफ़ान आया , कोई प्रतिक्रिया नही हुई , कहीं किसी को यह रचना अपमानित करने लायक नहीं लगी। और लोगों ने, सारी रचनाओं की, चाहे समझ में आईं या नहीं, तारीफ की, कि वाह क्या भाव हैं, और कारण ?

-कि अशोक पाण्डेय तथा चतुर्वेदी हमारे अपने हैं !
-लिखने से क्या होता है, हमारे धर्म में कट्टरता का कोई स्थान नहीं ! अतः कोई आहत नहीं हुआ ! इस कविता से सबको कला नज़र आई !

मजेदार बात यह है कि यह उपरोक्त कविता लोगों की प्रतिक्रिया जानने को ही लिखी गयी थी, कि आख़िर असद जैदी जैसे मशहूर साहित्यकार की लोगों ने यह छीछालेदर करने की कोशिश क्यों की ! और जवाब मिल भी गया !

एक ख़त मिला मुझे गुजरात से रजिया मिर्जा का उसे जस का तस् छाप रहो हूँ , बीच में से सिर्फ़ अपनी तारीफ़ के शब्दों को हटा दिया है ( मेरी तारीफ यहाँ छापना आवश्यक नही है ) जिसके लिए मैं उनका आभारी हूँ ...

नमस्ते सतिश जी, आपका पत्र पढा। पढकर हैरान नहीं हुं क्यों कि मै ऐसे लोगों को साहित्यकार मानती ही नहिं हुं जो लोग धर्मो को, ईंसानों को बाटते चलें। मै तो ---------------------------------------------------------------------------------------------------आपकी पहेचान है। उन लोगों को मैं' साहित्यकार' नहिं परंतु एसे विवेचकओं की सुचिमें रखुंगी जो अपनी दाल-रोटी निकालने के लिये अपने आपको बाज़ार में बिकने वाली एक वस्तु बना देते है। मैं अस्पताल में काम करती हुं । मेरा फ़र्ज़ है कि मै सभी दीन-दुख़ियों का एक समान ईलाज़ करुं, पर यदि मैं अपने कर्तव्य को भूल जाऊं तो इसमें दोष किसका? शायद मेरे "संस्कार" का ! हॉ, सतिष जी अपने संस्कार भी कुछ मायने रखते है। हमको हमारे माता-पिता, समाज, धर्म, इमान ने यही संस्कार दीये है कि ईंसान को ईंसानों से जोडो, ना कि तोडो।सतिष जी आपकी बडी आभारी हुं जो आपने एसा प्रश्न उठाया। मैं एक अपनी कविता उन मेरे भाइ-बहनों को समर्पित करती हुं जो अपने 'साहित्य' का धर्म निभा  रहे है। सतीश आपसे आग्रह है मेरी इस कविता को अपने कमेन्ट में प्रसारित करें। आभार

दाता तेरे हज़ारों है नाम...
कोइ पुकारे तुज़े कहेकर रहिम,
और कोइ कहे तुज़े राम।...
दाता..........
क़ुदरत पर है तेरा बसेरा,
सारे जग पर तेरा पहेरा,
तेरा 'राज़'बड़ा ही गहेरा,
तेरे ईशारे होता सवेरा,
तेरे ईशारे हिती शाम।...
दाता......
ऑंधी में तुं दीप जलाये,
पथ्थर से पानी तुं बहाये,
बिन देखे को राह दिख़ाये,
विष को भी अमृत तु बनाये,
तेरी कृपा हो घनश्याम।...
दाता.........
क़ुदरत के हर-सु में बसा तु,
पत्तों में पौन्धों में बसा तु,
नदीया और सागर में बसा तु,
दीन-दु:ख़ी के घर में बसा तु,
फ़िर क्यों में ढुंढुं चारों धाम।...
दाता..........
ये धरती ये अंबर प्यारे,
चंदा-सुरज और ये तारे,
पतज़ड हो या चाहे बहारें,
दुनिया के सारे ये नज़ारे,
देख़ुं मैं ले के तेरा नाम।.........
दाता........

ऐसी कवितायें कबीर दास जी लिखते थे , मैं रजिया जी का हार्दिक शुक्रगुजार हूँ , यह कविता प्यार का एक ऐसा संदेश देती है जो कहीं देखने को नहीं मिलता ! यह गीत गवाह है की कवि की कोई जाति व् सम्प्रदाय नहीं होता
वह तो निश्छलता का एक दरिया है जो जब तक जीवन है शीतलता ही देगा !रजिया मिर्जा की ही कुछ पंक्तियाँ और दे रहा हूँ !

"झे मालोज़र की ज़रुर क्या?
मुझे तख़्तो-ताज न चाहिये !
जो जगह पे मुज़को सुक़ुं मिले,
मुझे वो जहाँ की तलाश है।
जो अमन का हो, जो हो चैन का।
जहॉ राग_द्वेष,द्रुणा न हो।
पैगाम दे हमें प्यार का ।
वही कारवॉ की तलाश है।"

मुझे बेहद अफ़सोस है कि इस विषय पर बहुत कम लोग बोलने के लिए तैयार है , मैं मुस्लिम भाइयों की मजबूरी समझता हूँ, भुक्ति भोगी होने के कारण उनका न बोलना या कम बोलना जायज है परन्तु, सैकड़ों पढ़े लिखे उन हिंदू दोस्तों के बारे में आप क्या कहेंगे जो अपने मुस्लिम दोस्तों के घर आते जाते हैं और कलम हाथ में लेकर अपने को साहित्यकार भी कहते हैं !
आज कबाड़ खाना पर असद जैदी के बारे में तथाकथित कुछ हिंदू साहित्यकारों की बातें सुनी, शर्मिंदगी होती है ऐसी सोच पर ! मेरी अपील है उन खुले दिल के लोगों से , कि बाहर आयें और इमानदारी से लिखे जिससे कोई हमारे इस ख़ूबसूरत घर में गन्दगी न फ़ेंक सके !

Monday, July 14, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री को ! ( तीसरा भाग )

सारा जीवन किया समर्पित परमारथ में नारी ही ने , विधि ने ऐसा धीरज लिखा केवल भाग्य तुम्हारे ही में !उठो चुनौती लेकर बेटी, शक्तिमयी सी तुम्ही दिखोगी !!

द्रढ़ता हो, सावित्री जैसी ,
सहनशीलता हो सीता सी !
सरस्वती सी,महिमा मंडित

कार्यसाधिनी अपने पति की !
अन्नपूर्णा बनो, सदा ही

घर की शोभा तुम्ही रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

नारी के सुंदर चेहरे पर,
क्रोध कभी न आने पाये !
क्षमा,दया और ममता बेटी
सदा विजेता होते आये !
गुस्सा कभी पास न आये ,

रजनीगंधा सी  महकोगी  !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्ही रहोगी !


स्वागत मेहमानों का करने 
दरवाजे पर हंसती आये !  
घर के दरवाजे से पुत्री ,
याचक कभी न खाली जाए !
मान करोगी अगर मानिनी,
महिमामयी तुम्ही दीखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्ही रहोगी !

नर नारी में परमत्याग की 
शिक्षा देती, सारे जग को !
माता, पिता, सहोदर भाई
और छोड़ती है,निज घर को !
भूल पुराने घर को अपने
नयी रौशनी लानी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्ही रहोगी

सारा जीवन किया समर्पित
परमारथ में , नारी ही ने !
विधि ने ऐसा धीरज लिखा
केवल भाग्य, तुम्हारे ही में !
उठो चुनौती लेकर बेटी ,
शक्तिमयी सी तुम्ही दिखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्ही रहोगी !

Next http://satish-saxena.blogspot.in/2008/08/blog-post.html

Saturday, July 12, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री को ( दूसरा भाग )

पत्र के पहले भाग में, बेहद प्रतिष्ठित लेखिकाओं तथा लेखकों ने अपनी उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रियाएं दी, मैं यह स्पष्ट करना कहता हूँ कि इस कविता में बेटी को नसीहत नहीं बल्कि एक बेहद प्यार करने वाले पिता की इच्छा है कि जितना प्यार तुम मुझे करती हो उतना ही प्यार अपने नए पिता, मां और बहिन को करना और इस प्यार की शुरुआत, वहां जा कर तुम्हे करनी है, बिना उनसे उम्मीद किए !

चूंकि यह ख़त पुत्री के लिए है, स्वाभाविक है कि मुझे उसकी भावी ससुराल से कोई उम्मीद नही करनी चाहिए ! समझाने का अधिकार मुझे केवल अपनी पुत्री को ही है ...

सदा अधूरा , पति रहता है
यदि तुम साथ नहीं दे पाओ !
अगर , पूर्ण नारीत्व चाहिए
पति की अभिलाषा बन जाओ !
बनो अर्ध नारीश्वर जैसी ,
हर साधना तुम्हारी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

पति-पत्नी हैं एक डाल पर
लगे फूल दो बगिया  में  !
जब तक खिलें  न साथ ,
अधूरे लगते हैं सुंदरता में !
एक खिले , दूजा मुरझाये ,
बिन बोले सब बात कहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

कमजोरों का साथ दिया तो  
ईश्वर देगा, साथ तुम्हारा !
वृद्ध जनों का प्यार मिला ,
सारा जीवन सफल तुम्हारा 
आशीर्वाद बड़ों का लेकर ,
सबसे आगे तुम्ही रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

कार्य करो संकल्प उठा कर
खुशियां घर में हंसती आये !
स्व-अभिमानी बनकर रहना
पर अभिमान न होने पाये !
दृढ विश्वास ह्रदय में लेकर, 
कार्य करोगी सफल रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्ही रहोगी !

कमजोरों के लिए सुपुत्री,
जिस घर के दरवाजे खुलते !
आदि शक्ति परमात्मा ऊपर,
जिस घर श्रद्धासुमन बिखरते !
कभी अँधेरा पास न आए 
सूर्य-किरण सी तुम निखरोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्ही रहोगी !
next part http://satish-saxena.blogspot.in/2008/07/blog-post_14.html

refer :

http://sumanpatil-bhrashtachar-ka-virus.blogspot.in/2014/01/blog-post_11.html

Friday, July 4, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री को ! (प्रथम भाग )

आधुनिकतावाद की ओर भागते भारतीय समाज में, पाश्चात्य सभ्यता की जो बुराइयाँ आईं, हम भारतीयों के लिए , बेहद तकलीफदेह रहीं ! और आग में घी डालने का कार्य किया, पैसा कमाने की होड़ में लगे इन टेलीविजन चैनलों ने, चटखारे लेकर, सास के बारे में एक्सपर्ट कमेंट्स देती तेजतर्रार बहू, लगभग हर चैनल पर नज़र आने लगी और फलस्वरूप तथाकथित, शिक्षित विवाहित भारतीय महिलाएं यह भूल गईं कि इस टीवी चैनल का आनंद, उनकी ही तरह उसकी भाभी भी ले रही है , और इस तरह भारतीय महिलाओं के लिए नए संस्कार हर घर में पनपने लगे ! नए "गुणों" को सीखतीं, हमारी विवाहित पुत्रियाँ यह भूलती जा रही हैं कि वह एक दिन इसी घर में सास एवं मां का दर्जा भी पाएँगी तथा वही संस्कार उनके आगे होंगे !

भले ही कोई पुरूष या महिला नकार दे, पर क्या यह सच नहीं है कि किसी घर ( मायका या ससुराल ) में, माँ को वो सम्मान नही मिलता जिसकी वो पूरी हकदार है ! और जननी का सम्मान गिराने का अपराध सिर्फ़ भावी जननी ( बेटी ) ने किया और असहाय पिता (सहयोगी पति ) कुछ न कर पाया !

हर स्थान पर पुत्री यह भूल गई कि सास भी एक पुत्री है और मेरी भी कहीं मां है, जिस बहू ने सास का मजाक उड़ाया उसे उस समय यह याद ही नही आया कि मेरी मां के साथ भी यह हो सकता है, और जब मां के साथ वही हुआ तो वो लड़की ( एक बहू) असहाय सी, अपनी भाभी का या तो मुंह देखती रही या उसको गाली दे दे कर अपना मन शांत किया !

नारी जागरण का अर्थ यह बिल्कुल नही कि हम अपने बड़ों की इज्जत करना भूल जायें, या बड़ों की निंदा करने और सुनाने में गर्व महसूस करें ! अपनी सास का सम्मान, अपनी मां की तरह करके, बच्चों में संस्कार की नींव डालने का कार्य शुरू करें ! सास और ससुर के निर्देश, अपने माता पिता के आदेश की तरह स्वीकार करने लगें तो हर घर एक चहकता, महकता स्वर्ग बन सकता है !

मैं, एक कविह्रदय, यह नहीं चाहता कि मेरी पुत्री यह दर्द सहे व महसूस करे ! और यही वेदना यह ख़त लिखने के लिए प्रेरणा बनी !

मूल मंत्र सिखलाता हूँ मैं ,
याद लाडली रखना इसको
यदि तुमको कुछ पाना हो

तो देना पहले सीखो पुत्री !
कर आदर सम्मान बड़ों का,गरिमामयी तुम्ही होओगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्ही रहोगी !

उतना ही कोमल मन सबका  
जितना बेटी, तेरा मन है !
उतनी ही आशाएं तुमसे ,
जितनी तुमने लगा रखी हैं !
परहित कारक बनो सुपुत्री , भागीरथी तुम्ही होओगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

उनकी आशाओं को पूरा,
करने का है धर्म तुम्हारा
जितनी आशाओं को पूरा
करवाने का स्वप्न तुम्हारा
मंगलदायिन बनो लाडली,स्वप्नपरी सी तुम्ही लगोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी,घर की रानी तुम्ही रहोगी !

पत्निमिलन की आशा लेकर
उतना ही, उत्साह ह्रदय में  !
जितनी तुमको पिया मिलन
की अभिलाषा है गहरे मन में
प्यार किसी का कम न मानो, साध तुम्हारी पूरी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्ही रहोगी !

पति है जीवन भर का साथी

दुःख के साथ ख़ुशी का साथी ! 
तेरे होते, कभी अकेलापन 
महसूस  न  , करने  पाये ! 
सदा सहायक रहो पति की, हर अभिलाषा पूरी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्ही रहोगी !
......क्रमश
http://satish-saxena.blogspot.in/2008/07/blog-post_12.html
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