Sunday, June 29, 2008

शिंजिनी सेनगुप्ता, १६ वर्ष

                    एक मशहूर डांस रियलिटी शो "धूम मचा दे धूम" में, शिंजिनी सेनगुप्ता, १६ वर्ष , क्लास XI स्टुडेंट, बाल कलाकार के रूप में भाग ले रही थी, बताया जाता है कि एक जज ने उसे काफी डांट लगाई, और शो से बाहर कर दिया, यह बच्ची वह अपमान न सह सकी तथा इस सदमे के फलस्वरूप अपनी आवाज खो बैठी, इस समय वह, इस पैरालैटिकल अटैक के इलाज के लिए नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हैल्थ एंड साइंस (निमहंस ) बंगलौर, में भरती है !
                      १६ वर्षीय बच्ची शिंजिनी सेनगुप्ता एक रियलिटी डांस शो में इस लिए शामिल हुई थी कि उसकी प्रतिभा का सम्मान होगा ! पर इस बच्ची को मिला, सबके मध्य जज द्वारा अपमान, जिस को वह झेल न सकी ! कैमरों के सामने, स्टेज शो में, हर कोई अपने आप को सबसे आगे लाना चाहता है, और पैसा बरसने की जगह पर, अगर यह मौका जज साहब को मिले तो सामने कोई मासूम बच्ची ही क्यों न हो , अपनी बुद्धिमत्ता के प्रदर्शन का मौका, अनजाने में शिकार होती एक मासूम बच्ची और चैनल के सामने बैठे हुए इस देश के करोडो दर्शक !
Show must go on !
मगर क्या यह मशहूर लाइन, जो सर्वथा जीवंत सत्य है, शिंजिनी केस में आप स्वीकार करेंगे ? क्या यह शो किसी कला का प्रतिनिधित्व कर पा रहे हैं या सिर्फ़ पैसा कमाने का सर्वश्रेष्ठ मौका दे रहे हैं !

Monday, June 16, 2008

तुम्हारे दर्द में, मैं शामिल हूँ ( ओपन लैटर )

यह ख़त मैंने इरफान को "टूटी हुई बिखरी हुई" ब्लाग पर दिनांक ११-६ -०८ को छपे बीकानेर का एक संस्मरण के जवाब में लिखा है ! यह ख़त बहुत तकलीफ से लिखा है सो चाहा की अपने ब्लाग पर अन्य भाइयों के लिए प्रकाशित करूं शायद इससे कुछ लोगों का भला हो ! मुझे आप सबसे, सहमति चाहिए , कृतार्थ हूँगा !

इरफान भाई !
"अलाउद्दीन खिलजी मुसलमान था परन्तु दयालु था !" निस्संदेह यह तोडे मरोड़े भारतीय इतिहास का एक हिस्सा है जो इस देश के बच्चे बचपन से पढते चले आ रहे हैं ! संकीर्ण बुद्धि के हिंदू विद्वानों द्वारा लिखे गए इस कुत्सित इतिहास के वदौलत ही, हम दोनों भाई प्यार के साथ, सच्चे मन से हंस भी नही पाते हैं. इस इतिहास में हर मुसलमान बादशाह को निर्दयी तथा कट्टर व हर हिंदू राजा को आदर्श बताया गया ! बालमन इसी इतिहास को सही मान कर आचरण करने लगा
जिसकी परिणिति स्वरूप आप जैसे भारत पुत्र को भी अपने देश में अपमान झेलना पड़ा !
अशिक्षा और असहिष्णुता ने इस देश के दोनों बच्चों का बहुत नुकसान किया है ! खासतौर पर मुस्लिम भाई अविश्वास और असुरक्षा के वातावरण में न केवल रह रहे हैं बल्कि उन्हें बार-बार अग्निपरीक्षा भी देने को मजबूर किया जाता रहा है कि यह देश उनका भी है !
हजारों जातियों वाले इस देश में अपनी जाति और कौम का साथ देते, हजारों स्वाभाविक उदाहरण हैं ! मगर मुस्लिम उदाहरण हमें नागवार लगते हैं ! मोहम्मद शुएब को आई पी एल में खेलते देख लाखो हिन्दुओं ने तालियाँ बजाई तो कोई बात नहीं मगर इस टूर्नामेंट से पहले अगर कोई, किसी भारतीय मुस्लिम को पाकिस्तान - ऑस्ट्रेलिया मैच में शुएब की तारीफ में तालियाँ बजाते देखता, तो भवें तन जाती !
हम शिक्षित हिन्दुओं व तथाकथित साहित्यक विद्वानों का यह दायित्व बनता है कि बहुमत में सामाजिक चेतना जगाकर सही बात लोगों को बताने का प्रयत्न करें, खास तौर पर मासूम बच्चों को इस ग़लत इतिहास पढने से रोकें ! जिससे हमारा भविष्य गर्व से आगे बढ़ सके ! लगभग १३ वर्ष पहले एक कविता लिखी थी शायद आपको पसंद आए !

जाति पांति और भेदभाव
के नाम चढ़े भगवान भी
नास्तिक आज बचाने जाते जन्मभूमि श्रीराम की !

राजनीति के लिए ख़रीदे
जाते हैं भगवान भी
रामनाम को बेच रहे हैं धर्म के ठेकेदार भी !

अन्तिम सच को भूल
फिरें इतराते झूठी शान में
धर्म आड़ में लेकर लड़ते क़समें खाते राम की !

मानवता की बली चढाते
सीना ताने खून बहाते
रक्त होलिका खेलें, फिर भी गाते महिमा राम की !

दिल में घ्रणा समेटे मन
में बदले की भावना लिए
राज्यपिपासु खोजने जाते, जन्मभूमि श्रीराम की !

परमपिता परमात्मा की भी
जन्मभूमि सीमित कर दी
मां शारदा निकट नही आईं, करते बातें ज्ञान की !

प्राणिमात्र पर दया, धर्म
सिखलाता बारम्बार है
पवनपुत्र के शिष्य, लुटाते मर्यादा श्रीराम की !
सादर आपका
सतीश

Sunday, June 15, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? ( चौथा भाग ) - सतीश सक्सेना


इस पृष्ठ पर लिखी अधिकांश पंक्तियाँ, मेरे १३ वर्षीय , किशोर विद्यार्थी बेटे के उलझन भरे प्रश्नों के उत्तर तथा एक पिता के सुझाव हैं ! ज्ञात हो की यह कविता १९९३ में लिखी गई थी !
समाज की बुराईयों तथा अन्याय के खिलाफ लड़ने की एक अतिरिक्त इच्छा मेरे अन्दर शुरू से थी, उस दर्द की परिणिति इन रचनाओं के माध्यम से हुई! मगर कभी प्रसिद्धि की इच्छा नही थी इसलिए यह कवितायें डायरी में बंद रहीं ! गूगल  ट्रांसलिटरेशन एवं ब्लोगिंग के कारण यह सम्भव हुआ ! और वो कवितायें आपके सम्मुख आ पा रहीं हैं, अगर पसंद आयें तो लेखन सफल मानूंगा  !


सदियों का खोया स्वाभिमान
वापस दिलवाना है इनको ,

हम  लोगों द्वारा ही बोये  
काँटों से मुक्ति मिले इनको 
ठुकराए गए भाइयों का
अधिकार दिलाने आ आगे ,
अधिकार किसी का छीन अरे,क्यों लोग मनाते दीवाली?

कुछ कार्य नया करने आओ
आओ नवयुग की संतानों

अपने समाज में व्याप्त रहीं  
इन बुरी रीतियों को जानों  
हो शादी विवाह मानवों में,

जाति बन्धन का नाम मिटे ,
रूढ़ि  बन्धन में बंधे बंधे , क्यों लोग मनाते दीवाली  ?

बच्चों मानवकुल ने अपने
कुछ लोग निकाले घर से हैं !

बस्ती के बाहर ! जंगल में ,
कुछ और लोग भी रहते हैं !
निर्बल भाई को बहुमत से , 

घर बाहर फेका है हमने !
आचरण बालि के जैसा कर क्यों लोग 
मनाते दीवाली?

घर के आँगन में लगे हुए
कुछ वृक्ष बबूल देखते हो !
हाथो उपजाए पूर्वजों ने ,

कांटे राहों में, देखते हो !
काटो बिन मायामोह लिए,

इन काँटों से दुःख पाओगे
घर में जहरीले वृक्ष लिए , क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?

आओ हम शक्ति आजमाएं 
उन दुर्योधनों  से लड़ते हैं !
जो निर्बल, बाल ,ब्रद्ध, नारी
कुल को अपमानित करते हैं
रक्षित बन इनके जीवन में , 

तुम पुण्य कमाओगे भारी
शक्ति का करके दुरुपयोग , क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?
......क्रमश







Friday, June 13, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? ( तीसरा भाग ) - सतीश सक्सेना

मुझे एक मित्र ने कहा कि आज स्थिति , ऐसी नहीं जैसी अपने वर्णित की है ! जो लोग शहरों में रहते हैं , उन्हें शायद वस्तुस्थिति का ज्ञान नही है, मूल भारत में आज भी स्थिति वैसी ही है ! मेरा यह मानना है कि सच्चाई को सामने आना ही चाहिए चाहे वह कितनी ही कड़वी क्यों न हो !

छाया प्रकरण से भी आगे 

कुछ महा धर्म ज्ञानी आये 
पदचिन्ह मिटे पैदल चलते 
पैरों में झाड़ीं, बांधी थी !
पशुओं से भी बदतर जीवन,

कर दिया धर्म रखवालों ने !
मानव जीवन पर ले कलंक, क्यों लोग मानते दीवाली ?

पानी पीने को पनघट पर
कुत्ता आ जाए अनिष्ट नहीं
पर शूद्र अगर मुंडेर से भी
छू जाए , महा अपराधी है
प्यासा गरीब जल के बदले,

पिटता है वस्त्र रहित होकर !
मानव को प्यासा मार अरे ! क्यों लोग मानते दीवाली ?

अधिकार नाम से दिया नहीं
कुछ धर्म के इन विद्वानों ने
धन अर्जित संचित करने का
अधिकार लिया रखवालों ने
जूठन एकत्रित कर खाओ, 

धन का तुम को कुछ काम नहीं !
तन मन धन शोषण कर इनका, क्यों लोग मानते दीवाली ?

वंचित रखा पीढियों इन्हें
बाज़ार ,हाट, दुकानों से !
सब्जी,फल,दूध,अन्न अथवा
मीठा, खरीद कर खाने से !
हर जगह सामने आता था, 

अभिमान सवर्णों का आगे !
मिथ्या अभिमानों को लेकर क्यों लोग मानते दीवाली ?

उच्चारण मंत्रों का अशुद्ध ,
कर अपने को पंडित माने।
मांगलिक समय पर श्राद्धमंत्र
मारण पर मंगलगान करें !
संस्कृत का,क ख ग न पढ़ा,

व्याकरण तत्व का ज्ञान नहीं !
ऐसे पंडित कुलगुरु बना , क्यों लोग मनाते दीवाली  ?


भोजन में लेते मांस और 
मदिरा पीते जल के बदले
पूजा में बैठ आचरण पर
वेदों की ऋचा सुनाते हैं
ऐसे ज्ञानी पुरोहितों से है  
त्राहि त्राहि माँ  सरस्वती  !
अधकचरा ज्ञान धर्म का ले क्यों लोग मनाते दीवाली ?

ईश्वर समक्ष अपने को रख
बनियों को अर्थ हेतु माना
क्षत्रिय को सौंपी निज रक्षा
खुद पूज्य बने सारे युग के
सेवा करने को निम्न कोटि,
शूद्रों को जन चाकर माना ,
करवा संशोधित,आदि ग्रन्थ क्यों लोग मानते दीवाली ?

ऐसा कोई अवतार धरो ,
जो नष्ट वर्ण संकट करदे !
अपने अपने कर्मानुसार
मानव,समाज का काम करे !
मिल बैठें आपस में सारे 
व्राह्मण और शूद्र साथ होकर
औरों के लिए घृणा लेकर,क्यों लोग मनाते दीवाली ?

Thursday, June 12, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? (दूसरा भाग ) - सतीश सक्सेना

जिन्हें सीने से लगाना चाहिए , उन्हें आज भी इस देश में अछूत कहा जाता है ! इस दुर्भाग्य से निकलने हेतु मेरा यह प्रयास है और आशा है कि काश एक दिन यह कलंक दूर हो सके ! और हम अपने को सभ्य कहलाने लायक बन सकें !


बीसवीं सदी में पले बड़े
कंगूरों  के ठेकेदारो  !
मन्दिर के द्वारे खड़े हुए ,

मासूमों के चेहरे देखो ! 
बचपन से इनको गाली दे , 

क्या बीज डालते हो भारी !
इन फूलों को अपमानित कर,क्यों लोग मनाते दीवाली !

तीसरा भाग जनसंख्या का
शूद्रों के हिस्से में आया !

हँसते समाज के साथ जियें 
ऐसा अधिकार नहीं पाया ! 
मन्दिर प्रवेश वर्जित करते, 

कैसे ब्राह्मण ? अपराधी हैं !
परमेश्वर के कर द्वार बंद , क्यों लोग मनाते दीवाली  !

आरक्षण का विरोध करने
वालो कुछ सहकर तो देखो

सदियों से तड़पाया जैसा   
अहसास दर्द सह कर देखो 
कितने प्यासों ने जाने दी थीं,
तड़प तड़प कर बिन पानी ,
पीने का पानी वर्जित कर , क्यों लोग मनाते दीवाली !

आरक्षण अगर मिटाना है
तो शुरू करो ब्राह्मण कुल से

अनपढ़ वामन रक्षित होकर  
सम्मानित होता समाज से ! 
अनपढ़ वामन पंडित होता,
शिक्षित अछूत को हेय मान
इस महाज्ञान को धर्म मान, क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?

वे भी हम जैसे इंसान थे   
कैसे अपमान झेलते थे !
छाया शूद्रों की पड़ने पर
कोढे लगवाए जाते थे !
यों धर्म नष्ट हो जाने पर , 

करते थे  प्रायश्चित्त, महा
गंगा में धोकर महापाप ! क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?


Friday, June 6, 2008

किसी घटिया दिल का उपहास उड़ाने का दिल करता है -सतीश सक्सेना

लड़कियां घूरें आँखें फाड़ ,

उम्र में लगते बाप समान 
न आता मर्यादा का ध्यान 
हमारे मन में उठें सवाल ,
किसी के गंजे सर पर , 
हाथ फिराने का दिल करता है !
किसी घटिया दिल का उपहास उड़ाने का दिल करता है !

बने फिरते गाँधी के शिष्य
आचरण पर देते व्याख्यान
सुरा सुंदरियों में है मस्त,
देश के नेता बने महान
भरे चौराहे इनको जूत, 

लगाने का दिल करता है !
किसी घटिया दिल का उपहास उड़ाने का दिल करता है!

पढाएँ कक्षा में मन मार
बेचते शिक्षा खुले बाज़ार
पुराने गुरुकुल के वे गुरु
और ये गुरु के नाम कलंक
हमारा अपने सिर के बाल 
नोचने का दिल करता है !
किसी घटिया दिल का उपहास उड़ाने का दिल करता है !!

क्यों लोग मनाते दीवाली ? (पहला भाग) - सतीश सक्सेना


निम्न कविता की रचना इस देश से कुरीतियाँ व अस्पृश्यता   मिटाने के प्रयास में शामिल होने हेतु लिखी गई थी (1992-93)! निस्संदेह यह मेरी सर्वोत्तम कविताओं में से एक है ! इसे स्वान्तः सुखाय ही लिखा था ! बहुत लंबा गीत है , कुछ लाइने निम्नलिखित हैं !


मानव कुल में ले जन्म, बाँट
क्यों रहे, अरे अपने कुल को ?
कर वर्ण व्यवस्था नष्ट,संगठित
कर पहले अपने कुल को ,
हो एक महामानव विशाल ! 

त्यागो यह भेदभाव भारी !
तुलसी की विह्वलता में बंध, क्यों लोग मनाते दीवाली !

हरिजन को सेवा करने के
बदले में नफरत देते हो   ?
यह तो कुल में लक्ष्मण जैसा
क्यों पास नहीं बैठाते हो  ?
सेवा सम्मानित कर न सके,

उपहास घृणा का पात्र बना ,
लक्ष्मण का सेवा भाव भूल , क्यों लोग मनाते दीवाली ?

मत भूलो रचनाकार प्रथम
श्री रामचरित रामायण के,
थे महापुरुष श्री बाल्मीकि
ऋषि,ज्ञानमूर्ति,रामायण के
हो शूद्र कुलोदभव,फिर भी 

जगजननी को पुत्री सा समझा
उनके वंशज , अपमानित कर, क्यों लोग मनाते दीवाली ?


बचपन से ही कक्षाओं में 
गुणगान देश का सुनता था
गौतम,गाँधी से महापुरुष
अपनी शिक्षा में पढता था
गौतम ने छोड़ा राजपाट, 

क्या यही न्याय दिलवाने को ,
अंगुलिमालों का हार पहन, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

गाँधी ने अपने जीवन में ,
कुछ माँगा देशवासिओं से
चाहा दिलवाना हरिजन को
सामाजिक न्याय हिन्दुओं से
माँगा इस लज्जाजनक रूप से,

मुक्ति मिले इन दलितों को
बापू इच्छा को रौंद तले , क्यों  लोग  मनाते  दीवाली  ?
.....क्रमश

Sunday, June 1, 2008

पुत्र को -सतीश सक्सेना


पिता पुत्र का रिश्ता तुमको
कैसे शब्दों में समझाऊँ !
कुछ रिश्ते अहसासों के हैं
समझाने की बात नही !
जीवन और रक्त का नाता, 

नहीं बनाये से बनता है
यह तो विधि की देन पुत्र, समझाने की है बात नहीं

अगर तर्क की करें तो ,

सत्य हमेशा ध्यान रहे  
जन्मदायनी माता है ,
पिता कष्ट नाशक तेरा
पुत्र हेतु मानव रूपों में, 

माता पिता मिले ऐसे
शास्त्र और वेदों ने इनको, इष्ट सरीखा माना है

और पिता के लिए, पुत्र ! 
तुम आँखों के तारों जैसे

बिन जीवन संसार मध्य  
होता है, अंधकार जैसे !

इस कठोर संसार मध्य, 
कष्टों के झंझावातों में
वृद्ध पिता के लिए सहारा होता निज औलादों का !

अगर बात कर्मों की हो ,
तो पुत्र याद रखना इसको
छूटे कार्य पिता अपने के
पूर्ण करो संकल्प सदा ले
करो सार्थक नाम हमेशा, 

आशा और विश्वास लिए !
कुलगौरव कुलदीपक अपने कुल का रखना मान यही !

मेरे कुल के गौरव ,
तुमको देता आशीर्वाद यही
प्रखरबुद्धि और दृढनिश्चय से
पार करो , जीवन सागर !
आशीर्वाद पिता का,मां का 

प्यार , साथ में लेकर तुम
करो प्रकाशित सारा जग तो जीवन सफल हमारा हो !

खंडित विश्वास

सारा जीवन जिया दर्द में
पीड़ा बैठ गई तनमन में
जैसे प्यार दे रहीं मुझको
कैसे खुशियाँ सह पाऊँगा
अब तो जैसे वर्षों से ना , युग युग से नाता पीड़ा का
रिश्ता मधुर बन गया दुःख से इसके बिन अब जीना क्या

अटूट रिश्ता है चोटों से
जख्मों को सहलाना क्या
गहरे घाव ह्रदय में लेकर
खिल खिल कर हँस पाना क्या
मैं क्या जानू जख्मीं होकर घाव भरे भी जाते हैं
छेड़ छाड़ मीठी झिड़की , आलिंगन का सुख होता क्या

कैसे झेलूँ प्यार तुम्हारा
टूटा मन शीशे जैसा
हर मीठी नज़रों के पीछे
प्यार छिपा ! शंकित मन है
खंड - खंड विश्वास हुआ है मोहपाश मैं बंधना क्या !
मेरे एकाकी जीवन को मधुर हास से लेना क्या !

बहुत मनाऊँ अपने मन को
पर विश्वास कहाँ से लाऊं
तेरी बाँहों का सम्मोहन
क्यों बेमानी लगता है
लगता मेरा बिखरा मन अब कभी नहीं जुड़ पायेगा
कैसे समझाऊँ मैं तुमको पीड़ा का सुख होता क्या

अभिलाषा - सतीश सक्सेना

चले सावन की मस्त बहार
हवा में उठती एक सुगंध
कि मौसम दिल पर करता चोट
हमारे दिल में उठे हिलोर
किन्ही सुन्दर नैनों से घायल होने का मन करता है !

किसी चितवन की मीठी धार
किसी के ओठों की मुस्कान
ह्रदय में उठते मीठे भाव
देख के बिखरे काले केश
किसी के दिल की गहरी थाह नापने का दिल करता है !

किसी के मुख से झरता गान
घोलता कानों में मधुपान
ह्रदय की बेचैनी बढ़ जाए
जान कर स्वीकृति का संकेत
कहीं से लेकर मीठा दर्द, तड़पने का दिल करता है !

कहीं नूपुर की वह झंकार
कहीं कंगन की मीठी मार
किन्ही नयनों से छोटा तीर
ह्रदय में चोट करे गंभीर
कसकते दिल के गहरे घाव दिखाने का दिल करता है !

झुकाकर नयन करें संकेत
किसी के मौन ह्रदय की थाह
किसी को दे डालो विश्वास
कहीं पूरे कर लो अरमान
किसी की चौखट पर अरमान लुटाने का दिल करता है !

मेरे गीत कौन गायेगा ? -सतीश सक्सेना

देखें चमकीली दुनियां में  
रंगों की महफ़िल सजी हुई
सुंदर प्रतिमाएँ थिरक रहीं
दामिनि जैसा श्रंगार किए 
ऐसी रौनक,इस समाज में, 
कौन भला मातम गायेगा !
मेहँदी रचित हाथ लेकर, अब ऐसे गीत कौन गायेगा ?

सूरज के खिलने से पहले 
फागुन के रंग बरसते हैं !
संध्या होने से पहले ही ,
स्वागत होता दीवाली का
खूब हंसाते इस उत्सव में  
कौन यहाँ रोदन गायेगा 
श्रंगार रंग की मस्ती में , ये मेरे गीत कौन गायेगा ?


हर मन में चाहत रंगों की 
महसूस व्यथा को कौन करे
अपने ही रंग में रंगे हुए ,
अहसास पराया कौन करे
मंगल गानों के अवसर पर, 
वेदना कौन अब गायेगा,
उन्माद भरे इस मौसम में ये मेरे गीत कौन गायेगा ?

कोई गोता खाए बालों में 

कोई डूबा गहरे प्यालों में 
कोई मयखाने में जा बैठा 
कोई सोता गहरे ख्वाबों में 
जलते घर माँ को छोड़ चले ,
बापस क्या करने आएगा ?
 निर्मम लोगों की बस्ती में, ये मेरे गीत कौन जाएगा ?
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