Friday, June 13, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? ( तीसरा भाग )

मुझे एक मित्र ने कहा कि आज स्थिति , ऐसी नहीं जैसी अपने वर्णित की है ! जो लोग शहरों में रहते हैं , उन्हें शायद वस्तुस्थिति का ज्ञान नही है, मूल भारत में आज भी स्थिति वैसी ही है ! मेरा यह मानना है कि सच्चाई को सामने आना ही चाहिए चाहे वह कितनी ही कड़वी क्यों न हो !
छाया प्रकरण से भी आगे
कुछ महा धर्मज्ञानी आए
पदचिन्ह दिखें न शूद्रों के
पैरों में झाडी बाँध चलें
पशुओं से भी बदतर जीवन, कर दिया धर्म रखवालों ने !
मानव जीवन पर ले कलंक, क्यों लोग मानते दीवाली ?

पानी पीने को पनघट पर
कुत्ता आ जाए अनिष्ट नहीं
पर शूद्र अगर मुंडेर से भी
छू जाए , महा अपराधी है
प्यासा गरीब जल के बदले, पिटता है वस्त्र रहित होकर !
मानव को प्यासा मार अरे ! क्यों लोग मानते दीवाली ?

अधिकार नाम से दिया नहीं
कुछ धर्म के इन विद्वानों ने
धन अर्जित संचित करने का
अधिकार लिया रखवालों ने
जूठन एकत्रित कर खाओ, धन का तुम को कुछ काम नहीं !
तन मन धन शोषण कर इनका, क्यों लोग मानते दीवाली ?

वंचित रखा पीढियों इन्हें
बाज़ार हाट दुकानों से,
सब्जी,फल,दूध,अन्न अथवा
मीठा खरीद कर खाने से
हर जगह सामने आता था, अभिमान सवर्णों का आगे !
मिथ्या अभिमानों को लेकर क्यों लोग मानते दीवाली ?

उच्चारण मंत्रों का अशुद्ध ,
कर अपने को पंडित माने।
मांगलिक समय पर श्राद्धमंत्र
मारण पर मंगलगान करें ,
संस्कृत का, क ख ग न पढ़ा , व्याकरण तत्व का ज्ञान नहीं!
ऐसे पंडित कुलगुरु बना, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

3 comments:

  1. बहुत बढ़िया, लिखते रहिये.

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  2. एक एक पंक्ति में समाज की कड़वी सच्चाई व्यक्त की आपने.

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  3. यह रचना १९९३ में लिखी गई थी, एसोसियेशन लीडर होने के नाते, समाज की बुराईयों तथा अन्याय के खिलाफ लड़ने की एक अतिरिक्त ताकत मेरे अन्दर शुरू से थी, उस दर्द की परिणिति इन रचनाओं के मध्यम से हुई! मगर मैंने कभी प्रसिद्धि की इच्छा नही थी इसलिए यह कवितायें डायरी में बंद रहीं ! गूगल ट्रांस्लित्त्रेशन एवं ब्लोगिंग के कारण यह सम्भव हुआ ! और वोः कवितायें आपके सम्मुख आ पा रहीं हैं ! आपलोगों के कहे गए दो शब्दों से उत्साहवर्धन होता है ! आपका धन्यवाद !

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- सतीश सक्सेना