Tuesday, October 21, 2014

कवि कैसे वर्णन कर पाए , इतना दर्द लिखाई में - सतीश सक्सेना

कहीं क्षितिज में देख रही है
जाने क्या क्या सोंच रही है
किसको हंसी बेंच दी इसने
किस चिंतन में पड़ी हुई है

नारी व्यथा किसे समझाएं, गीत और कविताई में !
कौन समझ पाया है उसको, तुलसी की चौपाई में !

उसे पता है,पुरुष बेचारा
पीड़ा नहीं समझ पायेगा
दीवारों में रहा सुरक्षित 
कैसे दर्द, समझ पायेगा
पौरुष कबसे वर्णन करता, आयी मोच कलाई में !
जगजननी मुस्कान ढूंढती,पुरुषों की प्रभुताई में !

पीड़ा,व्यथा, वेदना कैसे
संग निभाएं बचपन का 
कैसे माली को समझाएं 
कष्ट, कटी शाखाओं का 
सबसे कोमल शाखा झुलसी,अनजानी गहराई में !
कितना फूट फूट कर रोयी,इक बच्ची तनहाई  में !

बेघर के दुःख कौन सुनेगा ,
कैसे उसको समझ सकेगा ?
अपने रोने से फुरसत कब
जो नारी को समझ सकेगा ?
कैसे छिपा सके तकलीफें, इतनी साफ़ ललाई में !
भरा दूध आँचल में लायी, आंसू मुंह दिखलाई में !

कैसे सबने उसके घर को
सिर्फ,मायका बना दिया
और पराये घर को सबने 
उसका मंदिर बना दिया
कवि कैसे वर्णन कर पाए , इतना दर्द लिखाई में !
कितना दर्द लिखा कर लायी,अपनी मांगभराई में !

Sunday, October 12, 2014

अल्लाह क्या हुआ होगा - सतीश सक्सेना

नज़र मिले कहीं अल्लाह क्या हुआ होता !
नज़र उठी तो खुदा जाने क्या हुआ होता !

न जाने क्या हुआ, काली घटायें दूर रहीं 
यहीं तड़प के बरसतीं तो क्या हुआ होता !

भला हुआ जो इधर को,नहीं उठीं आँखें
कहीं वे देख हंसें, जाने क्या हुआ होता !    

खुदा करे कि वे चुपचाप ही रहें तब तक
कहीं वे मूड में आ जाएँ, क्या हुआ होता !  

ऐसा लगता है,कि वे रात भर नहीं सोये 
या इलाही न जाने,रात क्या हुआ होता !

Wednesday, October 8, 2014

कैसे सिसके करवाचौथ बिचारी सी - सतीश सक्सेना

प्रतिबद्धता कहें अथवा लाचारी सी !
जगजननी लगती,कैसी गांधारी सी !

धुत्त शराबी से जीवन भर, दर्द सहे !
कैसे सिसके करवाचौथ बिचारी सी ! 

किसने नहीं सिखाया, उसे विदाई में 
पूरे  जीवन रहना , एकाचारी  सी !

छोटी उम्र में क्या बस्ती से सीखा है, 
किसे सुनाये बातें , मिथ्याचारी सी !

धीरे धीरे कवच पुरुष का, तोड़ रही !
कमर है,मालिन जैसी,देह लुहारी सी !

छप्पर डाल के  सोने वाले , भूल गए 
नारी के मन सुलग रही चिंगारी सी !

ग्लानि,थकान,विषाद और उत्पीड़न भी
मिल कर देख न पाये, नारी हारी सी !

Sunday, September 21, 2014

मौत हर वक्त याद रखता हूँ ! - सतीश सक्सेना

सिर्फ इक बात याद रखता हूँ !
मौत हर वक्त याद रखता हूँ !

मुझ पे प्यारों के, कर्ज बाकी हैं !
एक एक लम्हा याद रखता हूँ !

कौन जख्मों को, सोंच कर रोये ! 
सिर्फ खुशियों को याद रखता हूँ !

मौलवी और पंडितों को नहीं !
Daily news Jaipur 30sept14
महज़ अल्लाह, याद रखता हूँ !

कौन मंदिर की लाइनों में लगे !
सिर्फ अम्मा को याद रखता हूँ !

जो कभी साथ ही न चल पाये
मैं तो उनको ही साथ रखता हूँ !

न जाने किस घडी वो आ जाये
घर के सब द्वार खुले रखता हूँ !



Saturday, August 30, 2014

आखिरी फैसला - सतीश सक्सेना

"बेटा मैंने वह ऍफ़ डी  तुड़वा  कर सारे पैसे निकाल लिए तुम भी अपनी बीबी के साथ हिल स्टेशन जा सकते हो....."
 

              उसी दिन दे देते तो दोनों भाइयों के साथ ही चला जाता न  तब सबके सामने इतनी गाली गलौज  की  जरूरत नहीं पड़ती उस दिन तो दबाये बैठे रहे कि आखिरी ऍफ़ डी है ! लाइए पैसे, भाइयों को मत बोलना कि मैंने आपसे लिए हैं ! नहीं तो वह मुझसे अपना हिस्सा लड़ के ले लेंगे ! आज मन करे तो बड़े भाई के कमरे में ऐ सी चलाकर सो जाओ अच्छी नींद आएगी , मैं किसी को नहीं कहूँगा ! जीने के नीचे गर्मी ज्यादा है !

"नहीं पांच छह सालों में मेरी अब मेरी आदत पड़ गयी है , मैं यही ठीक हूँ !"

                                                  ***********
                    जैसा आपसे बात हुई थी सारे अमाउंट का चेक आपकी बैंक में जमा करा दिया गया है यह रही रसीद ! अब आप यहाँ यहाँ दस्तखत कर दीजिये मगर अब आप अकेले कैसे रहेंगे  ?

          "मैंने इस घर के सामने वाले मकान में एक कमरा किराए  पर ले लिया है , काम करने को मेरी पुरानी नौकरानी रहेगी ! इन लड़कों ने धीरे धीरे मकान के तीनो कमरे कब्ज़ा लिए , ड्राइंग रूम में मेरे सोने से घर में इन्फेक्शन फैलता था सो पिछले २ वर्ष से सीढियों के नीचे मेरी खाट डाल दी, अब यह तीनो मेरे मरने का इंतज़ार कर रहे हैं ! मुझे कम पैसों की चिंता नहीं जो तुमने इस मकान के बदले दिए हैं मेरे बुढ़ापे के लिए काफी हैं ! रही बात मकान की , सो मैंने अपने पैसों से बनाया था , उसी मकान में मेरे इन लालची लड़कों ने , धीरे धीरे मुझे सीढियों के नीचे  तक पंहुचा दिया ! तुम तीनों कमरों का सारा सामान निकाल कर सड़क पर रख दो और बाहर एक चौकीदार रख दो, जब तक यह तीनों बापस आएं !"

वे तीनों आपसे लड़ेंगे बाबूजी !

"मुझे परवाह नहीं, पुलिस एस पी से मिल चूका हूँ उन्होंने मेरी रिपोर्ट दर्ज कर ली है किसी भी गलत हालत में तीनों अपनी बीबियों के साथ जेल जायेंगे,मैं अब डरता नहीं !"

Friday, August 22, 2014

आज तुम्हारे दरवाजे भी लगते खूब बुहारे से - सतीश सक्सेना

सूरज के हंसने पर लगता , चाँद, सितारे हारे से !
मुक्त हंसी के कारण चिंतित रहते यार हमारे से !

कैसे झुकी झुकी ही रहतीं, नज़रें शर्म के मारे से 
कब आएगी रात ?पूछतीं अक्सर साँझ सकारे से

बीमारी में सो न सकेंगे , इंसानों  की बस्ती में !
लोग जागरण के चंदे को , फिरते मारे मारे से !

उठो नींद से,जगते रहना,बस्ती नज़र आ रही है 
गहरे सागर से बच आये, खतरा रहे किनारे से !

दारु, बीड़ी और नशे को, दुनिया गाली देती है !
हमने सारा जीवन अपना,काटा इसी सहारे से !

Monday, August 18, 2014

बार बार क्यों मन को बदले, इतनी बार दिखावा क्यों - सतीश सक्सेना

इतनी बार बदलकर कपडे
कुछ प्रभाव तो डाला होगा
इस निर्दोष सौम्य चेहरे से  
औरों  को भरमाया होगा ,
मैली बनिआइन के ऊपर श्वेत सिल्क का कुरता क्यों ?
सारे घर में मैल बहुत है , ड्राइंग रूम सजाना क्यों ?

चौंक चौक रह जाते कैसे,
कहीं झूठ तो बोला होगा 
कैसे नज़रें छिपा रहे हो,
गौरय्या को मारा होगा !
अविश्वास का पर्दा मन में, रिश्तों को उलझाना क्यों ?
मेहमानों के  आगे , नकली मुस्कानों को  लाना क्यों ?

सद्भावना समझ न आये 
औरों से  सम्मान  चाहिए
जीवन भर बेअदबी करके
अपने घर में अदब चाहिए 
संस्कार की व्याख्या ऐसे, गहरे मन से करना क्यों ?
आग लगा अपने हाथों से दैविक दोष बताना क्यों ?

बरसों बीते, गाली देते
अहंकार को खूब पूजते 
अपने पूरे खानदान  में 
मानवता शर्मिंदा करते
ऐसा  क्या जो,सुना सुना के,इतनी कसमें खाना क्यों ?
अब ऐसे क्यों मन घबराये , इतनी बार दिखावा क्यों ?

ऐसे क्यों डरते हो अपने 
दर्पण से शरमाना क्यों ?
कैसे किये गुनाह अकेले 
ऐसे भी  घबराना क्यों ?
पड़ोसियों को कोस कोस कर दीपावली मनाना क्यों ?
बेमन हो सारे जीवन , इन पदचिन्हों पर जाना क्यों ?

Wednesday, August 6, 2014

खुला रास्ता देना होगा , जंग में जाने वालों को - सतीश सक्सेना

किन्हीं गुरुजन के सम्मान में जवाब के कुछ अंश :
आप विद्वान् हैं , मैं विद्वान नहीं हूँ और न विद्वता खोजने निकला हूँ , साहित्य को आगे ले जाना मेरा लक्ष्य नहीं है भाई जी , मेरा लक्ष्य है समाज के पाखण्ड और अपने चेहरों पर लगे मुखौटे उतार कर , सिर्फ इंसान बन पाने की तमन्ना ! अपना कार्य कर रहा हूँ और बिना नाम चाहने की इच्छा के ! सो मुझे यश नहीं चाहिए हाँ सरल भाषा के जरिये अगर कुछ लोग भी इन्हें आत्मसात कर पाए तो लेखन सफल मानूंगा !
मुखौटे उतारने होंगे 
आज कवि और साहित्यकार भांड होकर रह गए हैं पुरस्कारों के लालच में , लोगों के पैर चाटते हुए कवि अब घर, समाज, परिवार सुधार पर नहीं लिखते , धन कमाने को लिखते हैं ! इन्हें समझाने के लिए नियमों में बिना बंधे, काम करना होगा, साहित्यकारों को बताना होगा कि धन और प्रशंसा के लालच में उनके भावनाएँ समाप्त हो गयीं हैं अतः अनपढ़ और सामान्य जन से उनकी कविता बहुत दूर चली गयी है , अब उनकी रचनाएं जनमानस पर प्रभाव छोड़ पाने के लिए नहीं लिखी जातीं  वे सिर्फ आशीर्वाद की अभिलाषी रहती हैं !
भाव अभिव्यक्ति के लिए कवि किसी शैली का दास नहीं हो सकता , कविता सोंच कर नहीं लिखी जाती उसका अपना प्रवाह है बड़े भाई , अगर उसमें बुद्धि लगायेंगे तब भाव विनाश निश्चित होगा ! तुलसी और कबीर ने किस नियम का पालन किया था ! आज भी, कुछ उनके शिष्य हो सकते हैं !
आज गीत और कवितायें खो गए हैं समाज से , मैं अकिंचन अपने को इस योग्य नहीं मानता कि साहित्य में अपना स्थान तलाश करू और न साहित्य से, अपने आपको किसी योग्य समझते हुए, किसी सम्मान की अभिलाषा रखता हूँ ! बिना किसी के पैर चाटे और घटिया मानसिकता के गुरुओं के पैरों पर हाथ लगाए , अंत समय तक इस विश्वास के साथ  लिखता रहूंगा कि देर सवेर लोग  इन रचनाओं को पढ़ेंगे जरूर !
जहाँ तक गद्य की बात है मैंने लगभग ४५० रचनाएं की हैं उनमें कविता और ग़ज़ल लगभग २०० होंगी बाकी सब लेख हैं जो समाज के मुखौटों के खिलाफ लिखे हैं , आपसे बहुत छोटा हूँ मगर कोई धारणा बनाने से पूर्व हो सके तो इन्हें पढियेगा अगर बड़ों का आशीर्वाद मिल सका तो धन्य मानूंगा !!
बहुत ज़ल्द ही ढोंग, मिटाने जागेंगे ,दुनिया वाले,
खुला रास्ता देना होगा , जंग में जाने वालों को !
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ज़ख़्मी दिल का दर्द,तुम्हारे
शोधग्रंथ , कैसे समझेंगे ?
हानि लाभ का लेखा लिखते ,
कवि का मन कैसे जानेंगे ?
ह्रदय वेदना की गहराई, तुमको हो अहसास, लिखूंगा !
तुम कितने भी अंक घटाओ,अनुत्तीर्ण का दर्द लिखूंगा !

Monday, August 4, 2014

दरो दीवार को , हर हाल बचाना होगा - सतीश सक्सेना

घर बचाने के लिए, साथ तो आना होगा !
हमें हर हाल में गौरव को बचाना होगा !

कैसी ज़िल्लत है नाचने में,बताने के लिए !
भरी महफ़िल में मदारी को नचाना होगा ! 

माँ के तकिये में सिले,मेरे ही फोटो निकले 
मेरा ख़याल था, इसमें तो खज़ाना होगा !

आजकल आसमां पर,लोग नज़र रखते हैं
कुछ चमकते हुए तारों को हटाना होगा !

कबसे ठहरा हुआ यह दर्द,पोंछने के लिए ! 
सूखे बंजर में भी मेंहदी को लगाना होगा !

Sunday, August 3, 2014

कभी कभी बेचारा मन -सतीश सक्सेना

माँ का रहा, दुलारा मन !
उन आँखों का तारा मन !

कितनी मायूसी में सोया 
उनके बिन बेचारा मन !

चंदा सूरज से लड़ आया
ऐसे कभी न हारा मन !

कैसे बेमन होकर माना ,
माना नहीं हमारा मन !

जाने किसको ढूंढ रहा है    
गलियो  में बंजारा मन !

Friday, July 25, 2014

मुझको सदियों से रुलाता है कोई - सतीश सक्सेना

मुझको सदियों से,रुलाता है कोई !
रोज आकर , थपथपाता है कोई !

करवटें मुझको बदलता देखकर ,
पुच्चियाँ करके, सुलाता है कोई !

नींद अक्सर ही मुझे आती नहीं,
हाथ बालों में, फिराता है कोई !

जब कभी यादें , न सोने दें मुझे ,
नींद को , लोरी सुनाता है कोई !

जब कभी आँखों से आंसू छलकते   
रात भर हिम्मत दिलाता है कोई !

एक बच्चे से ही, तो गलती हुई ! 
पूरे जीवन , रूठ जाता है कोई !

कितनी रातें रूठ कर खाया नहीं 
एक कौरा, मुंह में दे जाता कोई !

Wednesday, July 23, 2014

जिस दिन पहली बार मिलोगे, गाओगे - सतीश सक्सेना

पहली  बार मिलोगे तो शरमाओगे !
सब  देखीं तस्वीरें ,  फीकी पाओगे !

जब जब तुमको याद हमारी आएगी
बिना बात ही घर बैठे , मुस्काओगे !

गीत हमारे खुद मुंह पर आ जाएंगे
जब भी नाम सुनोगे,गाना गाओगे !

आसमान की राहें, आसां कहाँ रहीं
सूर्यवंशियों की , ठकुराहट पाओगे ! 

बार बार समझाया,चाँद सितारों ने 
नहीं अकेले जाओ तुम फंस जाओगे !



Saturday, July 19, 2014

दरवाजे पर कौन खड़ा है,इतनी रात बधाई को ! - सतीश सक्सेना

अदब कायदा खूब सिखाओ शेख कुएं औ खाई को !  
गिरना है वो गिर के रहेगा , देगा दोष खुदाई को ! 

सारे फ़र्ज़ निभाए हमने,अब जाने का वक्त हुआ !   
दरवाजे पर कौन खड़ा है,इतनी रात बधाई को !

घर में कीचड़ खूब उड़ाई,उसने पूरा काम किया !
आसानी से दाग़ न जाएँ , करते रहो पुताई को !

लेना देना रस्म रिवाजों से ही घर का नाश हुआ
बहू तो कब से इंतज़ार में बैठी मुंह दिखलाई को !

प्रतिरोपण के लिए वृक्ष की कोमल शाखा दूर हुई, 
बरगद की झुर्रियां बताएं , कैसे सहा विदाई को !

Wednesday, July 16, 2014

अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा करा कर जाऊँगा ! - सतीश सक्सेना

जाने से पहले दुनियां को,कुछ गीत सुनाकर जाऊंगा !
अनुराग समर्पण निष्ठा में, कुछ योगदान कर जाऊंगा ! 

श्रीहीन हुए स्वर,गीतों के , झंकार उठाकर जाऊंगा !   
अनजाने कवियों के पथ में,कुछ फूल चढ़ाकर जाऊंगा !

बंजर रेतीली धरती में , कुछ वृक्ष लगाने का मन है !
मानव हूँ,जग संरचना में,कुछ अंशदान कर जाऊँगा !

जब कलम उठाई हाथों में , लोगों ने छींटे , खूब कसे !
स्मरण कबीरा का करके,शीशा दिखला कर जाऊँगा !

लाचार वृद्ध, अंधे, गूंगे, पशु, पक्षी की तकलीफों को !
लयबद्ध उपेक्षित छंदों में,सम्मान दिला कर जाऊँगा !

कुछ वादे करके निकला हूँ अपने दिल की गहराई से 
अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा करा कर जाऊँगा !

Saturday, July 12, 2014

हमें तुम्हारी, लिखते पढ़ते , जानी कब परवाह रही है -सतीश सक्सेना

तुम जुगनू के व्यापारी हो 
हम प्रकाश ,फैलाने वाले !
तुम गीतों के सौदागर हो
हम निर्भय हो गाने वाले !
हमको कब हिन्दी दल्लों की, जीवन में परवाह रही है !
रचनाएं,कवियों की जग में,इकबालिया गवाह रही हैं !

सबक सिखाने की मस्ती में 
शायद, साँसे भूल गये हो !
चंद दिनों की हँसी और है 
शायद मरघट भूल गए हो ! 
स्वाभिमान को सबक सिखाने,चेष्टा बड़ी,अदाह रही है !
हमको भी,तुम पर हंसने की इच्छा बड़ी अथाह रही है !

अरे ! तुम्हारा चेला  कैसे 
तुम्हें भूलकर पदवी पाया
तुम गद्दी को रहे सम्हाले 
औ वो पद्मविभूषण पाया  !
कोई सूर बना गिरिधर का, कोई मीरा रसदार रही है !
हंस, हंस खूब तमाशा देखें , जानी कब परवाह रही है !

सबके तुमने पाँव पकड़ कर
गुरु के सम्मुख बैठ, लेटकर  
कवि सम्मेलन में बजवाकर
दांत निपोरे,हुक्का भरकर 
तितली जगह जगह इठलाकर,करती खूब विवाह रही है !
सूर्यमुखी में महक कहाँ से ? दुनियां  में  अफवाह रही है !

बड़े, बड़े मार्तण्ड कलम के
जो न झुकेगा उसे मिटा दो 
जीवन भर जो पाँव दबाये 
उसको पद्मश्री दिलवा दो !
बड़े बड़े विद्वान उपेक्षित , चमचों पर रसधार बही है !
अहमतुष्टि के लिए समर्पित,चेतन मुक्त प्रवाह बही है !

गुरुवर तेज बनाये रखना 
चेलों के गुण गाये रखना !
भावभंगिमाओं के बलपर 
इनको कवि बनाये रखना !
समय आ गया भांड गवैय्यों को, हिंदी पहचान रही है !
जितनी सेवा जिसने करली,उतनी ही तनख्वाह रही है !

Thursday, July 10, 2014

कैसे कैसे लोग भी, गंगा नहाये इन दिनों ! ! -सतीश सक्सेना

अनपढ़ों के वोट से , बरसीं घटायें  इन दिनों !
साधू सन्यासी भी आ मूरख बनाएँ इन दिनों !

झूठ, मक्कारी, मदारी और धन के जोर पर ,  
कैसे कैसे लोग भी , योद्धा कहायें इन दिनों !

चोर डाकू चुन चुना के , राजधानी आ गए ,
आप संसद के लिए, आंसू बहायें इन दिनों !

देखते ही देखते सरदार को , रुखसत किया ,
बंदरों ने सीख लीं कितनी कलायें इन दिनों !

ये वही नाला है जमुना नाम था,जिसके लिए, 
साफ़ करने के लिए, चलती हवायें इन दिनों !



Friday, July 4, 2014

अल्लाह हर बशर को, रमज़ान मुबारक हो - सतीश सक्सेना

अल्लाह हर बशर को, रमज़ान मुबारक हो
सब को इबादतों का, अरमान मुबारक हो !


माता पिता को रखना ताउम्र प्यार से तुम !
अल्लाह का दिया ये , अहसान मुबारक हो ! 


इन रहमतों के क़र्ज़े , कैसे  अदा  करोगे ?
माँ-बाप का ये प्यारा दालान मुबारक हो !


रहमत के माह में तो कुछ काम नेक कर ले
जो दे सवाब तुम को रहमान , मुबारक हो !


मुझ को मेरे ख़ुदाया तू राहे हक़ प रखना
तेरा अता किया  , ये ईमान मुबारक हो !

Sunday, June 29, 2014

अनु को मेरे पूरे प्यार के साथ -सतीश सक्सेना

विद्वानों में गिने जाते हम लोग, अक्सर जीवन की सबसे बड़ी हकीकत, मौत की याद नहीं आती जब तक सामने कोई हादसा न हो जाए ! 
आज अनु की जन्मदिन पर वह मनहूस दिन याद आ गया जब उसने अपने नन्हें अजन्में पुत्र के साथ अंतिम सांस ली थी ! वह अपने घर की सबसे प्यारी लड़की थी जिसका खोना हम कल्पना भी नहीं सकते मगर घर के सब बड़े बूढ़ों को छोड़ सबसे पहले, वही, यहाँ से चली गयी !

दूर देश जाना,  था उसने ,
पंखों से, उड़ जाना उसने 
प्यार बांटकर हँसते हँसते 
परियों सा खो जाना उसने 
स्वर्णपरी कुछ दिन आकर ही,सबको सिखा गयी थी गीत !
कहाँ खो गयी, हंसी  तुम्हारी  ,किसने छीन लिया संगीत   ?

ऐसा लगता , हँसते गाते 
तुझको कोई छीन ले गया !
एक निशाचर,सोता पाकर 
घर से तुमको उठा ले गया !
जबसे तूने छोड़ा हमको, शोक मनाते  मेरे गीत !
सोते जगते, अब तेरी,  तस्वीर बनाएं मेरे  गीत !

काश कभी तो सोंचा होता 
इतनी  बुरी  रात आयेगी ,
नाम बदलते,तुझे छिपाते 
बुरी घडी भी कट जायेगी !
बड़े शक्तिशाली बनते थे ,बचा न पाए तुझको गीत ! 
रक्त भरे वे बाल तुम्हारे , कभी  न  भूलें मेरे गीत ! 

ऐसा पहली बार  हुआ था  
हंसकर उसने नहीं बुलाया 
हम सब उसके पास खड़े थे 
उसने हमको, नहीं बिठाया  !
बिलख बिलख कर रोये हम सब,टूट न पाई उसकी नींद ! 
उठ जा बेटा तुझे जगाते , सिसक सिसक कर रोये गीत  !

कितनी सीधी कितनी भोली 
हम सब की हर बात मानती 
बच्चों जैसी, लिए सरलता,
स्वागत करने हंसती आती !
जब जब, तेरे घर पर जाते,  तुझको ढूंढें मेरे गीत  !
हर मंगल उत्सव पर बच्चे, शोक मनाएं मेरे गीत  !

जाकर भी वरदान दे गयी 
श्री धर  पुत्री, दुनिया को !
खुद केशव की  रक्षा करके ,
दान दे गयी , दुनिया को !
बचपन अंतिम , साँसे लेता , सन्न रह गये सारे गीत !  
देवकि पुत्री के जीवन को ,बचा  न  पाए  मेरे  गीत  !

                          अनु के असमय जाने को याद करते समय, आज सोंच रहा था कि पिछले ३७ साल की नौकरी में लगभग हर चार वर्ष बाद एक ट्रांसफर हुआ है , इस वर्ष ऑफिस वाला आखिरी ट्रांसफर (रिटायरमेंट) भी होना है , अगर इसी क्रम में गिनता जाऊं तो शायद दुनियां से, ट्रांसफर होने में अधिक समय बाकी नहीं है ! फोटोग्राफी का बचपन से शौक रहा है , शायद मैं अकेला लेखक हूँ जो कि अपनी हर रचना के साथ अपना चित्र अवश्य लगाता है ताकि सनद और मुहर लगती रहे इन कविताओं और विचारों पर कि ये किसके हैं ! जाने के बाद हम सिर्फ अपने निशान छोड़ सकते हैं , और अगर वे अच्छे और गहरे हों तो अनु की तरह लोग याद करेंगे और आंसुओं के साथ करेंगे  !!  
love you sweet girl  !

Saturday, June 28, 2014

कौन जाने यह विधाता कौन है ? - सतीश सक्सेना

ऐसी दुनियां को बनाता कौन है ?
कौन जाने यह विधाता कौन है ?

इस बुढ़ापे में, नज़र क़ाफ़िर हुई,
वरना ऐसे  गुनगुनाता कौन है ?

इश्क़ की पहचान होनी चाहिए
बे वजह यूँ  मुस्कराता कौन है ?

आपको तो, काफिरों से इश्क है !
वर्ना इनको मुंह लगाता कौन है ?

चाँद की दरियादिली तो देखिये 
रात से भी प्यार करता कौन है ? 

जाके वृन्दावन में,क्यों ढूंढें उन्हें ?   
अब वहां मुरली बजाता कौन है ?

कौन दिन थे जब ठहाके गूंजते थे 
आज अपनों को बुलाता कौन है ?

Tuesday, June 24, 2014

ये ग़ज़ल कैसी रही ? - सतीश सक्सेना

आप को घर से बुलाती , ये ग़ज़ल कैसी रही ?
आंसुओं में झिलमिलाती,ये ग़ज़ल कैसी रही ?

इस उदासी का सबब, कैसे बताएं भीड़ को,
उनकी यादों में तड़पती,ये ग़ज़ल कैसी रही ?

काश उनको भेज दे,अल्लाह इकदिन के लिए
पत्थरों पर सर पटकती, ये ग़ज़ल कैसी रही ?

जा रहे हो छोड़ शायद ,अब हमेशा के लिए ? 
आंसुओं के संग झरती , ये ग़ज़ल कैसी रही  ?

कैसे शायर है जबरिया,तालियां बजवा रहे,
क़दरदानों को रुलाती, ये ग़ज़ल कैसी रही ?

वाहवाही क्यों लुटाते,हर किसी रुखसार पर
खुद मुरीदों को मनाती , ये ग़ज़ल कैसी रही ?

काबा,कंगूरों से चलकर मयकदे के द्वार तक    
मूड पे शायर के मरती, ये ग़ज़ल कैसी रही ?



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