Monday, February 8, 2016

नुक्कड़ भी अचानक से ही अनाथ हो गया - सतीश सक्सेना

अविनाश वाचस्पति ब्लॉगिंग सभा संचालित करते हुए 
नुक्कड़ भी अचानक से , ही अनाथ हो गया ! 
ऐसा भी क्या हुआ, ये चमन ख़ाक हो गया !

अविनाश के जाते ही,कुछ सुनसान सा लगे 
ब्लॉगिंग में मुन्नाभाई भी, इतिहास हो गया !

कितने दिनों से लड़ रहा था, मौत से इकला
जीवन में जी लिए हैं, ये  अहसास हो गया !

दर्दों में भी हँसता रहा, अविनाश अंत तक 
आखिर ये ज़ज़्बा मस्त भी खलास हो गया !

इक दिन तो मुन्ना भाई,वहां हम भी आएंगे,
अखबार में छपेगा  कि , अवसान हो गया !

Wednesday, January 27, 2016

आँधियों ने ओढ़ ली इतनी उदासी किस लिए ? - सतीश सक्सेना

क्या हुआ,जो सोंच में, डूबी खुमारी किसलिए ?
आँधियों ने ओढ़ ली इतनी उदासी किस लिए ?

तुम तो कहते थे, न सोओगे, न सोने दो मुझे
आज ऐसा क्या हुआ,इतनी उबासी किस लिए ?

ऐसी क्या अवमानना की मानिनी की, प्यार ने
चमक चेहरे की हुई है,अमलतासी किस लिए ?

लगता घायल हो हुए हो, जख्म गहरे दिख रहे
पागलों के पास जाकर मुंह दिखायी किसलिए ? 

ये भी अच्छा है कि पछतावा रहे , सरकार को
इक दीवाने के लिए भी जग हँसायी किसलिए ?

Saturday, January 16, 2016

यह आवाज,अजान नहीं है -सतीश सक्सेना

चाँद कोई मेहमान नहीं है,
लोगों पर अहसान नहीं है !

अपने लोगों को वर देना
वैसे भी, अनुदान नहीं है !

मंदिर मस्जिद स्पीकर की ,
यह आवाज,अजान नहीं है !

बेबस निर्बल पशु हत्या है
यह कोई बलिदान नहीं है !

सब के सपने पूरा करना ,
इतना भी आसान नहीं है !

तुम्हें मुक्त कर हम सो जाएँ
और कोई अरमान नहीं है !

जितना संग दिया सपने में 
भुला सकें आसान नहीं है !


Monday, January 11, 2016

सहज रहने नहीं देगी, तेरी मौजूदगी मुझको - सतीश सक्सेना

भरी आँखें रुलायेंगी तेरी,  ताजिन्दगी मुझको ,
तुम्हारी याद के संग आयेगी शर्मिंदगी मुझको !

हमें अरसा हुआ दुनियां के मेलों में नहीं जाते 
सहज रहने नहीं देगी, तेरी मौजूदगी मुझको !

न मिलने की तमन्ना शेष न दीदार की ख्वाहिश
बहुत तकलीफ ही देगी,तुम्हारी बंदगी मुझको !

जमाने भर से लड़ने में कभी नज़रें न नीची कीं   
कहीं मज़बूर न कर दे, तेरी बेपर्दगी  मुझको !

खुदा के सहज बन्दे को, दिखावे ही नहीं आते, 
न जाने क्यों लगे अच्छी मेरी आवारगी मुझको !

Monday, January 4, 2016

शायर बनकर यहाँ गवैये आये हैं - सतीश सक्सेना

आज हंसाने तुम्हें, मसखरे आये हैं,
शायर बनकर यहाँ गवैये छाये हैं !

पैर दबा कर, मंचों के अध्यक्ष बनें,
भाषा से भी नोट कमा कर खाए हैं !

रोज शाम कटती मंत्री के दरवाजे
डॉक्ट्रेट मालिश पुराण में पाये हैं !

कैसे अपनी भावभंगिमा के बल पर 
कितने जोकर पद्म श्री कहलाये हैं !

अदब, मान मर्यादा जाने कहाँ गयी,
ग़ज़ल मंच पर,लहरा लहरा गाये हैं !

Tuesday, December 29, 2015

एक अजनबी जाने कैसा गीत सुनाकर चला गया -सतीश सक्सेना

एक पुरुष गीतकार के लिए, महिलाओं की भावनाओं को उकेरना और उनका गीत चित्र बनाना आसान नहीं होता , काफी समय से अधूरा यह गीत , आज आपकी नज़र है !

सो न सकूंगी आसानी से 
याद दिलाती, रातों में !
बंद न हो पाएं  दरवाजे
कुछ तो था उन बातों में !
ले कंगन मनिहार बेंचने 
आया इकदिन आँगन में ,
कैसे सम्मोहन  में लाकर,
छेड़छाड़ कर चला गया !
पहली बार मिला,जूड़े में फूल सजा के चला गया !

रोक न पायीं अनजाने को
मंत्रमुग्ध सा आवाहन था !
सागर जैसी आकुलता ले 
लगता कैसा मनमोहन था !
हृदयपटल ले गया चितेरा 
चित्र बनाकर, चुटकी में, 
सदियों से थे ओंठ कुंवारे, 
गीले करके चला गया !
बैरन निंदिया ऐसी आयी,मांग सज़ा के चला गया !  

उसके हाथ सुगन्धित इतने
मैं मदहोशी में खोयी थी !
उसकी आहट से जागी थी
उसके जाने पर सोयी थी !
केशव जैसा आकर्षण ले 
आया था दिल आँगन में !
जाने कब मेंहदी से दिल का, 
चिन्ह बनाकर चला गया !
कितनी परतों में सोया था दिल,सहला कर चला गया !

उसके सारे ही, मन चाहे ,
जगती आँखों मध्य हुए थे
जाने कैसी बेसुध थी मैं 
अस्तव्यस्त से वस्त्र हुए थे
सखि ये सबके बीच हुआ था
भरी दुपहरी आँगन में ,    
लगता कोई हौले हौले,
लट सहला के चला गया ! 
पहली बार मिला,जूड़े में फूल सजा के चला गया !

Saturday, December 26, 2015

कौन गुस्ताख़ छेड़ता है हमें - सतीश सक्सेना

कोई हर वक्त  देखता है हमें ,
जैसे जनमों से जानता है हमें !

जिसने आवाज दी,यहाँ आये 
कौन गुस्ताख़, छेड़ता है हमें ?

वह बे मिसाल हौसला लेकर  
गहरी मांदों में खोजता है हमें ! 

नासमझ आशिकी सलामत है 
इतनी शिद्दत से चाहता है हमें !

इश्क़ ने दर्द , बेमिसाल दिया ,
कोई सपनों में हंसाता है हमें !

Tuesday, December 22, 2015

नाम नदियों का रखे, देश में नाले देखे -सतीश सक्सेना

मैंने भी गांव में , कुछ घर बिना ताले देखे !
बुझे चूल्हे मिले और बिन दिये,आले देखे !

कभी जूठन,कभी पत्ते और घास की रोटी
किसने मज़दूर के घर खाने के लाले देखे !

आ गया हाथ उठाना भी अब गुलाबों को 
कितने भौंरों के बदन में, चुभे भाले देखे ! 

कैसे औरों पे आसानी से उठाते, उंगली !
तेरे महलों की दिवारों में भी जाले देखे !

भला हुआ कि सरस्वती है, जमीं के नीचे
नाम नदियों का रखे,कितने ही नाले देखे !

Saturday, December 12, 2015

खूब पुरस्कृत दरबारों में फिर भी नज़र झुकाएं गीत - सतीश सक्सेना

जिन दिनों लेखन शुरू किया था उन दिनों भी, एक भावना मन में थी कि अगर मेरी कलम ईमानदार है तो किसी से प्रार्थना करने नहीं जाऊंगा कि मेरे लेखन को मान्यता मिले, आज नहीं तो कल, देर सवेर लोग पढेंगे अवश्य !
आश्चर्य होता है कि यहाँ के स्थापित विद्यामार्तंड, किस कदर चापलूसी पसंद करते हैं ……… 
 हमें हिंदी के सूरज और चांदों का विरोध करना चाहिए और जनता के सामने लाना चाहिए हो सकता है इन ताकतवर लोगों के खिलाफ बोलने से, इनके गुस्से का सामना करना पड़े मगर हमें इस तरह के घटिया सम्मान की परवाह नहीं करनी चाहिए ! 

मंगलकामनाएं हिन्दी को, एक दिन इसके दिन भी फिरेंगे !

कैसे कैसे लोग यहाँ पर
हिंदी के मार्तंड कहाए !
कुर्सी पायी है मस्के से
सुरा सुंदरी,भोग लगाए !
ऐसे राजा इंद्र  देख कर , हंसी उड़ायें मेरे गीत !
हिंदी के आराध्य बने हैं,कैसे कैसे लोभी गीत !

कलम फुसफुसी रखने वाले 
पुरस्कार की जुगत भिड़ाये
जहाँ आज बंट रहीं अशर्फी  
प्रतिभा नाक रगडती पाये  !
अभिलाषाएं छिप न सकेंगी,इच्छा बनें यशस्वी गीत !
बेच प्रतिष्ठा गौरव अपना,पुरस्कार हथियाते  गीत !

इनके आशीषों से मिलता
रचनाओं का फल भी ऐसे
एक इशारे से आ जाता ,
आसमान, चरणों में जैसे !
सिगरट और शराब संग में साकी के संग बैठे मीत !  
पाण्डुलिपि पर छिडकें दारु,मोहित होते मेरे गीत !

चारण,भांड हमेशा रचते
रहे , गीत  रजवाड़ों के  !
वफादार लेखनी रही थी
राजों और सुल्तानों की !
रहे मसखरे, जीवन भर ही, खूब सुनाये  स्तुति गीत !
खूब पुरस्कृत दरबारों में फिर भी नज़र झुकाएं गीत !

Wednesday, October 21, 2015

कौन आये साथ मेरे दर्द सहने के लिए -सतीश सक्सेना

कौन आये साथ , गहरे दर्द सहने के लिए,
हम अकेले ही भले,जंगल में रहने के लिए !

जिस जगह जाएँ वहां बौछार फूलों की रहे 
तुम बनाये ही गए , सम्मान पाने के लिए !

शिष्ट सुन्दर सुखद मनहर देवता आदर करें
कौन लाया जंगली से प्यार करने के लिए !

माँद के अंदर न जाएँ, ज़ख्म ताजे बह रहे
समय देना है,बबर के घाव भरने के लिए !

जाति,मज़हब,देश से इंसान भी आज़ाद हो,  
पक्षियों  से सीखिये,उन्मुक्त उड़ने के लिए !




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