Saturday, April 19, 2014

मुझको इस देश के आँगन में दिखता है चन्दा कोई नहीं -सतीश सक्सेना

इन बुरी अँधेरी रातों में, आकाश में चन्दा कोई नहीं !
सारे दलाल हैं राष्ट्रभक्त , ईमान का बन्दा कोई नहीं !

धन अर्जित करना लक्ष्य बना, बाबा,सन्यासी आये हैं !     
धन लालच करने जीवों में,इंसान से गन्दा कोई नहीं !

वृद्धों को अपनों ने लूटा, बिन ममता मोह शातिरों ने !  
मरने के लिए ही छोड़ा है,पर घर में फन्दा कोई नहीं !

उस रात अँधेरे घर आकर, इक बूढ़ा द्वार सुधार गया !  
दिखने में बढई लगता था,पर हाथ में रन्दा कोई नहीं !

लाखों कतार में राष्ट्रभक्त , बैठे हैं, नोट कमाने को !
इन दिनों राज नेताओं के ,  धंधे में मन्दा कोई नहीं !

Thursday, April 17, 2014

कुछ तो बातें, ख़ास रही हैं चेले में - सतीश सक्सेना

 भारतीय  राजनीति में, अपने राजा की, उनके ही शिष्यों द्वारा , इतनी दुर्दशा कभी नहीं देखी गयी , सत्ता की भूख का ऐसा अवसान और उदाहरण न पहले कभी देखा गया और न देखने की उम्मीद है ! अपने ही घर के मुखिया और शिखर पुरुषों के साथ , यह सलूक भारतीय संस्कार पढ़ाने वालों  के नाम पर, एक कलंक का धब्बा रहेगा  ! 
श्रद्धांजलि इन महान नेताओं को, जिन्होंने ऐसे सपूत जन्में.......

कैसे यह  सरदार गिर गया खेले में,
कुछ तो गहरी बात,  रही है चेले में !

नैतिकता की बातें , करने वालों ने ,
मार दिया सरदार , घेर के, मेले में ! 

रोज राम की कसमें,खाने वालों ने 
रुला दिए खुद राम, अयोध्या मेले में !

कैसे बादल फटे,अभी तो फेंका था   
इतनी ताकत कहाँ लगी थी, ढेले में !

दूध पिला के,कई सपोले पाले थे !   
सबने मिलकर काटा , उन्हें अकेले में !

जो रथवान रहे थे इनके जीवन में 
रथ के पीछे , बाँध  घसीटा  मेले में !

ऐसे ही शुभ लाभ चाहने वालों ने !
लाला जी को , बेंच दिया है धेले में !

ये पहले युग पुरुष कहाये जाते थे,
बड़ा ही कड़वा स्वाद है,सड़े करेले में !

लगता है ये चाय,जहर बन जायेगी !
परजा तड़पे खूब , पिए  जब  रेले में !

Wednesday, April 16, 2014

जलतरंग सी मीठी ध्वनि को, चूड़ी कंगन लाने होंगे -सतीश सक्सेना

जो कुछ हमने लिख छोड़े हैं,गीत तुम्हें ही गाने होंगे ,
बेटा यहाँ संभल के चलना,कितने राह अजाने होंगे !

सांस नहीं ले सके सुबह से,हँसते रोते शाम हो गयी,
वारिश के आने से पहले , अपने  छप्पर छाने होंगे !

अंतिम क्षण तक टूट न पाएं , ऐसे हों ये रिश्ते नाते ,
आधी जान हमारी उस घर , वे कैसे अनजाने होंगे !

अर्थ, समीक्षाकार लिखेंगे , कैसे उनकी बात बताऊँ ,
गीतकार की हर कविता के,जाने कितने माने होंगे !

लोकतंत्र के जलप्रवाह में बसी गन्दगी सड़ती जाती,
इन परनालों के जमुना में,कहीं न कहीं मुहाने होंगे !

ब्रेकफास्ट कडवे शब्दों का,हमें चाय के साथ खिलाते,
जलतरंग सी मीठी ध्वनि को, चूड़ी कंगन लाने होंगे !

गिनती के दिन चुकने आये,अपने सारे काम करा लें !
कौन जानता कल सतीश के जाने कहाँ ठिकाने होंगे !

Sunday, April 13, 2014

अबतो मंदिर के इश्तिहार छपाया करिये -सतीश सक्सेना

धर्म का डर दिखा इंसान, रुलाया करिये !
और इस डर को सरे आम,भुनाया करिये !

अब तो बस्ती में, दरिंदे भी तो पाये जाते
कभी तो मौलवी बस्ती में,घुमाया करिये !

अपने लोगों से तो हर वक्त, घिरे रहते हो 
कभी गैरों को भी,दावत में बुलाया करिये !

आज कल आप की हैवानियत , के चर्चे हैं  
रातभर जागरण से भी तो छुपाया करिये !

ये तो अक्सर ही गरीबों की बात करते हैं 
इन्हे कभी तो खुले आम, सुलाया करिये !




Friday, April 11, 2014

नेतृत्व विहीन समाज और ताकतवर मीडिया -सतीश सक्सेना

           बरसों हो गए, भारतीय मीडिया में, देश की किसी उपलब्धि की चर्चा नहीं सुनायी पड़ी , इस बीच देश ब्रिक देशों में आकर अग्रणीय चार देशों में शामिल हुआ , देश में फोरेक्स रिज़र्व , अमेरिका से भी अधिक हुआ , एटोमिक वारहेड से लेकर, 5000 km से अधिक दूरी पर मार करने वाली अग्नि -५ का प्रक्षेपण, एटॉमिक पॉवर संचालित पनडुब्बी एवं ४०००० टन से अधिक वजन वाला विशाल एयरक्राफ्ट कैरियर या क्रायोजेनिक इंजिन का स्वदेश में विकास हो , हमारी मीडिया ने, इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी इनकी जगह टी वी पर छाये रहे,नेताओं के चारित्रिक पतन और भ्रष्टाचार के किस्से, और न्यूज़ चैनल इन सच्चे झूठे, करप्शन केस दिखा दिखा कर, मालदार बनते रहे !

           साफ़ लग रहा था कि कैसे देश की जनता में यह भर दिया जाए कि देश नेतृत्व विहीन है और अगर बैसाखियों के सहारे चलते, सत्ता पक्ष को तुरंत नहीं हटाया गया तो देश रसातल में चला जाएगा ! टमाटर,प्याज ,पेट्रोल,डीज़ल की कीमतों में वृद्धि से लेकर खा गए ,खा गए का शोर शराबा इतना था कि हमारे दुश्मन देशों द्वारा हमें बदनाम करने के प्रयास, मीलों पीछे रह गए ! सारे विश्व को यह महसूस हो गया कि हम एक महाभ्रष्ट देश के,दयनीय निवासी हैं !

          इस शोर शराबे में तालियां पीटते, विकल्प में जो लोग खुद को सत्ता का अधिकारी बता रहे थे वे वही सफ़ेद कपडे, सफ़ेद जूते और मोटी तोंद वाले लोग थे, जैसे सत्ता में बैठे हुए थे जिन्हें जनता नेता जी के रूप में खूब पहचानती थी, फर्क बस इतना था कि चुनाव चिन्ह अलग अलग थे !

           लगातार चोर चोर सुनती अनपढ़ जनता को, आखिरकार सत्ता धारी, चोर दिखायी देने लगे और विपक्ष में कई बरसों से बैठी भूखी प्यासी, दूसरी पार्टी के लिए, तथाकथित संत जैसे लगते नेताओं को प्रोजेक्ट करने का यह सबसे बड़ा मौका लगा ! टीवी चैनलों की पौ बारह हो गयी,अपने अपने काम कराने वाले धनपतियों के पास, पैसे की कोई कमी नहीं थी !

           अनपढ़ भीड़ को सबसे अधिक प्रभावित, धन के लिए हाथ पैर मारते टेलीविजन मीडिया ने ही किया है और इन्होने वह सब जनता को परोसा जो सत्ताधारियों  से गहरी वितृष्णा और नफरत पैदा करे और सहजता से वह कामयाब भी रही !

            कमजोर राजनैतिक आधार, असहाय सा खड़ा रहा सब देखता रहा , मीडिया को काबू करने का न साहस था और न भीड़ जैसी देसी मानसिकता वाले, जन सैलाब का साथ ! अगर किसी ने बढ़िया से बढ़िया काम को मिटटी में मिलाने का उदाहरण देखना हो तो इस देश में आकर देख सकता है सिर्फ तालिया बजाना शुरू करिये और ५ साल तक बजाते रहिये , चोर चोर कहते रहिये और जनता अगली बार आपको ही चुनेगी !

            पक्ष और विपक्ष द्वारा एक दुसरे पर भ्र्ष्टाचार के आरोपों  और मीडिया द्वारा चटपटा बना कर विश्व जनमत में परोसने की बदौलत, देश का स्वाभिमान एवं आत्मविश्वास लगभग ख़त्म कर दिया गया है और अब उसे पुराना सम्मान विश्व की नज़रों में दिलाने में बरसों लगेंगे, चाहे सत्ता  किसी भी पार्टी की आये !

( आज बी एस पाबला जी ने मेल द्वारा इस पोस्ट के रायपुर में छापने की सूचना दी , आभार उनका )

Thursday, April 10, 2014

ये ग़ज़ल के कद्रदां भी क्या करें ? -सतीश सक्सेना

इस जमीं के बागवाँ भी, क्या करें ?
smoking is injurious to health
बिन बुलाये खामखां भी,क्या करें ?

अब ये जूता और थप्पड़ ही सही !
इस वतन के नौजवां भी,क्या करें ?


भौंकने पर इस कदर नाराज हो
ये बेचारे, बेजुबां भी , क्या करें  ?

हाले धरती,देख कर ही रो पड़े,
दूर से ये आस्मां भी , क्या करें ?


लगता इस घर में कोई बूढा नहीं 
अब हमारे मेजबाँ भी, क्या करें ?

झाँकने ही झांकने , में फट गए ,
ये हमारे गिरेबां भी , क्या करें ?


तालियां, वे  मांग कर बजवा रहे
ये गज़ल के कद्रदां भी, क्या करें ?

Monday, April 7, 2014

मूर्खों को हर बार,चेताना पड़ता है ! -सतीश सक्सेना

जीवन भर कैसे, पछताना पड़ता है !
कैसे बेमन समय, बिताना पड़ता है !

राजनीति में, धन का धंधा होता है,
ऐसे क्यों हर बार ,बताना पड़ता है !

नाग  देख के , कौवे  शोर मचाते हैं !
मूर्खों को हर बार,चिताना पड़ता है ! 

हम पर हमले से, पहले तो सोचोगे !
बीच में पहले,राजपुताना पड़ता है !

रोटी,पानी,कपडे, दवा और दारु को  
उनको कितनी बार,सताना पड़ता है !

Thursday, April 3, 2014

लालची राजनैतिक झंडेबरदार -सतीश सक्सेना

आज कल राजनीतिक नेताओं के झंडेबरदार ,बहुत अधिक क्रियाशील हैं , देश में ४-५ प्रमुख पार्टियों के प्रचार के लिए,नेताओं के इन एजेंटों को, आप फेसबुक पर, मुंह से झाग निकालते हुए, विपक्षी नेता को गालियाँ देते देख सकते हैं ! जबतक किसी विशेष पार्टी की आप बुराई न कर रहे हों तब तक ठीक हैं अगर आपने कोई खामी बता दी तो ये तुरंत आपको विपक्षी पार्टी का आदमी बताकर, गाली गलौज पर उतर आयेंगे ! 

बदचलन, असंस्कारी एवं भ्रष्ट राजनीतिज्ञों की सम्मान रक्षा के लिए, यह झंडाबरदार, किसी भी हद को पार करते देखे जा सकते हैं ! पार्टी कार्यकर्ता का तमगा लगाए ये लोग, वास्तव में , पार्टी के झंडाबरदार हैं , जो दुम हिलाए अपने नेता के पैरों में, इस उम्मीद से बैठे रहते हैं कि कभी तो उनका हिस्सा उन्हें मिलेगा और वारे न्यारे होंगे ! इस बीच में अपने राजा को खुश करने के लिए, जब तब , विरोधी पक्ष की निकलती हुई गाडी के पीछे दौड़ते हुए, तब तक भौंकते हैं जब तक खुद राजा उन्हें चुप हो जाने के लिए न कह दे !

आज संतोष त्रिवेदी ने एक बयान दिया जिसमें उन्होंने दुःख व्यक्त किया कि इस कट्टरता के चलते कुछ मित्रों ने उनसे किनारा कर लिया , अपने संवेदन शील मित्र को, मेरा सुझाव था कि अच्छा हुआ जो इन राजभक्तों से तुम्हारी जान छुड गयी वे मित्र क्या जो वैचारिक मतभेद तक न स्वीकार कर सकें !

कट्टर समर्थन अथवा नफरत दोनों ही इन भक्तों में आम है , लगता है सड़क पर चलते वक्त, खाते पीते , परिवार में बैठे हो अथवा बाहर, इन्होने राजनैतिक आकाओं का नाम,अपनी पीठ पर गुदवा लिया है , वे किसी पार्टी के हो सकते हैं मगर उनकी अपनी व्यक्तिगत पहचान नष्ट हो चुकी है अतः वे चाहे कुछ भी हों पर वे संवेदनशील मित्र नहीं हो सकते !

राजनैतिक पार्टियों के इन झंडाबरदारों को यह खूब पता है कि राजनीति में नोट कैसे कमाए जाते हैं और सारे नेताओं का उद्देश्य, राजनीति में आने का क्या है ? करोड़ों रूपये दाव पर लगा, सौ गुना बापस , आने का इंतज़ार करते इन चमचों को, अपना हिस्सा मिलने की पूरी उम्मीद है ! अतः देश भक्ति , वीररस, धर्म और शहीदों के गीत गाते इन देश भक्तों ने कमर कस , अपने उस्तादों के लिए, जिताने हेतु जिहाद का आवाहन कर रखा है !

मूरख जनता खूब लुटी है, पाखंडी सरदारों से !
देश को बदला लेना होगा, इन देसी गद्दारों से !

पूंछ हिलाकर चलने वाले,सबसे पहले भागेंगे !
सावधान ही रहना होगा, इन झंडेबरदारों से !

Saturday, March 29, 2014

कुछ भाभी ने हंसकर बोला, कुछ कह दिया इशारों ने -सतीश सक्सेना

कैसे प्यार घटा,पापा की 
बिटिया, का दरवाजे से 
कैसे प्यार छिना गुड़िया   
का, भारी गाजे बाजे से 
जब से विदा हुई है घर से,क्या कुछ  बहा,हवाओं में !
कुछ तो दुनियां ने समझाया, कुछ अम्मा की बांहों ने !

किसने सीमाएं समझायी 
किसने गुड़िया छीनी थी !
किसने उसकी उम्र बतायी 
किसने तकिया छीनी थी !
कहाँ गए अधिकार पुराने,क्या सुन लिया दिशाओं में ! 
कुछ तो बहिनों ने बतलाया,कुछ कह दिया हवाओं ने !

कहाँ गया भाई से लड़ना

अपने उन , सम्मानों को  !
कहाँ गया अम्मा से भिड़ना 
अपने उन अधिकारों को !
कुछ तो डर ने समझाया था,कुछ पढ़ लिया रिवाजों में  !
कुछ भाभी ने हंसकर बोला, कुछ कह दिया इशारों ने !

पापा की जेबें, न जाने 
कब से राह, देखती हैं !
कौन तलाशी लेगा आके
किसकी चाह देखती हैं !
कुछ दूरी पर रहे लाड़ली, सुखद गांव की छावों में !
कुछ गुलमोहर ने समझाया,कुछ घर के सन्नाटों ने !

कैसे  बड़ी हो गयी मैना
कैसे उड़ना सीख लिया !
कैसे  ढूंढें, तिनके घर के ,
कैसे  जीना सीख लिया !
खेल, खिलौने खोये अपने,इन ससुराल की राहों में !  
कुछ समझाया,सबने रोकर,कुछ बाबुल की बाँहों ने !  

Friday, March 28, 2014

किसी के घर की लाड़ली, घर ले आये हो -सतीश सक्सेना

क्यों न रवैये , हम ऐसे अख्तियार करें !
बेटी से ज्यादा, दामाद को प्यार करे !

राजनीति ने, धर्म का झंडा उठा लिया !  

बस्ती के बच्चों को भी, हुशियार करें !

किसी के घर की लाड़ली,घर ले आये हो 
इस बन्दर से अधिक,उसी को प्यार करें !

काले बादल  , चारो तरफ से आये हैं !
इनका प्यार झेलने , छत तैयार करें !

वह भी तुमको पलकों पर ही रखती है 
अम्मा जैसा ही, उन को भी प्यार करें !



Monday, March 24, 2014

आज यह कैसे खून की बूंदे, टपक रहीं शाखाओं से -सतीश सक्सेना

धर्म और राजनीति के बेतुके मेल की, यह जहरीली शाखाएं, इस देश को बरसों पीछे ले जाएंगी ! किसी भी देश में धार्मिक कट्टरता , अगर राजनीति के साथ खड़ी हो गयी तो इस शताब्दी में उस देश का रसातल में जाना तय है ! धन के लालच में उगीं यह दाढ़ियाँ, उस देश की उन्नति को बर्वाद करने में सक्षम हैं !

कैसे जड़ से नफरत करके,प्यार करें शाखाओं से !

द्वेष देखकर,जीवन रोये,विष छलके शाखाओं से !

धर्म कर्म के छंद सिखायें,ऋषियों की आवाजों में    
दिखने में तो कल्पवृक्ष,पर आग झरे शाखाओं से !

कितने भ्रम फैलाते आकर,अपनी बात बताने में !
चन्दा तारों से भय लगता,बातें सुन शाखाओं से !

काहे इतना जहर घोलते, अपने घर के आँगन में ! 
सोये बच्चे ही  भुगतेंगे , जहर गिरे शाखाओं से !

पैदा हुए तो सच्चे  थे,पर धर्म सिखाया दुनियां ने,
आज यह कैसे खून की बूँदें,टपक रहीं शाखाओं से !

Friday, March 21, 2014

रिटायरमेंट का वर्ष और अपने ही घर में वृद्ध शेरों की दुर्दशा - सतीश सक्सेना

लगता है ३० वर्ष में ही, ६० वर्ष पूरे होने का घंटा बजा दिया कि अब स्कूल बंद हो गया, आज के बाद अब यहाँ नहीं आना, फीस आदि का रिफंड के लिए चेक घर भेज दिया जाएगा ! :)

रिटायरमेंट के वर्ष में, पहला तनाव यह होता है कि फंड, ग्रेचुटी के पैसे बच्चों और बच्चों की अम्मा द्वारा झपटने से  कैसे बचाये जाएँ जिनपर इन लोगों की नज़र, पिछले सालों से टिकी है ! परिवार में बहुमत एवं असर माँ बेटे का है जो इस विषय में एकमत हैं ! मैंने रिटायरमेंट के साल अक्सर अपने साथियों को अप्रत्याशित तनाव में पाया है और वह भी अपने ही परिवार से, जिसके लिए बरसों से अपने मित्रों में, तारीफे करते नहीं अघाते थे, वे  अब यह कैसे बताएं  कि परिवार के तमाम जरूरतें, उनके रिटायर होने का इंतज़ार कर रहीं हैं !

रिटायरमेंट के समय इंसान अक्सर शेष बचे हुए, १५-२० वर्षों की सिक्यूरिटी के लिए बेहद तनाव में पाता है ! पूरे जीवन अपने परिवार के लिए, जी तोड़ मेहनत कर पालने वाले इन वृद्ध शेरों, को अपने घरों में ही उपेक्षा और हिकारत का शिकार होना पड़ता है , उन्हें यह अहसास कराया जाता है कि वे लालची हैं व उन्हें अपने बच्चों की आवश्यकताओं का ध्यान नहीं है ! 

घायल शेरनी, जो बरसों से अपने पति की बड़बड़ और अकड़ से परेशान रही है उसे यही मौक़ा सही मिलता है , बुड्ढे के कमजोर दिनों में ,सामर्थ्यवान पुत्र का साथ देकर,काफी संतोष का अनुभव करती है और वह पहले से ही टूटी कमर और असहाय अकेले व्यक्ति पर, जोरदार हमला करने का कोई मौका नहीं चूकती ! उसकी पूरी कोशिश यह रहती है कि इस बुड्ढे सरदार की, सिक्यूरिटी छीन कर, परिवार पर आश्रित कर दिया जाए इससे इसकी अकड़ भी सुधर जायेगी तथा बच्चों को पैसे भी मिल जायेंगे और फिर बेटे का दिल करे तो ठीक नहीं तो इस मरे और सड़े से इंसान का क्या करना ! :)

अफ़सोस यह है कि अक्सर पुत्र भी अपने पिता को सहयोग नहीं करते उन्हें अपनी जवानी में ही , पिता के पूरे जीवन के बचाये २०-३० लाख रूपये, उनके सपने पूरे करने, घर खरीदने अथवा कार खरीदने को मिल जाएँ, इससे अच्छा आसान साधन और कुछ नज़र नहीं आता !

इस वर्ष मैं भी रिटायर हो रहा हूँ , सामर्थ्यवान एवं पर्याप्त शक्तिशाली बच्चों के कारण मेरे जैसे भाग्यवान लोग इस दुनिया में बहुत कम ही होंगे मगर जब अपने मित्रों को देखता हूँ तो दिल दहल जाता है !  कल ऑफिस में अपने दो हमउम्र मित्रों से बात करते समय , मैंने यह फैसला किया कि इन सर्वगुण संपन्न एवं अनुभवी रिटायर शेरों को संगठित करूंगा एवं इस शक्ति का उपयोग आपस में एक दूसरे की मदद देकर करेंगे ! यह कार्य करने के लिए  "dignified lion's club" की स्थापना का संकल्प करता हूँ !

विवेक जी  से कवि दिवस पर हुई चर्चा में , उन्होंने एक बेहतरीन आयडिया, जिस पर वह काम कर रहे हैं, के बारे  बताया था कि हर शहर में वृद्धों का एक डाटा बेस तैयार किया जाएगा जिनमें उनकी आवश्यकताएं एवं सहायता देने  हेतु, उन्हीं शहरों में रहने वाले स्वयंसेवक स्वेच्छिक रूप से आगे आयेंगे  ! मेरी अपनी इच्छा, इस कार्य के लिए, ह्रदय से लगने की है जिसे अब ३० वर्ष (६० ) उम्र में मैं शुरू करना चाहता हूँ ! :) 
यहाँ मददगारों की कमीं नहीं है सिर्फ नेतृत्व चाहिए, भीड़ की भीड़ उठ खडी होगी मदद करने के लिए !!

सहायकों की कमीं नहीं है, साथ हज़ारों आयेंगे !
इन बूढ़ों की मदद के लिए हाथ हज़ारों आयेंगे !

Wednesday, March 19, 2014

माँ को अक्सर मैंने घर के, कपडे धोते ही देखा है -सतीश सक्सेना

बेटा, मैंने इस जीवन में 
ऐसा इक इंसान न देखा !
जीवन के झंझावातों में 
जिसने कोई कष्ट न देखा !
वैभव सम्पन्नों का जीवन  बीमारी से लड़ते बीता ,
धनकुबेर जितने पाये थे , उनको रोते ही देखा है !

अपने अपने सुख दुःख लेकर
हम सब दुनिया में आये हैं ,
अपनी आदत व्यवहारों से 
इस दुनियां को भरमाये हैं ,
जो बखान करते हैं अपने, बड़ी शान से बाते करते ,
उनकी माँ को अक्सर मैंने , कपडे धोते ही देखा है !

शुभचिंतक से, लगते सारे 
चेहरों पै विश्वास न करना
गुरु मन्त्र पा, उस्तादों  से   
ऐसे भी उपवास न करना
भक्तों को रोमांचित करके,रहे नाचते रंगमंच पर ,  
श्रीवर,संत, साध्वी हमने , मूर्ख बनाते ही देखा है !

पूरा जीवन बीते इनका 
अपनी तारीफें करवाने 
बैठे जहाँ , वहीँ गायेंगे 
अपने सम्मानों के गाने 
ऊपर पहलवान से लगते,बार बार पिटते बस्ती में !
पगड़ी बांधे इन पुतलों को,घर में लुटते ही देखा है ! 

जीवन भर चेहरे दो रखते 
समय देख कर रंग बदलते
सड़ा हुआ सा जीवन लेकर  
औरों पर ये, छींटे  कसते ! 
रोज दिखायी देते ऐसे रावण मन,रामायण पढ़ते, 
श्वेतवसन शुक्राचार्यों को , मंदिर में बैठे देखा है !

Monday, March 17, 2014

अब तो ऐसे लोग भी होते नहीं -सतीश सक्सेना

कौन कहता है कि वे रोते नहीं 
वे कभी तेरे बिना , सोते नहीं !

जाइये माँ को नज़र भर देखिये 
कौन कहता है , खुदा होते नहीं !

कौन आशीषों को, लेने आयेगा
घर में ये दस्तूर,अब होते नहीं !

अभी तक, कैसे समझ पाये नहीं ! 
अपनों  के धोखे से, यूँ रोते नहीं !

कौन जाने ,कब हुए थे, वे यहाँ !    
अब तो ऐसे लोग भी होते नहीं !

कुछ रहीं थीं ऎसी जिम्मेदारियां
अन्यथा रिश्ते को हम ढोते नहीं !

क्या पता था,दर पे मेरे आओगे 
वरना होली रंग हम धोते नहीं !

Saturday, March 15, 2014

कैसे कैसे लोग यहाँ, इंसान बताये जाते हैं -सतीश सक्सेना

माथे लंबा तिलक लगाये  
रूप धुरंधर बना लिया !
एक हाथ में रामायण 
दूसरे में डंडा उठा लिया !
अलख जगाएं हर द्वारे , कुलवान बताये जाते हैं !
राजनीति में हैं जब से , गुणवान बताये जाते  हैं !

देश भक्ति के गाने गाके 
सारे जग को मूर्ख बनाके  
मोटे पेट को भरते जाके  
धर्म,देश गुणगान सुनाके 
सेवा कर मेवा खाओ , गुरुमंत्र बताये जाते हैं ! 
लिए तमंचा चाकू, ये हनुमान बताये जाते हैं !

नैतिक सामाजिक मूल्यों 
में बड़ी बनावट आयी है, 
राजाओं के आचरणों में 
बड़ी गिरावट आयी है  ! 
चोर, उचक्के , राजा के , दीवान बताये जाते हैं !
करें दलाली फिर भी, पालनहार बताये जाते हैं !

कीर्तन करते महाबली का 
चरण पकड़ते, बड़े गुरु का
नोट करोड़ों पड़ें दिखायी 
इंतज़ार है बस चुनाव का 
सारे शहर में भोंपू से , कुलवान  बताये जाते हैं !
धन के बल पर बस्ती में,बलवान बताये जाते हैं !

राजनीति से धन खींचे ये 
जीवन में ,क्या  पाएंगे !
अपने घर के शिशुओं को 
ये पार्टी भजन, सुनाएंगे !
हैवानों की महफ़िल में , इंसान  बताये जाते हैं ! 
गली गली तस्वीर लगा,भगवान् बताये जाते हैं !

घर के बूढ़े मार लालची 
अश्वमेध को निकले हैं !
और पुलिंदे हत्यारों  के 
शोधपत्र में , निकले हैं !
हाथ खून से रंगे , देश की आन बताये जाते हैं !
चोर उचक्के शंकर का, वरदान बताये जाते हैं !

लगता हिन्दू धर्म इन्हीं 
के बल पर चलता आया है ! 
इन्ही के बल पर लगता  
जैसे देश सुरक्षित पाया है !
लम्बा चोगा पहनाकर,अफगान बताये जाते हैं ! 
चिथड़े हैं, पर कपडे का ,ये थान बताये जाते हैं !

चुनाव धुलाई मशीन : आभार काजल कुमार 


Thursday, March 13, 2014

सोने जैसे दिल वाले ही कविता सुनने आयेंगे -सतीश सक्सेना


बेतुल में विवेक जी के आवाहन पर , पहली बार कविमंच पर गया था एवं यह जानकार अभिभूत था कि विवेक जी को यह भरोसा था कि कवि और कविता समाज को बदलने की सामर्थ्य रखती है अतः आवश्यकता है कि कवि की मर्यादा को वह सम्मान दिया जाए जिसके वह योग्य है ! 
इस रचना के प्रेरणा श्रोत विवेक जी हैं अतः यह रचना उनकी  विचारधारा आनंद ही आनंद को समर्पित है …. 

निर्मल मन को रखने वाले, कविता सुनने आयेगे !
आस्था,श्रद्धा,धैर्य हमेशा, कवि से मिलने आयेंगे !

निर्मम,अज्ञानी,धनलोलुप लोग यहाँ क्यों आयेंगे !
 
केवल बुद्धि, प्रतिष्ठा वाले , कविता सुननें आयेंगे !

सरस्वती का ऋण लेकर,कवि गीतदान दे जायेंगे !
सम्मोहक,शालीन,अलंकृत,करुणा सुनने आयेंगे !

भुला व्यथा,प्रतिबंध,समय को संवेदना सिखायेंगे !
गीतों के माध्यम,मानव की,क्षमता सुनने आयेंगे !

तेजस्वी मानव को, कवि ही , मर्यादा समझायेंगे !
जीवन को अनुकूल बना,व्यवधान तोड़ने आयेंगे !


बहुत शीघ्र कविमंच देश में, खोया गौरव पायेंगे !
मधुर ह्रदय कुछ राहत पाने,गीत खोजने आयेंगे !
  

Tuesday, March 11, 2014

कवि दिवस ( ९ मार्च ) और विवेक जी के संकल्प - सतीश सक्सेना

बेतुल में कविदिवस 
मैं ८० के दशक से कवितायें लिख रहा हूँ मगर आज तक उन्हें किसी मंच , कवि गोष्ठी अथवा मित्रों के समूह में कभी नहीं सुनाया ! १९७७ से ट्रेड यूनियन मूवमेंट लीडर शिप में रहा हूँ तथा मंच से सैकड़ों बार भीड़ में, भाषण देने के कारण, पब्लिक सम्बोधन में कभी कोई झिझक नहीं रही ! मेरे लिए यह एक सामान्य बात कहने की, प्रक्रिया भर है फिर भी मैं आत्म प्रचार से चिढ़ता रहा हूँ , परिणाम स्वरुप मेरे साथ बरसों काम करने वाले मित्र भी यह नहीं जानते कि मैं कविता लेखन करता हूँ ! ब्लॉग जगत में मेरे आने का कारण, यश अर्जन न होकर मेरी कविताओं और लेखों को एक जगह कलमबद्ध करना मात्र रहा है ताकि भविष्य में, समाज के लिए उपयोगी मानी जाएँ तो वे लोगों के काम आ जाएँ !

मगर जब विवेक जी के विचारों के लिए बने संगठन, आनंद ही आनंद, के मध्य भारत के संयोजक विश्वास जी ने जब मुझे बेतुल आने का निमंत्रण दिया तो मैं प्रारम्भिक झिझक के बाद भी, मना नहीं कर सका , आश्चर्य हुआ
महात्मा विवेक जी 
कि वे मेरी अधिकाँश कवितायें पहले ही ब्लॉग के माध्यम से पढ़ चुके थे ! सामजिक पृष्ठभूमि पर लिखी कविताओं के कारण ही, वे तथा आनंद ही आनंद से जुड़े लोग, मुझसे परिचित थे ! बेतुल के कविसम्मेलन में मुझे प्रभावशाली  कवि मदन मोहन समर,मनवीर मधुर,ज्योति खरे,संतोष त्रिवेदी,शरद जैसवाल ,दीपक अग्रवाल, शुभम शर्मा के साथ मंच पर बैठने का मान मिला ! 

बहुत कम लोग जानते होंगे, स्वयं प्रचार के अभाव में, साधारण से दिखने वाले इस युवक ( विवेक जी ) ने, अपनी उच्च शिक्षा एवं अन्तराष्ट्रीय जीविका को त्याग कर , इस देश की संस्कृति पुनरुत्थान का , जो संकल्प लिया है , वह अद्वितीय है ! त्याग की इस अनुपम मिसाल युक्त आकर्षक व्यक्तित्व की वाणी जब जब मैंने सुनी तब तब उस सौम्य व् मीठी वाणी  में मुझे विवेक जी नहीं साक्षात विवेकानंद सुनाई पड़ रहे थे ! आकर्षक एवं मोहक व्यक्तित्व के मालिक विवेक से जब मैंने उनके विवाह के बारे में जानना चाहा तो उनका कहना था कि विवाह तो हो चुका इन संकल्पों से ! 


कवियों और कविता के प्रति उनकी आस्था और विश्वास है कि बरसों से सुप्त पड़ी कविता भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान में एक नयी रोशनी ला सकती है सो कवियों को जगाना होगा एवं इस कार्य का आगाज़ पूरे देश में पहली बार कवि दिवस ( ९ मार्च ) की उद्घोषणा करते हुए किया है ! भविष्य में विवेक जी की योजना इन कवि सम्मेलनों को देश के अन्य हिस्सों तथा विदेशों में ले जाने की है !

उनके द्वारा किया गए कार्यों में से, मुझे सबसे अधिक आकर्षित, वृद्ध सहायता कार्यक्रम ने किया है जिसमें वे देश में वृद्धों के लिए एक डाटा बैंक बनवा रहे हैं तथा उन लोगों की मदद के लिए एक लोकल सर्कल होगा जो हर क्षण वृद्धों की सहायता में  तत्पर रहेगा !

परिवार , एवं समस्त भौतिक सुखों का त्याग इतनी कम उम्र में आसान नहीं होता ! इस अशिक्षित देश में, एक नयी अध्यात्मिक सांस्कृतिक लौ प्रज्ज्वलन का प्रयत्न करते, इस महात्मा का मैं अभिवादन करता हूँ !

Wednesday, March 5, 2014

आज रात भी साथ बैठकर,कितनी देर स्वप्न देखे थे -सतीश सक्सेना

बरसों बीते, बिछुड़े तुमसे 
जाने कब से देख न पाया 
बार बार जाकर बस्ती में  
भी दरवाजे पंहुच न पाया
लेकिन फिर भी हार गए तुम,ओ समाज के ठेकेदारो !
आज रात भी साथ बैठकर,मनकों की माला पोए थे !

कौन छीन पायेगा हमसे
सपने जो मन में रहते हैं ! 
कौन रोक पायेगा आंसू  
जो हँसने, में भी बहते हैं !
तुम समझे थे हमें दूर कर, ये अनुराग ख़त्म कर दोगे !
लेकिन कितनी बार रात में, दोनों पास पास सोये थे !

दुनियां वाले हंस कर कहते 
दीवानों को अलग कर दिया
सारी शक्ति लगाकर अपनी
अरमानों  को दूर कर दिया ! 
जलने वालों की नज़रों में,उजड़ी आंगन की फुलवारी ! 
मगर उसी दिन हम दोनों ने, वादे साथ साथ बोये थे !

उस दिन मेले में देखा था ,
आँखों आँखों बात हो गयी !
विरहव्यथा का वर्णन करते  
मन में ही बरसात हो गयी !
जब भी चाहें तब मिलते हैं,क्या कर लेंगे बस्ती वाले !
दुनिया भर की, ऊँच नीच के कपडे , आंसू से धोये थे !

मनमयूर के साथ हर समय 
रहने वाले  को क्या जानो !
अंतर्मन मंदिर की भाषा ,  
सप्तपदों को क्या पहचानों !
प्यार की भाषा सीख न पाये कैसे हम तुमको समझाएं !
पता नहीं कितने युग बीते, प्यार की दुनियां में खोये थे !

कैसे छीनोगे तुम हमसे
जो मेरे मन में रहती है !
कैसे छीनोगे वे यादें जो 
जन्मों से लिखी हुईं हैं  !
मरते दम तक साथ न छोड़ें,जो मन में आये कर लेना !
इतने गहरे कष्ट यादकर,फफक फफक कर हम रोये थे !

Friday, February 28, 2014

वे आवारा क्या समझेंगे ! -सतीश सक्सेना

जिनको माँ घर में बोझ लगे, वे नाकारा क्या समझेंगे !
पशुओं कि तरह मारे फिरते, वे आवारा क्या समझेंगे !


कुछ जीव हमेशा बस्ती में , कीचड़ में ही रहते  आये !
जल गन्दा कर पीने वाले , वे जलधारा क्या समझेंगे !

वृद्धों को भरी बीमारी में, असहाय अकेले छोड़ दिया,
सर झुका नहीं माँ के आगे, ठाकुरद्वारा क्या समझेंगे !

धन के पीछे भागते फिरें , वे ममता में क्या पाएंगे ?
माँ के धन  से भण्डार भरे, वे भंडारा क्या समझेंगे !

ये क्रूर ह्रदय , ऐसे ही हैं , हंसों के संग , न रह पाये !
अपने ही बसेरे, भूल गए , वे  गुरुद्वारा क्या समझेंगे !


Wednesday, February 26, 2014

प्राणायाम - सतीश सक्सेना

हाँ जिज्जी ( मेरी बेटी  ),  क्या कर रही है ?
पप्पा ! वाशरूम से बाहर निकला हूँ !
कितने गिलास पानी पिया  ?
३ गिलास आधा घंटे पहले पी चुकी हूँ , पापा मैं इससे अधिक नहीं पी सकती लगता है वोमिटिंग हो जायेगी , और ऑफिस भी जाना है !
ओके , अब क्या करना है ?
घर की बालकनी में बैठकर प्राणायाम करना है , जैसे अपने बताया है ..
वह तो क्रिया थी जो बतायी थी अब ध्यान से जो मैं कह रहा हूँ वह सुनों .... 
प्राणायाम का अर्थ प्राण ( सांस ) पर नियंत्रण होता है ! शरीर में अगर सांस नहीं तो कुछ नहीं बेटा  , गहरी सांस लेकर अपने फेफड़ों को पूरा फुलाना है , और निकालना है !पता है फेफड़ों को जब सांस से भर रही तो तो क्या होता है ?
 

-शुद्ध ऑक्सीजन जीवन का आधार है, ब्लड वैसेल ( रक्त वहितकाओं ) के जरिये यह हमारे शरीर के हर अंग को जीवित रखने में मददगार है ! शुद्ध ऑक्सीजन हवा के साथ हमारे फेफड़ों में जाकर, रक्त में मिलकर उसे शुद्ध और हल्का बनाती है और यही रक्त शरीर के दूर दूर तक के अंगों को फुर्तीला और मज़बूत बनाता है !  

-शुद्ध ऑक्सीजन अंदर फेफड़ों में भर कर उन्हें फुला रही है , उससे फेफड़ों के बंद चेम्बर जो इस व्यायाम को न करने के कारण बंद हो गए थे, वे खुलेंगे और अधिक शक्तिशाली बन पाएंगे !

सांस बाहर छोड़ते समय विचार करो कि शुद्ध ऑक्सीजन अंदर खींचकर फेफड़ों के बंद चेंबर खोल रही हो उस समय सीना बाहर आएगा क्योंकि फेफड़े फूल हुए हैं कुछ देर सांस रोक कर रखो और पेट के ढीले ढाले हिस्से को अंदर खिंच कर पीठ से मिलाने का प्रयास करो !  प्राणायाम की इस क्रिया से फेफड़े और पेट के अन्य अवयवों जैसे किडनी , लीवर आदि का व्यायाम भी हो रहा है !
- जैसे जैसे हमारी बॉडी ऑक्सीजन का उपयोग करेगी उसमें से वेस्ट प्रोडक्ट के रूप में कार्बन डाई ऑक्साइड का निर्माण होगा जिसे हमारा शरीर सांस के जरिये बाहर निकाल देगा !
-सुबह की स्वच्छ हवा में मिली ऑक्सीजन का भरपूर सदुपयोग, पूरा जीवन ,निरोग रखने में सहायक होगा !  

-इंसान को जीने के लिए हवा, पानी और भोजन आवश्यक है !  
-शरीर को मोटापा रहित बनाने के लिए १२ - १५ गिलास जल रोज पीना होगा !
-सुबह वृक्ष के नीचे बैठकर आधा घंटे प्राणायाम करना होगा ! 
-हज़ारो साल पहले जंगलों में रहते इंसान के पास प्राकृतिक तौर पर भोजन के लिए पत्तियां और फल उपलब्ध थे ! सो हमेशा खूब सारी पत्तियां और अपने आप टूट कर गिरे पके फल ही हमारा भोजन होना चाहिए !
ध्यान रहे समोसा , परांठा , पकौड़े, गुलाबजामुन , जलेबी जंगलों में नहीं उगते थे यह हमने कंक्रीट के जंगलों में खुद बनाये थे सो इन्हें खाना छोड़ना है ! 
-चीनी और चीनी कि कोई भी बनायी गयी  मिठाई जैसे खीर ,सिवइयां और तली हुई भोजन सामग्री शरीर में सबसे हानिप्रद है इसका उपयोग किसी भी रूप में बंद करना होगा !
आशा है आज का यह सबक मेरे बच्चे याद रखेंगे  ! 
स्वस्थ और हँसते लम्बे जीवन की कामनाओं के साथ !
पापा  
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