Wednesday, January 21, 2015

शुभी -सतीश सक्सेना

                       यह बाल कविता मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण है अपने परिवार में , 24 -25 वर्ष पहले, अपने बड़ों को यह सबूत देने को कि मुझे वाकई कविता लिखनी आती है ,सामने खेलती हुई, नन्ही शुभी (कृति )को देख , उसके बचपन का चित्र खींचा था !!   

छोटी हैं, शैतान बड़ी हैं, सबक सिखाएं प्यार का ! 
हाल न जाने क्यों होना है,शुभी की ससुराल का !

दिखने में तो छोटी हैं ,
लेकिन बड़ी सयानी हैं ! 
कद काठी में भारी भरकम
माँ , की राज दुलारी हैं !
नखरे राजकुमारी जैसे 
इनकी मस्ती के क्या कहने 
एक पैर पापा के घर में 
एक पैर ननिहाल है !
दोनों परिवारों में यह,अधिकार जमाये प्यार का !
हाल न जाने क्यों होना है, शुभी की ससुराल का !

चुगली करने में माहिर हैं 

झगडा  करना ठीक नहीं 
जब चाहें शिल्पी अन्नू को
पापा  से पिटवाती हैं  !
सेहत अपनी माँ जैसी है 
भारी भरकम बिल्ली जैसी 
जहाँ पै देखें दूध मलाई 
लार  वहीँ टपकाती हैं 
सुबह को हलवा,शाम को अंडा,रात को पीना दूध का !
हाल न जाने क्यों होना है , शुभी की ससुराल का  !

सारे हलवाई पहचाने 

मोटा गाहक इनको माने 
एक राज की बात बताऊँ 
इस सेहत का राज सुनाऊं 
सुबह शाम रबड़ी रसगुल्ला 
ढाई किलो दूध का पीना 
रबड़ी और मलाई ऊपर 
देसी  घी पी  जाती हैं !
नानी दुबली होती  जातीं ,  देख के खर्चा दूध का  !
हाल न जाने क्यों होना है , शुभी की ससुराल का !

आस पास के मामा नाना 

इनको गोद खिलाने आयें
बाते सुनने इनकी अक्सर  
अपने घर बुलवायीं जाए  
तभी भी शुभी प्यारी हैं 
सबकी राज दुलारी हैं !
मीठी मीठी बाते कहकर 
सबका मन बहलाती हैं !
खुशियों का अहसास दिलाये,किस्सा राजकुमारी का ! 
हाल न जाने क्या होना है , शुभी  की ससुराल  का  ! 

Thursday, January 15, 2015

साधू सबक सिखाने निकले, यही बड़ी हैरानी है - सतीश सक्सेना

बाबाओं के पास न जाए, अपनी गाय बचानी है ! 
कैसे नोट कमायें ध्यानी, विस्तृत बुद्धि बनानी है !

पिछली पीढी को समझाने,कौन समय बर्वाद करे,
नन्हों को अनुराग सिखाने कवि ने कलम उठानी है !

कमी नहीं रिश्ते नातों में, केवल नज़रें बदली  हैं ,
पापा की तो ससुरी लगती,मगर वो मेरी नानी है !

सुख,दुःख सिक्के के पहलू हैं,दोनों संग निभाएंगे
जिएंगे भोगेंगे तब तक ही,जब तक दाना पानी है !

धर्म के झंडे लिए घूमते, झाग निकलते ओंठों से,
साधू सबक सिखाने निकले, यही बड़ी हैरानी है !

Monday, January 5, 2015

संदिग्ध नज़र,जाने कैसे ,माधुर्य सहज भाषाओं का - सतीश सक्सेना

कैसे करते आसानी से अनुवाद गीत , भाषाओँ का !
संवेदनशील भावना से, संवाद विषम भाषाओँ का !

झन्नाटेदार शब्द निकलें,जब झाग निकलते होंठों से,
ये शब्द वेदना क्या जानें, अरमान क्रूर भाषाओं का !

सावन का अंधा क्या जानें , जीवन स्नेहिल रंगों को      
संदिग्ध नज़र,जाने कैसे,माधुर्य सहज भाषाओं का !

अपने जैसा ही समझा है सारी दुनियां को कुटिलों ने    
ये शब्द समर्पण न जानें,अभिमान हठी भाषाओं का !

आस्था, श्रद्धा, विश्वास कहाँ, उम्मीद लगाकर बैठे हैं,
भावनाशून्य कैसे समझें,विश्वास सरल भाषाओं का !

Monday, December 29, 2014

हिन्दु मुसलमानों से , अंशदान चाहिए - सतीश सक्सेना

समस्त राजनीति, स्व 
समृद्धि हेतु बिक चुकी 
समस्त बुद्धि देश की 
दिवालिया सी हो चुकी
हिन्दु  मुसलमानों से , अंशदान  चाहिए !
शुद्ध, सत्यनिष्ठ, मुक्त  आसमान चाहिए !

चाटुकार भांड यहाँ 
राष्ट्र भक्त बन गए !
देश के दलाल सब 
खैरख्वाह बन गए !
चोर बेईमान सब, ध्वजा उठा के चल पड़े !
तालिबानी  देश में , कबीर  ज्ञान चाहिए !

अकर्मण्य बस्तियां 
शराब के प्रभाव में !
खनखनातीं थैलियां 
चुनाव के प्रवाह में ! 
बस्तियों के जोश में,उमंग नयी आ गयी !
मानसिक अपंग देश, बोध ज्ञान चाहिए !

निस्सहाय, दीन और 
निरक्षरों में रंज क्या ?
राजकाज कौन करे , 
इससे सरोकार क्या ?
तालियां बजायेंगे, जहाँपनाह जो कहें !
सौ करोड़ भीड़ को,रथी महान चाहिए !

धूर्तमान के लिए 
अभूतपूर्व साथ है !
धन अभाव के लिए  
महा कुबेर साथ हैं ! 
महान देश के लिए,महारथी तो मिल गया !
जाहिलों को, देव भी , दैदीप्यमान चाहिए !

यही समय दुरुस्त है 
निरक्षरों को लूट लें !
विदेशियों से छीन के 
ये राज्यभक्त लूट लें !
दाढ़ियों को मंत्रमुग्ध , मूर्ख तंत्र, सुन रहा !
समग्र मूर्ख शक्ति को, विचारवान चाहिए !


चेतना कहाँ से आये 
जातियों के, देश में 
बुरी तरह से बंट  चुके 
विभाजितों के देश में 
प्यार की जगह जमीं पै नफरतों को  पालते !
गधों के इस समाज में , विवेकवान चाहिए !

धर्मोन्मत्त देश में , 
असभ्य एक चाहिए 
असाधुओं से न डरे 
अशिष्ट एक चाहिए
सड़ी गली परम्परा में ,अग्निदान चाहिए !
अपाहिजों के देश में, कोचवान चाहिये !

Wednesday, December 24, 2014

सनम सुलाने तुम्हें, हमारे गीत ढूंढते आएंगे - सतीश सक्सेना

आदरणीय ध्रुव गुप्त की दो पंक्तियाँ इस रचना के लिए प्रेरणा बनी हैं , उनको प्रणाम करते हुए ……  

यदि रूठोगे कहीं, तुम्हें हम रोज मनाने आएंगे
चाहा सिर्फ तुम्हीं को हमने,रोज बताने आएंगे !

इतने से ही दर्द में कैसे , आँखों में आंसू आये !
तुम्हें रोकने अभी राह में, और ठिकाने आएंगे !

याद न करना मुझको,वरना हौले हौले रातों के 
अनचाहे सपनों में,अक्सर खूब सताने आएंगे !

सुना, चाँदनी रातों में तुम भूखे ही सो जाते हो
लिए पुरानी यादें तुमको संग खिलाने आयेंगे !

कैसे निंदिया खो बैठे हो, यादों के उजियारे में  
सनम सुलाने तुम्हें, हमारे गीत ढूंढते आएंगे !

ऐसे कैसे तड़प उठे हो,इतनी सी तकलीफों में
अभी तो रोने के कितने ही और बहाने आयेंगे !

कैसे जीतें,जलने वाले,दिल में पंहुच न पायेंगे, 
जितना काटो बांस, नए हो हरे सामने आएंगे !

Tuesday, December 23, 2014

बातें, सबक सिखाने की - सतीश सक्सेना

ऐंठ छोड़िये, बातें करिये, जीने और जिलाने की ! 
अंतिम वक्त भुलाये बैठे,बातें सबक सिखाने की !

चंदा, सूरज,तारे हम पर , नज़र लगाए रहते हैं !
कैसे जान खैरियत पायें,साकी औ मयखाने की !

रोज सुबह तौबा कर लेते अब न हाथ लगाएंगे 
और शाम को बातें करते पीने और पिलाने की !

रंज भुलाकर साथ बैठकर,हँसते,खाते, पीते हैं !
यहाँ न ऐसी बातें होती , रोने और रुलाने की ! 

इश्क़,बेरुखी,रोने धोने , से भी कुछ आगे आयें  
कर न पायीं बातें ग़ज़लें , हंसने और हंसाने की !

Thursday, December 18, 2014

इस्लाम की छाती पे , ये निशान रहेंगे - सतीश सक्सेना

कातिल मनाएं जश्न,भले अपनी जीत का 
इस्लाम  की छाती पे , ये निशान  रहेंगे !

इस्लाम के बच्चों का खून,उनकी जमीं पर 
रिश्तों की बुनावट पे,  हम आघात  कहेंगे !

दुनियां का धरम पर से ,भरोसा चला गया  !
इन दुधमुंहों  के रक्त  को , हम याद रखेंगे !

महसूद, ओसामा  के नाम,अमिट हो गए 
ये ज़ुल्म ऐ तालिबान , लोग याद  रखेंगे  !

जब भी निशान ऐ खून, तुम्हे याद आयेंगे
इंसानियत  के अश्क़ भी  सोने नहीं  देंगे ! 

Sunday, December 7, 2014

तुम मुझे क्या दोगे - सतीश सक्सेना

समय प्रदूषित लेकर आये , क्या दोगे ?
कालचक्र विकराल,तुम मुझे क्या दोगे ?

दैत्य , शेर , सम्राट   
ऐंठ कर , चले गए !
शक्तिपुरुष बलवान
गर्व कर  चले गए ! 
मैं हूँ प्रकृति प्रवाह, तुम मुझे क्या दोगे ?  
हँसता काल विशाल,तुम मुझे क्या दोगे ?

मैं था ललित प्रवाह 
स्वच्छ जल गंगे का 
भागीरथ के समय 
बही, शिव गंगे का !
किया प्रदूषित स्वयं,वायु, जल, वृक्षों को ?
कालिदास संतान ! तुम मुझे  क्या  दोगे ?

अपनी तुच्छ ताकतों 
का अभिमान लिए !
प्रकृति साधनों का 
समग्र अपमान किये  
करते खुद विध्वंस, प्रकृति संसाधन के !
धूर्त मानसिक ज्ञान,तुम मुझे क्या दोगे !

विस्तृत बुरे प्रयोग 
ज्ञान संसाधन  के  !
शिथिल मानवी अंग
बिना उपयोगों  के !
खंडित वातावरण, प्रभामण्डल  बिखरा ,
दुखद संक्रमण काल,तुम मुझे क्या दोगे !

यन्त्रमानवी बुद्धि , 
नष्ट कर क्षमता को,
कर देगी बर्वाद ,
मानवी प्रभुता को !
कृत्रिम मानव ज्ञान, धुंध मानवता पर !
अंधकार विकराल,तुम मुझे क्या दोगे !

Saturday, December 6, 2014

दर्द में भी , मुस्कराना चाहिए - सतीश सक्सेना

कष्ट में भी , मुस्कराना चाहिए ! 
हौले हौले  गुनगुनाना चाहिए !

दर्द जब जब, आसमां छूने लगे
गम भुला,हंसना हंसाना चाहिए !

आइये,हम अपने आंसू पोंछ लें 
समय कम है,गीत गाना चाहिए !

कोई अपना रूठ जाए , भूल से, 
पास जा उसको मनाना चाहिए !

वक्त कम है काम बाकी है पड़े,   
नींद से,उसको जगाना चाहिए !

एक दिन माँ से मिलाना चाहिए,
चाँद को काजल लगाना चाहिए !

Sunday, November 30, 2014

मगर हृदय ने पढ़ लीं कैसे, इतनी सदियाँ आँखों में -सतीश सक्सेना

अरसे बाद मिली हैं नज़रें,छलके खुशियां आँखों में !
लगता खड़े खड़े ही होंगीं, जीभर बतियाँ आँखों में !

बरसों बाद सामने पाकर, शब्द न जाने कहाँ गए !
मगर हृदय ने पढ़ लीं कैसे इतनी सदियाँ आँखों में ! 

इतना भी आसान न होता, गुमसुम दर्द भुला पाना !
बहतीं और सूखती रहतीं,कितनी नदियां आँखों में !

सावन में बागों के झूले , कब से याद न आये थे  
तुम्हें देख लहरायीं कैसे, इतनी बगियाँ आँखों में !

इतना हंस हंस बतलाते हो कितना दर्द छिपाओगे !
कब से आंसू  रोके बैठीं , गीली गलियां आँखों में !



Monday, November 24, 2014

विश्वास बिकेंगे अक्सर पर, अरविन्द नहीं हारा होगा -सतीश सक्सेना

बे-ईमानों  की  दुनियां में , 
अरविन्द,नाम है सपने का !
आँखों की पट्टी खोल रहा,   
उदघोषक है परिवर्तन का !
घर के संपन्न कुबेरों ने, यारों से मिलकर हरा दिया !
धूर्तों से इलेक्शन हारा है,संकल्प नहीं हारा होगा !

इकला था,और लड़ा सबसे  
निर्धन था बिन संसाधन के
कुछ चापलूस बतखोर जुड़े
आंधी में,लालच में धन के  
मक्कार नकाब लगा आये, विश्वास जीतने को उसका !
आघात हुआ था घातक पर,निष्कपट नहीं हारा होगा !

धनवानों की इस बस्ती में
अहसान रहे श्रमजीवी का !
मानव मूल्यों की  रक्षा में 
सम्मान रहे ,आंदोलन का
टीवी प्रचार,मीडिया बिके,आंदोलन ख़त्म कराने को !  
विश्वास यही इन हिज़डों से,यह मर्द नहीं हारा होगा !

ठट्ठा, मज़ाक, उपहास और 
अपमान हुआ है गांधी का !
चोरों, मक्कारों के  द्वारा   
अवमान हुआ है,आंधी का !
राजा,कुबेर,भ्रष्टाचारी , सब एक मंच पर पंहुच गए !
जनता, मूरख बन हारी है ,विश्वास नहीं हारा होगा ! 

बिन पैसे, इस आंदोलन में 
इकला धनवानों साथ लड़ा 
बीमार था , डंडे , लाठी खा 
राज्यशक्ति के साथ लड़ा !
बर्फीला पानी बरसाया,दुबले पतले हठयोगी पर !
भारत माँ, रोये तार तार, अरविन्द नहीं हारा होगा !

संसद से चोर भगाने को,
लड़ना होगा धनवानों से
ईमानदार  युग लाने को  
पिटना होगा बेईमानों से
सारी शक्तियां एकजुट हों,योगी पर ताली बजा रहीं !
थप्पड़ ,घूँसा ,अपमानों से ,  ईमान नहीं हारा होगा !

सारी  ताकतें साथ आयीं
योगी का साथ छुटाने को  
टीवी अखबार खरीद लिए 
स्मृति से आग,हटाने को !
वोटों के व्यापारी जीते,जनता ही हार गयी,फिर भी !
ना समझों को,समझाने का, संघर्ष नहीं हारा होगा !

कुछ साथी जमीर हारे थे 
अखबार बिके थे सोने में !
घबराए हुए , कुबेरों  से   
टीवी बिक गए करोड़ों में !
जनता का टीवी आएगा ,दस दस रूपये के चंदे से ! 
इन बिके प्रचार साधनों से,साहसी नहीं हारा होगा !

परिवर्तन कौन रोक पाया  
कितने आये और चले गए
साधू, सन्यासी, महामना
के सभी आवरण उतर गए
अवसरवादी,फ़क़ीर बनकर आये थे, चोले उतर गए ! 
चोरों को,उजागर करने का ,अरमान नहीं हारा होगा !


Friday, November 21, 2014

सुबह सबेरे कभी किसी ने, दरवाजा खटकाया होगा - सतीश सक्सेना

कितनी बार सबेरे माँ ने , दरवाजा खटकाया होगा !
और झुकी नज़रों से, तेरे आगे, हाथ फैलाया होगा !

वे भी दिन थे जब अम्मा की,नज़र से सहमा करते थे
सबके बीच डांट के कैसे उनको चुप करवाया होगा !

यही बहिन थी,जो भाई के लिए,सभी से लडती थी !
तुमने उसको,फूट फूट कर,सारी रात रुलाया होगा !

वे भी दिन थे उनके चलते, धरती कांपा करती थी
ताकतवर आसन्न बुढ़ापे ने ही, उन्हें डराया होगा !

पिता तुम्हारे अक्सर अपने, बेटे के गुण गाते रहते, 
उनको भी परिवारजनों ने, शर्मिंदा करवाया होगा !

Tuesday, November 18, 2014

मैं गंगा को ला तो दूंगा पर क्या धार संभाल सकोगे - सतीश सक्सेना

अगर हिमालय ले अंगड़ाई,कैसे भार संभाल सकोगे !
सूरज के,नभ से बरसाए क्या अंगार, संभाल सकोगे !

सृजनमयी के पास , अनगिनत रत्नों के भंडार भरे हैं !
मैं गंगा को ला तो दूंगा,पर क्या धार संभाल सकोगे ?

सारे जीवन हमने सबको, दिल में बसाकर रखा है !
जाने पर , मेरे गीतों के , दावेदार संभाल सकोगे !

जीवन भर ऊंचे नीचे में,सुख दुःख के झंझावातों में 
बेईमानों बटमारों में ,क्या व्यापार संभाल सकोगे ?

खाली हाथों आया था मैं , खूब लुटाकर जाऊंगा ,
हंस हंस कर ली जिम्मेदारी बेशुमार,संभाल सकोगे ?

Wednesday, November 5, 2014

तुम्हें देखकर बस मचल ही तो जाते - सतीश सक्सेना

मुखौटे  लगाकर , बदल  ही तो जाते, 
बिना देखे हमको निकल ही तो जाते !

विदाई से पहले , खबर तक नहीं की  
तुम्हें देखकर, बस मचल ही तो जाते !
   
बुलावा जो आता तो आहुति भी देते  
हवन में भले हाथ, जल ही तो जाते !

अगर विष न होता तो नारी को दुमुहें
न जाने कभी का,निगल ही तो जाते !

अगर हम तुम्हें , बिन मुखौटे के पाते ! 
असल देखकर बस दहल ही तो जाते 




Sunday, November 2, 2014

ये नेता रहे तो , वतन बेंच देंगे - सतीश सक्सेना

भारतीय राजनीति में , चुनाव अभियान के विशाल खर्चे किसी से छिपे नहीं हैं , बेतहाशा धन खर्च करने के बाद जनप्रतिनिधि, उस धन की बसूली के लिए, क्या नहीं करेंगे ?

पार्टी और विचारधारा कोई भी हो,चुनाव जीतने के लिए,
 प्रचार,बिना धन संभव नहीं !  
आज हालत यह है, कि आम आदमी के मन में धवल वस्त्र पहने, इन मान्यवरों के लिए मन में कोई आदर नहीं ! हाँ , धन प्राप्ति के काम ऊपर से करवाने के लिए, इनकी मदद आवश्यक है ! भारतीय राजनीति  के भ्रष्ट आचरण पर यह रचना , शायद सत्य के बेहद नज़दीक है !



ये नेता रहे तो , वतन  बेंच देंगे !
ये पुरखों के सारे जतन बेंच देंगे


कलम के सिपाही अगर सो गए
हमारे मसीहा , अमन बेंच देंगे !

कुबेरों का कर्जा लिए शीश पर ये 
अगर बस चले तो सदन बेंच देंगे

नए राज भक्तों की इन तालियों
के,नशे में ये भारतरतन बेंच देंगे

मान्यवर बने हैं करोड़ों लुटाकर
उगाही में, सारा वतन बेंच देंगे !

Monday, October 27, 2014

अरे गुलामों कब जागोगे ? - सतीश सक्सेना

अरे अनपढ़ों कब जागोगे
देश लुट रहा, पछताओगे !

वतन हवाले करके इनके   
तुम वन्देमातरम गाओगे !

मूरख जनता,धूर्त शिकंजा 
इनसे कब मुक्ति पाओगे !

लगता सारे राष्ट्रभक्त मिल
घर को ही कच्चा खाओगे !

नेता कब से , मूर्ख बनाते 
इनसे कब हिसाब मांगोगे !

राजनीति में बदबू काफी    
कैसे खुली हवा लाओगे !

अनपढ़,भ्रष्ट,समाज हमारा
अरे गुलामों !कब जागोगे !

Thursday, October 23, 2014

दीपोत्सव मंगलमय हो -सतीश सक्सेना

दीपोत्सव मंगलमय सबको 
गज  आनन,गौरी पूजा से !

दुष्ट प्रवृतियां, कम हो जाएँ  
अस्त्र मिले, खुद चतुर्भुजा से 

बुरी शक्तियां पास न आएं 
शक्ति मिले अर्जुनध्वजा से

हो सम्मानित गौरव अपना    
तीक्ष्ण बुद्धि,अक्षय ऊर्जा से

सदा रहें , अनुकूल शारदा ,  
गृह रक्षित हो,अष्टभुजा से !



Tuesday, October 21, 2014

कवि कैसे वर्णन कर पाए , इतना दर्द लिखाई में - सतीश सक्सेना

कहीं क्षितिज में देख रही है
जाने क्या क्या सोंच रही है
किसको हंसी बेंच दी इसने
किस चिंतन में पड़ी हुई है

नारी व्यथा किसे समझाएं, गीत और कविताई में !
कौन समझ पाया है उसको, तुलसी की चौपाई में !

उसे पता है,पुरुष बेचारा
पीड़ा नहीं समझ पायेगा
दीवारों में रहा सुरक्षित 
कैसे दर्द, समझ पायेगा
पौरुष कबसे वर्णन करता, आयी मोच कलाई में !
जगजननी मुस्कान ढूंढती,पुरुषों की प्रभुताई में !

पीड़ा,व्यथा, वेदना कैसे
संग निभाएं बचपन का 
कैसे माली को समझाएं 
26 अक्टूबर जनवाणी

कष्ट, कटी शाखाओं का 
सबसे कोमल शाखा झुलसी,अनजानी गहराई में !
कितना फूट फूट कर रोयी,इक बच्ची तनहाई  में !

बेघर के दुःख कौन सुनेगा ,
कैसे उसको समझ सकेगा ?
अपने रोने से फुरसत कब
जो नारी को समझ सकेगा ?
कैसे छिपा सके तकलीफें, इतनी साफ़ ललाई में !
भरा दूध आँचल में लायी, आंसू मुंह दिखलाई में !

कैसे सबने उसके घर को
सिर्फ,मायका बना दिया
और पराये घर को सबने 
उसका मंदिर बना दिया
कवि कैसे वर्णन कर पाए , इतना दर्द लिखाई में !
कैसी व्यथा लिखा के लायी,अपनी मांगभराई में !

Sunday, October 12, 2014

अल्लाह क्या हुआ होगा - सतीश सक्सेना

नज़र मिले कहीं अल्लाह क्या हुआ होता !
नज़र उठी तो खुदा जाने क्या हुआ होता !

न जाने क्या हुआ, काली घटायें दूर रहीं 
यहीं तड़प के बरसतीं तो क्या हुआ होता !

भला हुआ जो इधर को,नहीं उठीं आँखें
हमीं को देख हंसें,जाने क्या हुआ होता !    

खुदा करे कि वे चुपचाप ही रहें तब तक
कहीं वे मूड में आ जाएँ,क्या हुआ होता !  

ऐसा लगता है,कि वे रात भर नहीं सोये 
या इलाही न जाने,रात क्या हुआ होता !

Wednesday, October 8, 2014

कैसे सिसके करवाचौथ बिचारी सी - सतीश सक्सेना

प्रतिबद्धता कहें अथवा लाचारी सी !
जगजननी लगती,कैसी गांधारी सी !

धुत्त शराबी से जीवन भर, दर्द सहे !
कैसे सिसके करवाचौथ बिचारी सी ! 

किसने नहीं सिखाया, उसे विदाई में 
पूरे  जीवन रहना , एकाचारी  सी !

छोटी उम्र में क्या बस्ती से सीखा है, 
किसे सुनाये बातें , मिथ्याचारी सी !

धीरे धीरे कवच पुरुष का, तोड़ रही !
कमर है,मालिन जैसी,देह लुहारी सी !

छप्पर डाल के  सोने वाले , भूल गए 
नारी के मन सुलग रही चिंगारी सी !

ग्लानि,थकान,विषाद और उत्पीड़न भी
मिल कर देख न पाये, नारी हारी सी !
Related Posts Plugin for Blogger,