Thursday, December 18, 2014

इस्लाम की छाती पे , ये निशान रहेंगे - सतीश सक्सेना

कातिल मनाएं जश्न,भले अपनी जीत का 
इस्लाम  की छाती पे , ये निशान  रहेंगे !

इस्लाम के बच्चों का खून,उनकी जमीं पर 
रिश्तों की बुनावट पे,  हम आघात  कहेंगे !

दुनियां का धरम पर से ,भरोसा चला गया  !
इन दुधमुंहों  के रक्त  को , हम याद रखेंगे !

महसूद, ओसामा  के नाम,अमिट हो गए 
ये ज़ुल्म ऐ तालिबान , लोग याद  रखेंगे  !

जब भी निशान ऐ खून, तुम्हे याद आयेंगे
इंसानियत  के अश्क़ भी  सोने नहीं  देंगे ! 

Sunday, December 7, 2014

तुम मुझे क्या दोगे - सतीश सक्सेना

समय प्रदूषित लेकर आये , क्या दोगे ?
कालचक्र विकराल,तुम मुझे क्या दोगे ?

दैत्य , शेर , सम्राट   
ऐंठ कर , चले गए !
शक्तिपुरुष बलवान
गर्व कर  चले गए ! 
मैं हूँ प्रकृति प्रवाह, तुम मुझे क्या दोगे ?  
हँसता काल विशाल,तुम मुझे क्या दोगे ?

मैं था ललित प्रवाह 
स्वच्छ जल गंगे का 
भागीरथ के समय 
बही, शिव गंगे का !
किया प्रदूषित स्वयं,वायु, जल, वृक्षों को ?
कालिदास संतान ! तुम मुझे  क्या  दोगे ?

अपनी तुच्छ ताकतों 
का अभिमान लिए !
प्रकृति साधनों का 
समग्र अपमान किये  
करते खुद विध्वंस, प्रकृति संसाधन के !
धूर्त मानसिक ज्ञान,तुम मुझे क्या दोगे !

विस्तृत बुरे प्रयोग 
ज्ञान संसाधन  के  !
शिथिल मानवी अंग
बिना उपयोगों  के !
खंडित वातावरण, प्रभामण्डल  बिखरा ,
दुखद संक्रमण काल,तुम मुझे क्या दोगे !

यन्त्रमानवी बुद्धि , 
नष्ट कर क्षमता को,
कर देगी बर्वाद ,
मानवी प्रभुता को !
कृत्रिम मानव ज्ञान, धुंध मानवता पर !
अंधकार विकराल,तुम मुझे क्या दोगे !

Saturday, December 6, 2014

दर्द में भी , मुस्कराना चाहिए - सतीश सक्सेना

कष्ट में भी , मुस्कराना चाहिए ! 
हौले हौले  गुनगुनाना चाहिए !

दर्द जब जब, आसमां छूने लगे
गम भुला,हंसना हंसाना चाहिए !

आइये,हम अपने आंसू पोंछ लें 
समय कम है,गीत गाना चाहिए !

कोई अपना रूठ जाए , भूल से, 
पास जा उसको मनाना चाहिए !

वक्त कम है काम बाकी है पड़े,   
नींद से,उसको जगाना चाहिए !

एक दिन माँ से मिलाना चाहिए,
चाँद को काजल लगाना चाहिए !

Sunday, November 30, 2014

मगर हृदय ने पढ़ लीं कैसे, इतनी सदियाँ आँखों में -सतीश सक्सेना

अरसे बाद मिली हैं नज़रें,छलके खुशियां आँखों में !
लगता खड़े खड़े ही होंगीं, जीभर बतियाँ आँखों में !

बरसों बाद सामने पाकर, शब्द न जाने कहाँ गए !
मगर हृदय ने पढ़ लीं कैसे इतनी सदियाँ आँखों में ! 

इतना भी आसान न होता, गुमसुम दर्द भुला पाना !
बहतीं और सूखती रहतीं,कितनी नदियां आँखों में !

सावन में बागों के झूले , कब से याद न आये थे  
तुम्हें देख लहरायीं कैसे, इतनी बगियाँ आँखों में !

इतना हंस हंस बतलाते हो कितना दर्द छिपाओगे !
कब से आंसू  रोके बैठीं , गीली गलियां आँखों में !



Monday, November 24, 2014

विश्वास बिकेंगे अक्सर पर, अरविन्द नहीं हारा होगा -सतीश सक्सेना

बे-ईमानों  की  दुनियां में , 
अरविन्द,नाम है सपने का !
आँखों की पट्टी खोल रहा,   
उदघोषक है परिवर्तन का !
घर के संपन्न कुबेरों ने, यारों से मिलकर हरा दिया !
धूर्तों से इलेक्शन हारा है,संकल्प नहीं हारा होगा !

इकला था,और लड़ा सबसे  
निर्धन था बिन संसाधन के
कुछ चापलूस बतखोर जुड़े
आंधी में,लालच में धन के  
मक्कार नकाब लगा आये, विश्वास जीतने को उसका !
आघात हुआ था घातक पर,निष्कपट नहीं हारा होगा !

धनवानों की इस बस्ती में
अहसान रहे श्रमजीवी का !
मानव मूल्यों की  रक्षा में 
सम्मान रहे ,आंदोलन का
टीवी प्रचार,मीडिया बिके,आंदोलन ख़त्म कराने को !  
विश्वास यही इन हिज़डों से,यह मर्द नहीं हारा होगा !

ठट्ठा, मज़ाक, उपहास और 
अपमान हुआ है गांधी का !
चोरों, मक्कारों के  द्वारा   
अवमान हुआ है,आंधी का !
राजा,कुबेर,भ्रष्टाचारी , सब एक मंच पर पंहुच गए !
जनता, मूरख बन हारी है ,विश्वास नहीं हारा होगा ! 

बिन पैसे, इस आंदोलन में 
इकला धनवानों साथ लड़ा 
बीमार था , डंडे , लाठी खा 
राज्यशक्ति के साथ लड़ा !
बर्फीला पानी बरसाया,दुबले पतले हठयोगी पर !
भारत माँ, रोये तार तार, अरविन्द नहीं हारा होगा !

संसद से चोर भगाने को,
लड़ना होगा धनवानों से
ईमानदार  युग लाने को  
पिटना होगा बेईमानों से
सारी शक्तियां एकजुट हों,योगी पर ताली बजा रहीं !
थप्पड़ ,घूँसा ,अपमानों से ,  ईमान नहीं हारा होगा !

सारी  ताकतें साथ आयीं
योगी का साथ छुटाने को  
टीवी अखबार खरीद लिए 
स्मृति से आग,हटाने को !
वोटों के व्यापारी जीते,जनता ही हार गयी,फिर भी !
ना समझों को,समझाने का, संघर्ष नहीं हारा होगा !

कुछ साथी जमीर हारे थे 
अखबार बिके थे सोने में !
घबराए हुए , कुबेरों  से   
टीवी बिक गए करोड़ों में !
जनता का टीवी आएगा ,दस दस रूपये के चंदे से ! 
इन बिके प्रचार साधनों से,साहसी नहीं हारा होगा !

परिवर्तन कौन रोक पाया  
कितने आये और चले गए
साधू, सन्यासी, महामना
के सभी आवरण उतर गए
अवसरवादी,फ़क़ीर बनकर आये थे, चोले उतर गए ! 
चोरों को,उजागर करने का ,अरमान नहीं हारा होगा !


Friday, November 21, 2014

सुबह सबेरे कभी किसी ने, दरवाजा खटकाया होगा - सतीश सक्सेना

कितनी बार सबेरे माँ ने , दरवाजा खटकाया होगा !
और झुकी नज़रों से, तेरे आगे, हाथ फैलाया होगा !

वे भी दिन थे जब अम्मा की,नज़र से सहमा करते थे
सबके बीच डांट के कैसे उनको चुप करवाया होगा !

यही बहिन थी,जो भाई के लिए,सभी से लडती थी !
तुमने उसको,फूट फूट कर,सारी रात रुलाया होगा !

वे भी दिन थे उनके चलते, धरती कांपा करती थी
ताकतवर आसन्न बुढ़ापे ने ही, उन्हें डराया होगा !

पिता तुम्हारे अक्सर अपने, बेटे के गुण गाते रहते, 
उनको भी परिवारजनों ने, शर्मिंदा करवाया होगा !

Tuesday, November 18, 2014

मैं गंगा को ला तो दूंगा पर क्या धार संभाल सकोगे - सतीश सक्सेना

अगर हिमालय ले अंगड़ाई,कैसे भार संभाल सकोगे !
सूरज के,नभ से बरसाए क्या अंगार, संभाल सकोगे !

सृजनमयी के पास , अनगिनत रत्नों के भंडार भरे हैं !
मैं गंगा को ला तो दूंगा,पर क्या धार संभाल सकोगे ?

सारे जीवन हमने सबको, दिल में बसाकर रखा है !
मर जाने पर इन गीतों के, दावेदार संभाल सकोगे !

जीवन भर ऊंचे नीचे में,सुख दुःख के झंझावातों में 
बेईमानों बटमारों में ,क्या व्यापार संभाल सकोगे ?

खाली हाथों आया था मैं , खूब लुटाकर जाऊंगा ,
हंस हंस कर ली जिम्मेदारी बेशुमार,संभाल सकोगे ?

Wednesday, November 5, 2014

तुम्हें देखकर बस मचल ही तो जाते - सतीश सक्सेना

मुखौटे  लगाकर , बदल  ही तो जाते, 
बिना देखे हमको निकल ही तो जाते !

विदाई से पहले , खबर तक नहीं की  
तुम्हें देखकर, बस मचल ही तो जाते !
   
बुलावा जो आता तो आहुति भी देते  
हवन में भले हाथ, जल ही तो जाते !

अगर विष न होता तो नारी को दुमुहें
न जाने कभी का,निगल ही तो जाते !

अगर हम तुम्हें , बिन मुखौटे के पाते ! 
असल देखकर बस दहल ही तो जाते 




Sunday, November 2, 2014

ये नेता रहे तो , वतन बेंच देंगे - सतीश सक्सेना


भारतीय राजनीति में , चुनाव अभियान के विशाल खर्चे किसी से छिपे नहीं हैं , बेतहाशा धन खर्च करने के बाद जनप्रतिनिधि, उस धन की बसूली के लिए, क्या नहीं करेंगे ?
पार्टी और विचारधारा कोई भी हो,चुनाव जीतने के लिए,
 प्रचार,बिना धन संभव नहीं !  
आज हालत यह है, कि आम आदमी के मन में धवल वस्त्र पहने, इन मान्यवरों के लिए मन में कोई आदर नहीं ! हाँ , धन प्राप्ति के काम ऊपर से करवाने के लिए, इनकी मदद आवश्यक है ! भारतीय राजनीति  के भ्रष्ट आचरण पर यह रचना , शायद सत्य के बेहद नज़दीक है !


ये नेता रहे तो , वतन  बेंच देंगे !
ये पुरखों के सारे जतन बेंच देंगे


कलम के सिपाही अगर सो गए
हमारे मसीहा , अमन बेंच देंगे !

कुबेरों का कर्जा लिए शीश पर ये 
अगर बस चले तो सदन बेंच देंगे

नए राज भक्तों की इन तालियों
के,नशे में ये भारतरतन बेंच देंगे

मान्यवर बने हैं करोड़ों लुटाकर
उगाही में, सारा वतन बेंच देंगे !

Monday, October 27, 2014

अरे गुलामों कब जागोगे ? - सतीश सक्सेना

अरे अनपढ़ों कब जागोगे
देश लुट रहा, पछताओगे !

वतन हवाले करके इनके   
तुम वन्देमातरम गाओगे !

मूरख जनता,धूर्त शिकंजा 
इनसे कब मुक्ति पाओगे !

लगता सारे राष्ट्रभक्त मिल
घर को ही कच्चा खाओगे !

नेता कब से , मूर्ख बनाते 
इनसे कब हिसाब मांगोगे !

राजनीति में बदबू काफी    
कैसे खुली हवा लाओगे !

अनपढ़,भ्रष्ट,समाज हमारा
अरे गुलामों !कब जागोगे !

Thursday, October 23, 2014

दीपोत्सव मंगलमय हो -सतीश सक्सेना

दीपोत्सव मंगलमय सबको 
गज  आनन,गौरी पूजा से !

दुष्ट प्रवृतियां, कम हो जाएँ  
अस्त्र मिले, खुद चतुर्भुजा से 

बुरी शक्तियां पास न आएं 
शक्ति मिले अर्जुनध्वजा से

हो सम्मानित गौरव अपना    
तीक्ष्ण बुद्धि,अक्षय ऊर्जा से

सदा रहें , अनुकूल शारदा ,  
गृह रक्षित हो,अष्टभुजा से !



Tuesday, October 21, 2014

कवि कैसे वर्णन कर पाए , इतना दर्द लिखाई में - सतीश सक्सेना

कहीं क्षितिज में देख रही है
जाने क्या क्या सोंच रही है
किसको हंसी बेंच दी इसने
किस चिंतन में पड़ी हुई है

नारी व्यथा किसे समझाएं, गीत और कविताई में !
कौन समझ पाया है उसको, तुलसी की चौपाई में !

उसे पता है,पुरुष बेचारा
पीड़ा नहीं समझ पायेगा
दीवारों में रहा सुरक्षित 
कैसे दर्द, समझ पायेगा
पौरुष कबसे वर्णन करता, आयी मोच कलाई में !
जगजननी मुस्कान ढूंढती,पुरुषों की प्रभुताई में !

पीड़ा,व्यथा, वेदना कैसे
संग निभाएं बचपन का 
कैसे माली को समझाएं 
26 अक्टूबर जनवाणी

कष्ट, कटी शाखाओं का 
सबसे कोमल शाखा झुलसी,अनजानी गहराई में !
कितना फूट फूट कर रोयी,इक बच्ची तनहाई  में !

बेघर के दुःख कौन सुनेगा ,
कैसे उसको समझ सकेगा ?
अपने रोने से फुरसत कब
जो नारी को समझ सकेगा ?
कैसे छिपा सके तकलीफें, इतनी साफ़ ललाई में !
भरा दूध आँचल में लायी, आंसू मुंह दिखलाई में !

कैसे सबने उसके घर को
सिर्फ,मायका बना दिया
और पराये घर को सबने 
उसका मंदिर बना दिया
कवि कैसे वर्णन कर पाए , इतना दर्द लिखाई में !
कैसी व्यथा लिखा के लायी,अपनी मांगभराई में !

Sunday, October 12, 2014

अल्लाह क्या हुआ होगा - सतीश सक्सेना

नज़र मिले कहीं अल्लाह क्या हुआ होता !
नज़र उठी तो खुदा जाने क्या हुआ होता !

न जाने क्या हुआ, काली घटायें दूर रहीं 
यहीं तड़प के बरसतीं तो क्या हुआ होता !

भला हुआ जो इधर को,नहीं उठीं आँखें
हमीं को देख हंसें,जाने क्या हुआ होता !    

खुदा करे कि वे चुपचाप ही रहें तब तक
कहीं वे मूड में आ जाएँ,क्या हुआ होता !  

ऐसा लगता है,कि वे रात भर नहीं सोये 
या इलाही न जाने,रात क्या हुआ होता !

Wednesday, October 8, 2014

कैसे सिसके करवाचौथ बिचारी सी - सतीश सक्सेना

प्रतिबद्धता कहें अथवा लाचारी सी !
जगजननी लगती,कैसी गांधारी सी !

धुत्त शराबी से जीवन भर, दर्द सहे !
कैसे सिसके करवाचौथ बिचारी सी ! 

किसने नहीं सिखाया, उसे विदाई में 
पूरे  जीवन रहना , एकाचारी  सी !

छोटी उम्र में क्या बस्ती से सीखा है, 
किसे सुनाये बातें , मिथ्याचारी सी !

धीरे धीरे कवच पुरुष का, तोड़ रही !
कमर है,मालिन जैसी,देह लुहारी सी !

छप्पर डाल के  सोने वाले , भूल गए 
नारी के मन सुलग रही चिंगारी सी !

ग्लानि,थकान,विषाद और उत्पीड़न भी
मिल कर देख न पाये, नारी हारी सी !

Sunday, September 21, 2014

मौत हर वक्त याद रखता हूँ ! - सतीश सक्सेना

सिर्फ इक बात याद रखता हूँ !
मौत हर वक्त याद रखता हूँ !

मुझ पे प्यारों के, कर्ज बाकी हैं !
एक एक लम्हा याद रखता हूँ !

कौन जख्मों को, सोंच कर रोये ! 
सिर्फ खुशियों को याद रखता हूँ !

मौलवी और पंडितों को नहीं !
Daily news Jaipur 30sept14
महज़ अल्लाह, याद रखता हूँ !

कौन मंदिर की लाइनों में लगे !
सिर्फ अम्मा को याद रखता हूँ !

जो कभी साथ ही न चल पाये
मैं तो उनको ही साथ रखता हूँ !

न जाने किस घडी वो आ जाये
घर के सब द्वार खुले रखता हूँ !



Saturday, August 30, 2014

आखिरी फैसला - सतीश सक्सेना

"बेटा मैंने वह ऍफ़ डी  तुड़वा  कर सारे पैसे निकाल लिए तुम भी अपनी बीबी के साथ हिल स्टेशन जा सकते हो....."
 

              उसी दिन दे देते तो दोनों भाइयों के साथ ही चला जाता न  तब सबके सामने इतनी गाली गलौज  की  जरूरत नहीं पड़ती उस दिन तो दबाये बैठे रहे कि आखिरी ऍफ़ डी है ! लाइए पैसे, भाइयों को मत बोलना कि मैंने आपसे लिए हैं ! नहीं तो वह मुझसे अपना हिस्सा लड़ के ले लेंगे ! आज मन करे तो बड़े भाई के कमरे में ऐ सी चलाकर सो जाओ अच्छी नींद आएगी , मैं किसी को नहीं कहूँगा ! जीने के नीचे गर्मी ज्यादा है !

"नहीं पांच छह सालों में मेरी अब मेरी आदत पड़ गयी है , मैं यही ठीक हूँ !"

                                                  ***********
                    जैसा आपसे बात हुई थी सारे अमाउंट का चेक आपकी बैंक में जमा करा दिया गया है यह रही रसीद ! अब आप यहाँ यहाँ दस्तखत कर दीजिये मगर अब आप अकेले कैसे रहेंगे  ?

          "मैंने इस घर के सामने वाले मकान में एक कमरा किराए  पर ले लिया है , काम करने को मेरी पुरानी नौकरानी रहेगी ! इन लड़कों ने धीरे धीरे मकान के तीनो कमरे कब्ज़ा लिए , ड्राइंग रूम में मेरे सोने से घर में इन्फेक्शन फैलता था सो पिछले २ वर्ष से सीढियों के नीचे मेरी खाट डाल दी, अब यह तीनो मेरे मरने का इंतज़ार कर रहे हैं ! मुझे कम पैसों की चिंता नहीं जो तुमने इस मकान के बदले दिए हैं मेरे बुढ़ापे के लिए काफी हैं ! रही बात मकान की , सो मैंने अपने पैसों से बनाया था , उसी मकान में मेरे इन लालची लड़कों ने , धीरे धीरे मुझे सीढियों के नीचे  तक पंहुचा दिया ! तुम तीनों कमरों का सारा सामान निकाल कर सड़क पर रख दो और बाहर एक चौकीदार रख दो, जब तक यह तीनों बापस आएं !"

वे तीनों आपसे लड़ेंगे बाबूजी !

"मुझे परवाह नहीं, पुलिस एस पी से मिल चूका हूँ उन्होंने मेरी रिपोर्ट दर्ज कर ली है किसी भी गलत हालत में तीनों अपनी बीबियों के साथ जेल जायेंगे,मैं अब डरता नहीं !"

Friday, August 22, 2014

आज तुम्हारे दरवाजे भी लगते खूब बुहारे से - सतीश सक्सेना

सूरज के हंसने पर लगता , चाँद, सितारे हारे से !
मुक्त हंसी के कारण चिंतित रहते यार हमारे से !

कैसे झुकी झुकी ही रहतीं, नज़रें शर्म के मारे से 
कब आएगी रात,पूछतीं अक्सर साँझ सकारे से !

बीमारी में सो न सकेंगे , इंसानों  की बस्ती में !
लोग जागरण  के चंदे को , फिरते मारे मारे से !

उठो नींद से,जगते रहना,बस्ती नज़र आ रही है 
गहरे सागर से बच आये, खतरा रहे किनारे से !

दारु, बीड़ी और नशे को, दुनिया गाली देती है !
हमने सारा जीवन अपना,काटा इसी सहारे से !

Monday, August 18, 2014

बार बार क्यों मन को बदले, इतनी बार दिखावा क्यों - सतीश सक्सेना

इतनी बार बदलकर कपडे
कुछ तो रंग निखारा होगा 
इस निर्दोष सौम्य चेहरे से
सबको मूर्ख बनाया होगा ! 
धन के पीछे पागल होकर दीपावली मनाना क्यों ?
सारा घर को गंदा करके, ड्राइंग रूम सजाना क्यों ?

चौंक चौक रह जाते कैसे,
कहीं झूठ तो बोला होगा 
कैसे नज़रें छिपा रहे हो,
गौरय्या को मारा होगा !
अविश्वास का पर्दा मन में, रिश्तों को उलझाना क्यों ?
मेहमानों के  आगे , नकली मुस्कानों को  लाना क्यों ?

सद्भावना समझ न आये 
औरों से  सम्मान  चाहिए
जीवन भर बेअदबी करके
अपने घर में अदब चाहिए 
संस्कार की व्याख्या ऐसे, गहरे मन से करना क्यों ?
आग लगा अपने हाथों से दैविक दोष बताना क्यों ?

बरसों बीते, गाली देते
अहंकार को खूब पूजते 
अपने पूरे खानदान  में 
मानवता शर्मिंदा करते
ऐसा  क्या जो,सुना सुना के,इतनी कसमें खाना क्यों ?
अब ऐसे मन क्यों घबराये , गैरों को  अपनाना क्यों ?

ऐसे क्यों डरते हो अपने 
दर्पण से शरमाना क्यों ?
कैसे किये गुनाह अकेले 
ऐसे भी  घबराना क्यों ?
पड़ोसियों को कोस कोस कर दीपावली मनाना क्यों ?
बेमन हो सारे जीवन , इन पदचिन्हों पर जाना क्यों ?

Wednesday, August 6, 2014

खुला रास्ता देना होगा , जंग में जाने वालों को - सतीश सक्सेना

किन्हीं गुरुजन के सम्मान में जवाब के कुछ अंश :
आप विद्वान् हैं , मैं विद्वान नहीं हूँ और न विद्वता खोजने निकला हूँ , साहित्य को आगे ले जाना मेरा लक्ष्य नहीं है भाई जी , मेरा लक्ष्य है समाज के पाखण्ड और अपने चेहरों पर लगे मुखौटे उतार कर , सिर्फ इंसान बन पाने की तमन्ना ! अपना कार्य कर रहा हूँ और बिना नाम चाहने की इच्छा के ! सो मुझे यश नहीं चाहिए हाँ सरल भाषा के जरिये अगर कुछ लोग भी इन्हें आत्मसात कर पाए तो लेखन सफल मानूंगा !
मुखौटे उतारने होंगे 
आज कवि और साहित्यकार भांड होकर रह गए हैं पुरस्कारों के लालच में , लोगों के पैर चाटते हुए कवि अब घर, समाज, परिवार सुधार पर नहीं लिखते , धन कमाने को लिखते हैं ! इन्हें समझाने के लिए नियमों में बिना बंधे, काम करना होगा, साहित्यकारों को बताना होगा कि धन और प्रशंसा के लालच में उनके भावनाएँ समाप्त हो गयीं हैं अतः अनपढ़ और सामान्य जन से उनकी कविता बहुत दूर चली गयी है , अब उनकी रचनाएं जनमानस पर प्रभाव छोड़ पाने के लिए नहीं लिखी जातीं  वे सिर्फ आशीर्वाद की अभिलाषी रहती हैं !
भाव अभिव्यक्ति के लिए कवि किसी शैली का दास नहीं हो सकता , कविता सोंच कर नहीं लिखी जाती उसका अपना प्रवाह है बड़े भाई , अगर उसमें बुद्धि लगायेंगे तब भाव विनाश निश्चित होगा ! तुलसी और कबीर ने किस नियम का पालन किया था ! आज भी, कुछ उनके शिष्य हो सकते हैं !
आज गीत और कवितायें खो गए हैं समाज से , मैं अकिंचन अपने को इस योग्य नहीं मानता कि साहित्य में अपना स्थान तलाश करू और न साहित्य से, अपने आपको किसी योग्य समझते हुए, किसी सम्मान की अभिलाषा रखता हूँ ! बिना किसी के पैर चाटे और घटिया मानसिकता के गुरुओं के पैरों पर हाथ लगाए , अंत समय तक इस विश्वास के साथ  लिखता रहूंगा कि देर सवेर लोग  इन रचनाओं को पढ़ेंगे जरूर !
जहाँ तक गद्य की बात है मैंने लगभग ४५० रचनाएं की हैं उनमें कविता और ग़ज़ल लगभग २०० होंगी बाकी सब लेख हैं जो समाज के मुखौटों के खिलाफ लिखे हैं , आपसे बहुत छोटा हूँ मगर कोई धारणा बनाने से पूर्व हो सके तो इन्हें पढियेगा अगर बड़ों का आशीर्वाद मिल सका तो धन्य मानूंगा !!
बहुत ज़ल्द ही ढोंग, मिटाने जागेंगे ,दुनिया वाले,
खुला रास्ता देना होगा , जंग में जाने वालों को !
****************************************************************
ज़ख़्मी दिल का दर्द,तुम्हारे
शोधग्रंथ , कैसे समझेंगे ?
हानि लाभ का लेखा लिखते ,
कवि का मन कैसे जानेंगे ?
ह्रदय वेदना की गहराई, तुमको हो अहसास, लिखूंगा !
तुम कितने भी अंक घटाओ,अनुत्तीर्ण का दर्द लिखूंगा !

Monday, August 4, 2014

दरो दीवार को , हर हाल बचाना होगा - सतीश सक्सेना

घर बचाने के लिए, साथ तो आना होगा !
हमें हर हाल में गौरव को बचाना होगा !

कैसी ज़िल्लत है नाचने में,बताने के लिए !
भरी महफ़िल में मदारी को नचाना होगा ! 

माँ के तकिये में सिले,मेरे ही फोटो निकले 
मेरा ख़याल था, इसमें तो खज़ाना होगा !

आजकल आसमां पर,लोग नज़र रखते हैं
कुछ चमकते हुए तारों को हटाना होगा !

कबसे ठहरा हुआ यह दर्द,पोंछने के लिए ! 
सूखे बंजर में भी मेंहदी को लगाना होगा !
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