Friday, July 25, 2014

मुझको सदियों से रुलाता है कोई - सतीश सक्सेना

मुझको सदियों से,रुलाता है कोई !
रोज आकर , थपथपाता है कोई !

करवटें मुझको बदलता देखकर ,
पुच्चियाँ करके, सुलाता है कोई !

नींद अक्सर ही मुझे आती नहीं,
हाथ बालों में, फिराता है कोई !

जब कभी यादें , न सोने दें मुझे ,
नींद को , लोरी सुनाता है कोई !

जब कभी आँखों से आंसू छलकते   
रात भर हिम्मत दिलाता है कोई !

एक बच्चे से ही, तो गलती हुई ! 
पूरे जीवन , रूठ जाता है कोई !

कितनी रातें रूठ कर खाया नहीं 
एक कौरा, मुंह में दे जाता कोई !

Wednesday, July 23, 2014

जिस दिन पहली बार मिलोगे, गाओगे - सतीश सक्सेना

जितनी बार मिलोगे तो शरमाओगे !
सब  देखीं तस्वीरें ,  फीकी पाओगे ! 

जब जब तुमको याद हमारी आएगी
बिना बात ही घर बैठे , मुस्काओगे !

गीत हमारे खुद मुंह पर आ जाएंगे
जब भी नाम सुनोगे,गाना गाओगे !

आसमान की राहें, आसां कहाँ रहीं
सूर्यवंशियों की , ठकुराहट पाओगे ! 

बार बार समझाया,चाँद सितारों ने 
नहीं अकेले जाओ तुम फंस जाओगे !



Saturday, July 19, 2014

दरवाजे पर कौन खड़ा है,इतनी रात बधाई को ! - सतीश सक्सेना

अदब कायदा खूब सिखाओ शेख कुएं औ खाई को !  
गिरना है वो गिर के रहेगा , देगा दोष खुदाई को ! 

सारे फ़र्ज़ निभाए हमने,अब जाने का वक्त हुआ !   
दरवाजे पर कौन खड़ा है,इतनी रात बधाई को !

घर में कीचड़ खूब उड़ाई,उसने पूरा काम किया !
आसानी से दाग़ न जाएँ , करते रहो पुताई को !

लेना देना रस्म रिवाजों से ही घर का नाश हुआ
बहू तो कब से इंतज़ार में बैठी मुंह दिखलाई को !

प्रतिरोपण के लिए वृक्ष की कोमल शाखा दूर हुई, 
बरगद की झुर्रियां बताएं , कैसे सहा विदाई को !

Wednesday, July 16, 2014

अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा करा कर जाऊँगा ! - सतीश सक्सेना

मरने से पहले दुनियां को,कुछ गीत सुनाकर जाऊंगा ! 
हिंदी कविताओं,गीतों में,कुछ योगदान कर जाऊंगा !

श्रीहीन हुए स्वर,गीतों के, झंकार सुना कर जाऊंगा !   
अनपढ़ हूँ,कवियों के पथ में,ये फूल चढ़ाकर जाऊंगा !

बंजर रेतीली धरती में , कुछ वृक्ष लगाने का मन है !
मानव हूँ,जग संरचना में,कुछ अंशदान कर जाऊँगा !

जब कलम उठाई हाथों में , लोगों ने छींटे , खूब कसे ! 
स्मरण कबीरा का करके,शीशा दिखला कर जाऊँगा !

लाचार वृद्ध, अंधे, गूंगे, पशु, पक्षी की तकलीफों को !
लयबद्ध उपेक्षित छंदों में,सम्मान दिला कर जाऊँगा !

कुछ वादे करके निकला हूँ अपने दिल की गहराई से 
अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा करा कर जाऊँगा !

Saturday, July 12, 2014

हमें तुम्हारी, लिखते पढ़ते , जानी कब परवाह रही है -सतीश सक्सेना

तुम जुगनू के व्यापारी हो 
हम प्रकाश ,फैलाने वाले !
तुम गीतों के सौदागर हो
हम निर्भय हो गाने वाले !
हमको कब हिन्दी दल्लों की, जीवन में परवाह रही है !
रचनाएं,कवियों की जग में,इकबालिया गवाह रही हैं !

सबक सिखाने की मस्ती में 
शायद, साँसे भूल गये हो !
चंद दिनों की हँसी और है 
शायद मरघट भूल गए हो ! 
स्वाभिमान को सबक सिखाने,चेष्टा बड़ी,अदाह रही है !
हमको भी,तुम पर हंसने की इच्छा बड़ी अथाह रही है !

अरे ! तुम्हारा चेला  कैसे 
तुम्हें भूलकर पदवी पाया
तुम गद्दी को रहे सम्हाले 
औ वो पद्मविभूषण पाया  !
कोई सूर बना गिरिधर का, कोई मीरा रसदार रही है !
हंस, हंस खूब तमाशा देखें , जानी कब परवाह रही है !

सबके तुमने पाँव पकड़ कर
गुरु के सम्मुख बैठ, लेटकर  
कवि सम्मेलन में बजवाकर
दांत निपोरे,हुक्का भरकर 
तितली जगह जगह इठलाकर,करती खूब विवाह रही है !
सूर्यमुखी में महक कहाँ से ? दुनियां  में  अफवाह रही है !

बड़े, बड़े मार्तण्ड कलम के
जो न झुकेगा उसे मिटा दो 
जीवन भर जो पाँव दबाये 
उसको पद्मश्री दिलवा दो !
बड़े बड़े विद्वान उपेक्षित , चमचों पर रसधार बही है !
अहमतुष्टि के लिए समर्पित,चेतन मुक्त प्रवाह बही है !

गुरुवर तेज बनाये रखना 
चेलों के गुण गाये रखना !
भावभंगिमाओं के बलपर 
इनको कवि बनाये रखना !
समय आ गया भांड गवैय्यों को, हिंदी पहचान रही है !
जितनी सेवा जिसने करली,उतनी ही तनख्वाह रही है !

Thursday, July 10, 2014

कैसे कैसे लोग भी, गंगा नहाये इन दिनों ! ! -सतीश सक्सेना

अनपढ़ों के वोट से , बरसीं घटायें  इन दिनों !
साधू सन्यासी भी आ मूरख बनाएँ इन दिनों !

झूठ, मक्कारी, मदारी और धन के जोर पर ,  
कैसे कैसे लोग भी , योद्धा कहायें इन दिनों !

चोर डाकू चुन चुना के , राजधानी आ गए ,
आप संसद के लिए, आंसू बहायें इन दिनों !

देखते ही देखते सरदार को , रुखसत किया ,
बंदरों ने सीख लीं कितनी कलायें इन दिनों !

ये वही नाला है जमुना नाम था,जिसके लिए, 
साफ़ करने के लिए, चलती हवायें इन दिनों !



Friday, July 4, 2014

अल्लाह हर बशर को, रमज़ान मुबारक हो - सतीश सक्सेना

अल्लाह हर बशर को, रमज़ान मुबारक हो
सब को इबादतों का, अरमान मुबारक हो !


माता पिता को रखना ताउम्र प्यार से तुम !
अल्लाह का दिया ये , अहसान मुबारक हो ! 


इन रहमतों के क़र्ज़े , कैसे  अदा  करोगे ?
माँ-बाप का ये प्यारा दालान मुबारक हो !


रहमत के माह में तो कुछ काम नेक कर ले
जो दे सवाब तुम को रहमान , मुबारक हो !


मुझ को मेरे ख़ुदाया तू राहे हक़ प रखना
तेरा अता किया  , ये ईमान मुबारक हो !

Sunday, June 29, 2014

अनु को मेरे पूरे प्यार के साथ -सतीश सक्सेना

विद्वानों में गिने जाते हम लोग, अक्सर जीवन की सबसे बड़ी हकीकत, मौत की याद नहीं आती जब तक सामने कोई हादसा न हो जाए ! 
आज अनु की जन्मदिन पर वह मनहूस दिन याद आ गया जब उसने अपने नन्हें अजन्में पुत्र के साथ अंतिम सांस ली थी ! वह अपने घर की सबसे प्यारी लड़की थी जिसका खोना हम कल्पना भी नहीं सकते मगर घर के सब बड़े बूढ़ों को छोड़ सबसे पहले, वही, यहाँ से चली गयी !

दूर देश जाना,  था उसने ,
पंखों से, उड़ जाना उसने 
प्यार बांटकर हँसते हँसते 
परियों सा खो जाना उसने 
स्वर्णपरी कुछ दिन आकर ही,सबको सिखा गयी थी गीत !
कहाँ खो गयी, हंसी  तुम्हारी  ,किसने छीन लिया संगीत   ?

ऐसा लगता , हँसते गाते 
तुझको कोई छीन ले गया !
एक निशाचर,सोता पाकर 
घर से तुमको उठा ले गया !
जबसे तूने छोड़ा हमको, शोक मनाते  मेरे गीत !
सोते जगते, अब तेरी,  तस्वीर बनाएं मेरे  गीत !

काश कभी तो सोंचा होता 
इतनी  बुरी  रात आयेगी ,
नाम बदलते,तुझे छिपाते 
बुरी घडी भी कट जायेगी !
बड़े शक्तिशाली बनते थे ,बचा न पाए तुझको गीत ! 
रक्त भरे वे बाल तुम्हारे , कभी  न  भूलें मेरे गीत ! 

ऐसा पहली बार  हुआ था  
हंसकर उसने नहीं बुलाया 
हम सब उसके पास खड़े थे 
उसने हमको, नहीं बिठाया  !
बिलख बिलख कर रोये हम सब,टूट न पाई उसकी नींद ! 
उठ जा बेटा तुझे जगाते , सिसक सिसक कर रोये गीत  !

कितनी सीधी कितनी भोली 
हम सब की हर बात मानती 
बच्चों जैसी, लिए सरलता,
स्वागत करने हंसती आती !
जब जब, तेरे घर पर जाते,  तुझको ढूंढें मेरे गीत  !
हर मंगल उत्सव पर बच्चे, शोक मनाएं मेरे गीत  !

जाकर भी वरदान दे गयी 
श्री धर  पुत्री, दुनिया को !
खुद केशव की  रक्षा करके ,
दान दे गयी , दुनिया को !
बचपन अंतिम , साँसे लेता , सन्न रह गये सारे गीत !  
देवकि पुत्री के जीवन को ,बचा  न  पाए  मेरे  गीत  !

                          अनु के असमय जाने को याद करते समय, आज सोंच रहा था कि पिछले ३७ साल की नौकरी में लगभग हर चार वर्ष बाद एक ट्रांसफर हुआ है , इस वर्ष ऑफिस वाला आखिरी ट्रांसफर (रिटायरमेंट) भी होना है , अगर इसी क्रम में गिनता जाऊं तो शायद दुनियां से, ट्रांसफर होने में अधिक समय बाकी नहीं है ! फोटोग्राफी का बचपन से शौक रहा है , शायद मैं अकेला लेखक हूँ जो कि अपनी हर रचना के साथ अपना चित्र अवश्य लगाता है ताकि सनद और मुहर लगती रहे इन कविताओं और विचारों पर कि ये किसके हैं ! जाने के बाद हम सिर्फ अपने निशान छोड़ सकते हैं , और अगर वे अच्छे और गहरे हों तो अनु की तरह लोग याद करेंगे और आंसुओं के साथ करेंगे  !!  
love you sweet girl  !

Saturday, June 28, 2014

कौन जाने यह विधाता कौन है ? - सतीश सक्सेना

ऐसी दुनियां को बनाता कौन है ?
कौन जाने यह विधाता कौन है ?

इस बुढ़ापे में, नज़र क़ाफ़िर हुई,
वरना ऐसे  गुनगुनाता कौन है ?

इश्क़ की पहचान होनी चाहिए
बे वजह यूँ  मुस्कराता कौन है ?

आपको तो, काफिरों से इश्क है !
वर्ना इनको मुंह लगाता कौन है ?

चाँद की दरियादिली तो देखिये 
रात से भी प्यार करता कौन है ? 

जाके वृन्दावन में,क्यों ढूंढें उन्हें ?   
अब वहां मुरली बजाता कौन है ?

कौन दिन थे जब ठहाके गूंजते थे 
आज अपनों को बुलाता कौन है ?

Tuesday, June 24, 2014

ये ग़ज़ल कैसी रही ? - सतीश सक्सेना

आप को घर से बुलाती , ये ग़ज़ल कैसी रही ?
आंसुओं में झिलमिलाती,ये ग़ज़ल कैसी रही ?

इस उदासी का सबब, कैसे बताएं भीड़ को,
उनकी यादों में तड़पती,ये ग़ज़ल कैसी रही ?

काश उनको भेज दे,अल्लाह इकदिन के लिए
पत्थरों पर सर पटकती, ये ग़ज़ल कैसी रही ?

जा रहे हो छोड़ शायद ,अब हमेशा के लिए ? 
आंसुओं के संग झरती , ये ग़ज़ल कैसी रही  ?

कैसे शायर है जबरिया,तालियां बजवा रहे,
क़दरदानों को रुलाती, ये ग़ज़ल कैसी रही ?

वाहवाही क्यों लुटाते,हर किसी रुखसार पर
खुद मुरीदों को मनाती , ये ग़ज़ल कैसी रही ?

काबा,कंगूरों से चलकर मयकदे के द्वार तक    
मूड पे शायर के मरती, ये ग़ज़ल कैसी रही ?



Friday, June 20, 2014

विदेश जाने में डर..- सतीश सक्सेना

जीवन की आपाधापी में ३६ साल की नौकरी कब पूरी हो गयी,पता ही नहीं चला ! घर की जिम्मेवारियों और बच्चों के लिए साधन जुटाने में, समय के साथ दौड़ते दौड़ते अपने लिए समय निकालना बहुत मुश्किल रहा ! कई बार लगा कि जवानी में जो समय अपने लिए देना चाहिए शायद वह कभी दे ही नहीं पाए ! अक्सर इसका कारण पूर्व नियोजित लक्ष्य,बच्चों के भविष्य,की आवश्यकता पूरा करते करते धन का अभाव रहा अथवा अपने मनोरंजन के लिए आवश्यक हिम्मत और समय ही नहीं जुटा पाए !
बचपन में सुनता था कि जवाहर लाल नेहरु के कपडे पेरिस धुलने जाते थे ! धनाड्य लोगों के किस्से सुनकर उनके आनंद को, हम निम्न मध्यम वर्ग , महसूस कर, खुश हो लेते थे ! उड़ते हवाई जहाज की एक झलक पाने को, खाना छोड़कर छत पर भागते थे कि वह जा रहा है एक चिड़िया जैसा जहाज और फिर अपने सपने समेट कर, चूल्हे के पास आकर, रोटी खाने लगते थे ! उन दिनों उड़ते हवाई जहाज में बैठने की, कल्पना से ही डर लगता था !

पेरिस रेलवे स्टेशन 
गौरव अपनी कंपनी कार्य से, जब जब देश से बाहर गए हर बार उसका अनुरोध रहता कि पापा एक बार आप जरूर आ जाओ विभिन्न देशों की संस्कृति, रहनसहन और खानपान  में  बदलाव आपको अच्छा लगेगा ! हर बार व्यस्तता और छुट्टी न मिलने का बहाना करते हुए मैं, उन्हें असली बात कभी नहीं बता पाता था !

मुख्य कारण दो ही थे, पहला पता नहीं कितना खर्चा कितना होगा और दूसरा विदेशियों के परिवेश में घुलने, मिलने, बात करने में, आत्मविश्वास की कमी ....
और यह भय इतना था कि अगर यूरोप के टिकट अचानक बुक नहीं किये जाते तो शायद मैं अपने जीवन काल में कभी विदेश यात्रा का प्लान नहीं बना पाता !
यह प्रोग्राम अचानक ही बन गया जब नवीन ने वियना से अपने माता पिता के साथ मुझे भी वियना आने का
वेनिस की पानी से लबालब गलियां 
निमंत्रण दिया था ! उसके पत्र मिलने के साथ ही, अप्पाजी ने, अपने साथ साथ मेरा  टिकट भी, मेरे द्वारा कभी हाँ कभी न के बावजूद , बुक करा लिए थे ! उस शाम आफिस से लौटने पर पहली बार लगा कि मैं वाकई यूरोप यात्रा पर जा रहा हूँ ! 
उसके बाद, सफर पर जाने के लिए आवश्यक, बीमा कराया गया ! 15 दिन के इस सफर के लिए, आई सी आई सी आई लोम्बार्ड ने  लगभग ५५०० रुपया लिया था ! इस बीमा के फलस्वरूप हमें बीमारी अथवा किसी अन्य  वजह से होने वाली क्षति का मुआवजा शामिल था !
मगर जब पहली बार, विदेश पंहुच गए तब जाकर पता लगा कि बेबुनियाद भय, आत्मविश्वास को किस कदर कम करता है ! अतः सोचा कि मित्रों में अपना अनुभव अवश्य बांटना चाहिए ताकि ऐसी स्थिति और लोग न महसूस करें !
वियना ट्राम 
अधिकतर मेरे मित्र लगभग हर वर्ष देश भ्रमण पर खासा पैसा खर्च करते हैं मगर विदेश जाने के बारे में प्लानिंग की छोड़िये, अपने घर में इस विषय पर चर्चा भी नहीं करते हैं और यह सब आत्मविश्वास और जानकारी के अभाव के कारण ही होता है !  

स्वारोस्की फैक्ट्री ऑस्ट्रिया 
शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि विदेश जाएँ या न जाएँ मगर हर परिवार के पास पासपोर्ट होना बहुत आवश्यक है, यह एक ऐसा डोक्युमेंट हैं जिसके जरिये भारत सरकार आपके बारे में, यह सर्टिफिकेट देती है कि पासपोर्ट धारक भारतीय नागरिक है तथा इस परिचयपत्र में आपके नाम और पते के अलावा जन्मतिथि,  तथा जन्मस्थान लिखा होता है ! किसी भी देश में प्रवेश करने  की परमीशन(वीसा) के लिए, इसका होना आवश्यक है ! यह कीमती डॉक्यूमेंट आपके घर के पते और जन्मतिथि के साथ आपके परिचय पत्र की तरह भी भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है !
इंटरलेकन, स्विट्ज़रलैंड
यह जानना आवश्यक है कि विदेश यात्रा हेतु , अगर दो माह पहले, किसी भी देश की फ्लाईट टिकिट बुक करायेंगे  तो लगभग आधी कीमत में मिल जाती है ! दिल्ली से पेरिस अथवा स्वित्ज़रलैंड जाने का सामान्य आने जाने का एक टिकट, लगभग ३५ हज़ार का पड़ता है जबकि यही टिकट तत्काल लेने पर ६० हज़ार का आएगा ! सामान्यता एक अच्छा टूरिस्ट होटल ३००० रूपये प्रति दिन में आराम से मिल सकता है !
अगर आपकी ट्रिप ४ दिन की है तो एक आदमी के आने जाने का खर्चा लगभग मय होटल ४५०००.०० तथा भोजन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट  मिलकर ५००००-६०००० रुपया

में ! अगर आप यही ट्रिप किसी अच्छे टूर आपरेटर के जरिये करते हैं तो आपका कुछ भी सिरदर्द नहीं, साल दो साल में  ५० - ६० हज़ार रुपया बचाइए और ४ दिन के लिए पेरिस, मय गाइड घूम कर आइये !

जहाँ तक खर्चे की बात है , हर परिवार में पूरे साल घूमने फिरने और बाहर खाने पर जो खर्चा होता है ,उसमें हर महीने कटौती कर पैसा बचाना शुरू करें तो कुछ समय में ही आधा पैसा बच जायेगा, बाकी का इंतजाम करने में बाधा नहीं आएगी !एक बार विदेश जाने के बाद आपके और बच्चों के आत्मविश्वास में जो बढोतरी आप पायेगे, उसके मुकाबले यह खर्चा कुछ भी नहीं खलेगा ! 
यूनाइटेड नेशंस , जेनेवा
अक्सर हम मरते दम तक अपनी सिक्योरिटी के लिए धन जोड़ते रहते हैं ,और बुढापे में , महसूस होता है कि जीवन में , और भी बहुत कुछ देख सकते थे जो  कर ही नहीं पाये और इतनी जल्दी जीवन की रात हो गयी ! मेरा अपना सिद्धांत है कि बेहद उतार चढ़ाव युक्त जीवन को, जब तक जियेंगे, हँसते मुस्कराते जियेंगे ! एक बात हमेशा याद रखता हूँ कि
  
" न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए ..."
        
विदेश जाकर अच्छी इंग्लिश न बोल पाने के लिए न बिलकुल न डरें , आप वहाँ पंहुच कर पायेंगे कि अधिकतर जगह पर, इंग्लिश जानने वाले बहुत कम हैं ! आपको लगेगा कि आप ही सबसे अच्छी इंग्लिश / अंगरेजी बोलते हैं :-))
जिंदगी जिंदादिली का नाम है !!

Monday, June 16, 2014

उनको द्वारे पे ही अल्लाह याद आएंगे -सतीश सक्सेना

                    एक मित्र के अनुरोध पर, कुछ अलग सा गीत, लोक समर्पित हैं , आशा है लोग अवश्य पसंद करेंगे, गुनगुनाएंगे  !
                             ******************************

हम अगर दिख गए तो याद खुदा आएंगे 
ये तो तय है , वे  मुझे देख के घबराएंगे !

एक अर्से के बाद, दर पे उनके आया हूँ !
देख मुझको, उन्हें अल्लाह याद आएंगे !

काश उस वक़्त,सहारे के लिए हो कोई !
वे मुझे  देख के, हर हाल, लडख़ड़ायेंगे !

वे तो शायद मुझे, पहचान ही नहीं पाएं !
पर इन आँखों से छिने ख्वाब याद आएंगे !

ढाई आखर को उन्हें भूल के आना होगा !
वरना याद आने पे , वे होंठ थरथराएँगे !

Sunday, June 15, 2014

अलंकार,श्रंगार बिना हम दिल की बातें करते हैं ! -सतीश सक्सेना

कविता,ग़ज़ल,उमंग जगाते गीत की बातें करते हैं !
जो मन को छू जाये उसी संगीत की बातें करते हैं !

अम्मा दादी नानी बाबा मुन्नी चाची समझ सकें !
अलंकार,श्रंगार बिना हम दिल की बातें करते हैं !

रोटी,सब्ज़ी,दाल,मलीदा,ताई हाथ से खिला गईं !
माँ से सीखी बोली में, घरबार की बातें करते हैं !

हमको कौन शाबाशी देगा सन्नाटों में चलते  हैं !
कब्रों के संग बैठ  जमीं पर उनसे  बातें करते हैं !

कंगूरों से  रही लड़ाई ,  इंसानों से प्यार किया !
रेगिस्तान में  भूखे प्यासे , माँ की बातें करते हैं !

Wednesday, June 11, 2014

अगर याद ईश्वर की आये, माँ के पैर दबाना सीख ! - सतीश सक्सेना

यह रचना समर्पित है उन  बच्चों को, जो पढना चाहते हैं , मगर ध्यान नहीं लगा पाते , उन्हें चाहिए कि  कछुवा और खरगोश की कहानी ध्यान से समझें , प्रतिद्वंदी की तेजी से बिना घबराए , मुकाबले में , बिना हिम्मत हारे , लगातार मेहनत  करना सीखें , चाहे धीमे ही सही , मगर जीतने का चांस रहेगा !

दुनिया में सम्मान मिलेगा,खूब किताबें पढ़ना सीख !
पुस्तक पढ़ने से पहले ही,भैया ध्यान लगाना सीख !

घरके दरवाजे पर आये,सबसे हंसकर मिलना सीख !
सारे धर्मों का,आदर कर,साथ बैठ कर,खाना सीख !

जो चैलेंज मिलें जीवन में , हँसते हँसते लेना सीख !
बिना रुके,मंजिल पाओगे,कछुवे जैसा चलना सीख !

कड़ी धूप में, बहे पसीना, हार न माने, जीना सीख !
प्रतिद्वंदी फुर्तीला होगा,लेकिन पाँव बढ़ाना सीख !

बुरे समय में बिन घबराये,हँसते हँसते जीना सीख !
अगर याद ईश्वर की आये, माँ के पैर दबाना सीख !

Monday, June 9, 2014

इंतज़ार है, क्षितिज में कबसे, काले, घने, बादलों का

इंतज़ार है ! क्षितिज में कबसे, काले घने, बादलों का !
पृथ्वी, मानव को सिखलाये,सबक जमीं पर रहने का !

गर्म  हवा के लगे, थपेड़े, 
वृक्ष न मिलते राही  को ,
लकड़ी काट उजाड़े जंगल 
अब न रहे ,सुस्ताने को !
ऐसे बिन पानी, छाया के, सीना जलता जननी  का  ! 
रिमझिम की आवाजें सुनने,तडपे जीवन धरती का !

चारो तरफ अग्नि की लपटें
निकलें , मानव यंत्रों   से !
पीने का जल,जहर बनाये   
मानव  अपने  हाथों  से  !
डेली न्यूज़ के सौजन्य से , अच्छा लगता है जब लोग
बिना भेजे, रचना को छपने योग्य समझे !आभार !
मां के गर्भ को खोद के ढूंढे ,लालच होता रत्नों का !
आखिर मां भी,कब तक देगी संग,हमारे कर्मों का !

उसी वृक्ष को काटा हमने   
जिस आँचल में,  सोते थे ! 
पृथ्वी  के आभूषण, बेंचे 
जिनमें  आश्रय  पाते  थे !
मूर्ख मानवों की करनी से, जलता छप्पर धरती का !
आग लगा फिर पानी ढूंढे,करता जतन,  बुझाने का !

जननी पाले बड़े जतन से
फल जल भोजन देती थी !
शुद्ध हवा, पानी के बदले   
हमसे प्यार , चाहती  थी !
दर्द  से तडप रही मां घर में, देखे प्यार मानवों का !
नईं कोंपलें , सहम के देखें , साया मूर्ख मानवों का !

जल से  झरते, झरने सूखे 
नरम मुलायम पत्ते, रूखे 
कोयल की आवाज़ न आये 
जल बिन वृक्ष, खड़े हैं सूखे
यज्ञ हवन के, फल पाने को,  है आवाहन  मेघों का !
हाथ जोड़ कर,बिन पछताये,इंतज़ार बौछारों का !

Saturday, May 31, 2014

रखा तो होगा, तुमने कुछ वरदानों को -सतीश सक्सेना

मूरख जनता चुन लेती धनवानों को !
बाद में रोती, रोटी और मकानों को !

रामलीला मैदान में,भारी भीड़ जुटी,
आस लगाए सुनती, महिमावानों को !

काली दाढ़ी , आँख दबाये , मुस्कायें ,
अब तो जल्दी पंख लगें,अरमानों को !

रक्तबीज  शुक्राचार्यों  के , पनप रहे 
निंदा, नहीं सुनायी देती , कानों को !

दद्दा , ताऊ  कितने, गुमसुम रहते हैं !
जाने कैसी नज़र लगी,खलिहानों को !

अंतिम क्षण हम भी आ पंहुचे द्वारे पर ! 
रखा तो होगा,तुमने कुछ वरदानों को !


नोट :  यह रचना आज जयपुर में छपी , बताने के लिए संतोष त्रिवेदी का आभार 
http://dailynewsnetwork.epapr.in/283149/Daily-news/04-06-2014#page/8/2 

Tuesday, May 27, 2014

अहंकार,अभिमान,को अपना स्वाभिमान बतलाये रखना - सतीश सक्सेना

श्रद्धा, निष्ठा, सत्य, प्रतिष्ठा,का  सम्मान बचाये रखना !
तुम पर गीत लिखे हैं मैंने, इनकी लाज बचाये रहना !

चंचल मन  काबू कर पाना,भी आसान नहीं है,लेकिन !   
अपनी गरिमा औ विश्वासों का सम्मान बचाये रखना !

वेद ऋचाएं सुनते सुनते, बे मतलब की बहस न करना !   
आशय भले समझ न पाओ,तो भी वहम बनाये रखना !

जैसी भी किस्मत लाये थे , सब जीवन बेकार गया पर !
पति पत्नी की जोड़ी सुन्दर, ये आभास दिलाये रखना !

थके हुए नाविक की जैसे,नींद से बोझल होती पलकें ! 
नज़र, दूर से ही आ जाओ, इतने  दीप जलाये रखना !





Monday, May 26, 2014

हमको अपने ताल,समंदर लगतें हैँ -सतीश सक्सेना

हार पहन ये मस्त सिकंदर लगते हैं !
भोले वोटर,सचमुच बन्दर लगते हैं !


और किसी के,रंग रूप से क्या लेना
हमको इनके गाल, चुकंदर लगतें हैं !

कंगूरों को,सर न झुकाया जीवन में !
चंदा , सूरज , घर के अंदर लगते हैं !

भीड़तंत्र का किला,मीडिया ने जीता !
नेताजी अब और , मुछन्दर लगते हैं !

हमें तुम्हारी धन दौलत से क्या लेना, 
हमको अपने ताल, समंदर लगतें हैँ !

Sunday, May 25, 2014

दुनियां वाले कैसे समझें , अग्निशिखा सम्मोहन गीत -सतीश सक्सेना

कलियों ने अक्सर बेचारे
भौंरे  को बदनाम किया !
खूब खेल खेले थे फिर भी  
मौका पा अपमान किया !
किसने शोषण किया अकेले, किसने फुसलाये थे गीत !
किसको बोलें,कौन सुनेगा,कहाँ से हिम्मत लाएं गीत !

अक्सर भोली ही कहलाये
ये सजधज कर रहने वाली !
मगर मनोहर सुंदरता में 
कमजोरी , रहती हैं सारी !
केवल भंवरा ही सुन पाये, वे  धीमे आवाहन  गीत !
दुनियां वाले कैसे समझें, कलियों के सम्मोहन गीत !

स्त्रियश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम
देवो न जानाति कुतो मनुष्यः
शक्तिः एवं सामर्थ्य-निहितः 
व्यग्रस्वभावः , सदा मनुष्यः !
इसी शक्ति की कर्कशता में, पदच्युत रहते पौरुष गीत !
रक्षण पोषण करते फिर भी, निन्दित होते मानव गीत !

नारी से आकर्षित  होकर
पुरुषों ने जीवन पाया है !
कंगन चूड़ी को पहनाकर
मानव ने मधुबन पाया है !
मगर मानवी समझ न पायी, मंजुल मधुर समर्पण गीत !
अधिपति दीवारों का बनके , जीत के हारे पौरुष गीत !

निर्बल होने के कारण ही 
हीन भावना मन में आयी 
सुंदरता  आकर्षक  होकर  
ममता भूल, द्वेष ले आयी 
कड़वी भाषा औ गुस्से का गलत आकलन करते गीत ! 
धोखा खायें सबसे ज्यादा,  अपनी  जान गवाएं गीत !

दीपशिखा में चमक मनोहर
आवाहन  कर, पास बुलाये !
भूखा प्यासा , मूर्ख  पतंगा , 
कहाँ पे आके, प्यास  बुझाये  ! 
शीतल छाया भूले घर की,कहाँ सुनाये जाकर गीत !  
जीवन कैसे आहुति देते , कैसे जलते  परिणय गीत !

 (स्वप्न गीत के लिए )

Thursday, May 22, 2014

अब दुमदार,दलाल मीडिया - सतीश सक्सेना

पहले था , दिग्पाल मीडिया !
अब दुमदार,दलाल मीडिया !

जबसे मुंह में , खून लगा है !
तब से  है,कव्वाल मीडिया !

राजनीति  से,  बकरे  आये  ! 
करता खूब हलाल मीडिया !

एक इलेक्शन, के आने पर ! 
जम के मालामाल मीडिया !

मूरख जनता  को , भरमाये !
रोज बजाये  गाल  मीडिया !

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