Saturday, March 28, 2015

अरविन्द ! कहाँ देश में ईमान मिलेंगे - सतीश सक्सेना

अरविन्द कहाँ देश में  ईमान मिलेंगे 
चेहरा लगाए संत का शैतान मिलेंगे

शुरुआत हुई है बड़े अभिमान मिलेंगे
धनवानों  के भेजे हुए तूफ़ान मिलेंगे 

नाले में आ गये हो ज़रा देखभाल के
चारो ही ओर  बे-ईमान श्वान मिलेंगे 

पागल औ सनकवान तुम्हें खूब कहेंगे 
सारे पढ़े लिखों से,यह प्रमाण मिलेंगे 

आये ये धन कमाने, यहाँ राजनीति में
हर कदम पे ये स्वयंभू भगवान मिलेंगे

बिन फायदे ये लोग, मुस्कराते नहीं है
हर कदम पे तुम्हें बड़े व्यवधान मिलेंगे

धनवान,मीडिया दलाल साथ साथ हैं 
चोरों के देश में  बड़े अपमान मिलेंगे ! 

Friday, March 27, 2015

आम आदमी भी कितने अरमान छिपाए बैठा है - सतीश सक्सेना

आम आदमी भी कितने अरमान छिपाए बैठा है !
बुझती नज़रों में कितने, तूफ़ान छिपाए बैठा है !


धनाभाव भी तोड़ न पाया साहस बूढी सांसों का, 
सीधी साधी आँखों में अभिमान छिपाए बैठा है !

चले गए लोगों के कर्जे कौन अदा कर पाया है !
अपने पुरखों के कितने,अहसान छिपाए बैठा है !

कबसे बुआ नहीं आ पायीं अपने घर में रहने को,
अपने सर पर पापा के भुगतान छिपाए बैठा है !

सावधान होकर सोना, ईर्ष्यालु पडोसी के आगे ,
जाने कितने बरसों के अपमान छिपाए बैठा है !

दुश्मन शांत न सोने देगा , गद्दारों का ध्यान रहे,
हिंदुस्तान के अंदर, पाकिस्तान छिपाए बैठा है !

हल्का नहीं समझ बैरी को,दर्द छिपाकर आया है 
क्या मालूम वो कितने इत्मीनान छिपाए बैठा है !

Thursday, March 26, 2015

व्यास का स्मरण कर ऋगवेद का विस्तार लिख दूँ - सतीश सक्सेना

सहज निर्मल मुस्कराहट से धरा गुलज़ार लिख दूँ !
भव्य मंगलदायिनी को,ईश का वरदान लिख दूँ !

एक दिन उन्मुक्त मन से पास आकर बैठ जाओ 
और बोलो नाम तेरे, स्वर्ग का अध्याय लिख दूँ !

मुक्त निर्झर सी हंसी पर,गर्व पौरुष का मिटा दूँ ,
तुम कहो तो मानिनी,अतृप्त की मनुहार लिख दूँ !

काव्य अंतर्मन हिला दे, शुष्क मानव भावना  में ,
समर्पण संभावना पर इक नया अध्याय लिख दूँ !

यदि तुम्हे विश्वास हो, अनुराग की गहराइयों का ! 
व्यास का स्मरण कर,ऋगवेद का विस्तार लिख दूँ !

Monday, March 23, 2015

कवि का दूँ मैं परिचय क्या - सतीश सक्सेना

लोग पूंछते परिचय मेरा,कवि का दूँ मैं परिचय क्या ?
कलम अर्चना करते आये कायस्थों का परिचय क्या ?


कितना सुख है कमजोरों की, रक्षा में कुछ लोगों को 
मुरझाये अंकुर सहलाती बदली का दूँ परिचय क्या ?

प्यार,नेह, करुणा और ममता, राम  न जाने कहाँ गये 
धर्मध्वजाओं को लहराते विष का दूँ मैं परिचय क्या ?

जिस समाज में जन्म लिया था रहने लायक बचा नहीं
मानव  मांस चबाने वाले , मानव का दूँ परिचय क्या ? 

जहाँ लड़कियां घर से बाहर निकलें सहमीं, सहमीं सी !
धूल भरे माहौल में जन्में काव्यपुरुष का परिचय क्या ?


Thursday, March 19, 2015

राजनीति के अंधे कैसे समझें कष्ट किसानों का -सतीश सक्सेना

बुरे हाल मे  साथ न छोड़ें देंगे साथ किसानों का !
यवतमाळ में पैदल जाकर जानें दर्द किसानों का !

जुड़ा हमारा जीवन गहरा ,भोजन के रखवालों से !
किसी हाल में साथ न छोड़ें,देंगे साथ किसानों का

इन्द्र देव  की पूजा करके, भूख मिटायें मानव की  
राजनीति के अंधे कैसे समझें कष्ट किसानों का !

यदि आभारी नहीं रहेंगे मेहनत और श्रमजीवी के     
मूल्य समझ पाएंगे कैसे इन बिखरे अरमानों का !

चलो किसानों के संग बैठे, जग चेतना जगायेंगे 
सारा देश समझना चाहे कष्ट कीमती जानों का !

Monday, March 16, 2015

निकलो बंद मकानों से जंग लड़ो बेईमानों से - सतीश सक्सेना

निकलो बंद मकानों से, जंग लड़ो बेईमानों से !
सावधान रहना भक्तों के,राष्ट्रभक्ति के गानों से !

बड़ी बड़ी गाडी में घूमें झंडा लगा गुमानों का 
मूर्ख बनी है जनता कबसे खादी के शैतानों से 

चर्बी चढ़ी है गद्दारों को,नोट कमाने निकले हैं 
भारत माँ को खतरा ऐसे,राष्ट्रभक्त हनुमानों से !

राष्ट्रभक्ति से अरबपति, बन बैठे हैं आसानी से
कानों को न सुनाई पड़ता आगे हैं धनवानों से 

खद्दरधारी दीमक सुर में,देशभक्ति का गान करें, 
देश हमारा शर्मिन्दा है,दसलक्खा परिधानों से !

Saturday, March 7, 2015

इन दर्दीली आँखों ने ही थका दिया -सतीश सक्सेना

आज तुम्हारी आँखों ने ही थका दिया
इतनी गहरी आँखों,ने ही थका दिया !

इतनी बात पुरानी, कब तक भूलोगे
इन दर्दीली आँखों ने ही थका दिया !

सदियाँ बीतीं  इंतज़ार  में  केशव के ,   
इन पथरायी आँखों ने ही थका दिया !

पता नहीं मन  कहाँ  तुम्हारा रहता है ,
खोयी खोयी आँखों ने ही थका दिया

छलके आंसू, ऐसे छिपा न पाओगे,
भीगी भीगी आँखों ने ही थका दिया !

Sunday, March 1, 2015

आओ छींटें मारे, रंग के, बुरा न मानो होली है ! - सतीश सक्सेना

नमन करूं , 
गुरु घंटालों के  !
पाँव छुऊँ , 
भूतनियों  के !

राजनीति के मक्कारों ने,धन से खेली  होली है ! 
आओ छींटें मारे रंग के ,  बुरा न मानो होली है !

गुरु है, गुड से 
चेला शक्कर
गुरु के गुरु  
पटाये जाकर  !
गुरुभाई से राज पूंछकर , गुरु की गैया,दुह ली है !
जहाँ मिला मौका देवर ने जम के खेली होली है ! 

घूंघट हटा के 
पैग बनाती ! 
हिंदी खुश हो
नाम कमाती !
पंत मैथिली सम्मुख इसके, अक्सर भरते पानी है !
व्हिस्की और कबाब ने कैसे,हंसके खेली होली है !

जितना  चाहे 
कूड़ा लिख दो !
कुछ ना आये ,
कविता लिख दो

एक पंक्ति में,दो शब्दों की, माला लगती सोणी है !
कवि बैठे हैं माथा पकडे , कविता कैसी होली  है !


कापी कर ले ,
जुगत भिडाले !  
लेखक बनकर   
नाम कमा  ले !

हिंदी में हाइकू लिखमारा,शिकी की गागर फोड़ी है !
गीत छंद की बात भी अब तो,बड़ी पुरानी होली है !  

अधर्म करके  
धर्म सिखाते  
धन पाने के 

कर्म सिखाते 
नज़र बचाके,कैसे उसने,दूध में गोली, घोली है !
खद्दर पहन के नेताओं ने, देश में खेली होली है !

ब्लू लेवल, 

की बोतल आयी !
नई कार ,
बीबी को भायी !
बाबू जी का टूटा चश्मा,माँ  की चप्पल आनी है  !
समय ने, बूढ़े आंसू देखे , छैल छबीली होली है !


Friday, February 27, 2015

बिना जिगर ही जिंदा हैं, हम यार बड़े शर्मिन्दा हैं - सतीश सक्सेना

बिना जिगर हम जिंदा हैं पर यार बड़े शर्मिन्दा हैं !
कितनी बार मरे हैं , लेकिन यार बड़े शर्मिन्दा हैं !

किससे वादे , जीवन भर के ,
किसके हाथों में हाथ दिया !
किसके संग कसमें खायीं थी  
किसके जीवन में साथ दिया
आंसू मनुहार सिसकियों का,अपमान हमारे हाथ हुआ !
हम सब जग के आंसू पोंछें, पर यार बड़े शर्मिन्दा हैं !

उस घोर अँधेरे जंगल में, 
कैसे मनुहारें सिसकी थीं
किसके सपनें बर्वाद हुए
कैसी दर्दीली हिचकी थीं 
किसने माँगा था साथ मेरा,उस समय कदम न उठ पाये !
अब सारी दुनियां जीत चुके , पर यार बड़े शर्मिन्दा हैं !

कितने सपने कितने वादे  
बिन आँखे खोले टूट गए !
कितने गाने कितनी गज़लें 
गाये बिन, हमसे रूठ गए !
मुंह खोल नहीं पाये थे हम, सारे जीवन घुटते ही रहे !
चलना था जब,हम चल न सके,हर राह बड़े शर्मिंदा हैं !

कितना अच्छा होता यदि हम 
मिलते ही नहीं इस बस्ती में !
कितना अच्छा होता यदि हम  
हँसते ही नहीं, उस मस्ती में !
उस राह दिखाने वाले को,हमने ही अकेला छोड़ दिया !
खुद ही घायल करके खुद को,हम यार बड़े शर्मिन्दा हैं !

कितनी नदियां धीरे धीरे 
कैसे नालों में बदल गयीं !
जलधाराएं मीठे जल की  
कैसे खारों में बदल गयीं !
अपने घर आग लगा हँसते,कहते हैं अभी हम ज़िंदा हैं !
पूंछो न अभी क्यों जिन्दा हैं , पर यार बड़े शर्मिंदा हैं !

Wednesday, February 11, 2015

मफलर की आँखें - सतीश सक्सेना

अरविन्द का उदय , इस देश की भोले जनमानस में , ठंडी हवा के संचार का सूचक है ! जिस जनमानस पर अब तक सिर्फ श्वेतवस्त्र धारी राजनैतिक बदबूदार मदारियों का राज था वहां पर एक साधारण व्यक्ति के ईमानदार क़दमों की आहट पर आम जनता का विश्वास होना, एक सुखद सवेरे का आगमन जैसा लगता है !अरविन्द के आश्वासन पर, राजनैतिक लुटेरों और झंडों से बारबार धोखा खाए लोगों का विश्वास जगा है और उन्हें लगा है कि यह व्यक्ति बेईमान नहीं है !

 साधारण अशिक्षित ग्रामीण जनमानस, भारतीय गृहणियां, जो मनोरंजन  तथा ख़बरों के लिए सिर्फ लालची टेलीविजन  मीडिया पर निर्भर हैं तथा अपने कामों के लिए राजनीतिक धूर्तों और मदारियों के ऊपर भरोसा करने को मज़बूर हैं ! देश की ७० प्रतिशत से अधिक जनता शायद ही कभी किसी सरकारी दफ्तर में जाने की हिम्मत कर पायी होगी वे अपने कार्यों के लिए दलालों और इन राजनैतिक छुटभैयों की जान पहचान पर फख्र महसूस करते हैं और यह सोंचते हैं कि हमारे काम भी हो ही जाएंगे ! राशन कार्ड बनाने, बिजली वालों के सामने गिड़गिड़ाते, इन लोगों के
पास पैसे देकर , काम कराने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है !

हमारे  देश में अपने राजनेताओं  के पास जाने का मतलब ही  "काम " का हो जाना होता है , ९० % मामलों में बच्चों की नौकरियां, राजनीतिज्ञों के दलालों को पैसे देकर ही लगती हैं बशर्ते दलाल सही जगह ( साहब के पास ) पैसे पंहुचा दे !  राज्य सरकार की नगर पालिकाओं, सरकारी स्कूलों , लेखपालों , कंडक्टरों , ड्राइवरों, पुलिस में सिपाहियों और हवलदारों की भर्ती , रेलवे भर्ती बोर्ड  आदि की नौकरियों पर खद्दर धारियों की चेयरमैन शिप का कब्ज़ा है ! सरकारी नौकरियों में  हेराफेरी सबको पता है मगर कहीं कोई विद्रोह की आवाज नहीं सुनायीं पड़ती, सरकारी महकमों में बच्चों की नौकरी लगने की उम्मीद अखबारों के नुमाइंदों का मुंह भी बंद रखने में कामयाब है !

४५ वर्ष से ऊपर के लोग अधिकतर इस गुलाम विचारधारा को बढ़ाने के दोषी हैं , इन कमज़ोर और संकीर्ण दिमाग व्यक्तियों  का अपने घर में शक्तिशाली होने का अहसास होने के लिए , किसी नेता का पिट्ठू बनना आसान होता है उसके बाद यह चमचे अक्सर अपनी पीठ पर ताउम्र उस राजनैतिक पार्टी का नाम लिखाये फख्र महसूस करते घूमते रहते हैं ! इनका अपना कोई
व्यक्तित्व नहीं , यह सिर्फ अपने गुरुओं की विचारधारा के गुलाम हैं जो देश में नफरत फैलाने के दोषी हैं ! धर्म और आस्था के नाम पर , दूसरों के प्रति नफरत फैलाकर , भेंड़ बकरियों की भीड़ को अपनी पार्टी की तरफ हांकना और उन्हें सुरक्षा देने का वायदा दिलाने के कार्य, इस देश के पढेलिखे नवयुवक पहचानने लगे हैं और इसे रोकने के लिए कटिवद्ध हैं !
इस देश में सामान्य जन का विश्वास बेहद आहत हुआ है , त्रस्त और अशिक्षित जनता अपनी स्थिति में कुछ बदलाव लाने के लिए हर जगह जाने और सीखने के लिए तैयार रहती है , बाबा कामदेव , बापू विश्वासराम , साईं और साध्वियों  के समागमों के नाम पर लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी , आशान्वित आँखों से ताकते यह श्रद्धालु अपने बनाये हर गुरू द्वारा बुरी तरह लुटे और ठगे गए , इनके चढ़ावों से और आस्था स्वरुप हर गुरु ने हज़ारों लाखों करोड़ कमाए और देश की जनता को कालाधन बापस लाने का वायदा और राष्ट्रभक्त बनाने की ओजस्वी प्ररेणा दी  !

    
शुक्र है पढ़े लिखे नवजवानों की नयी पीढ़ी का कि वे लालची नहीं है वे मेहनत कर धन कमाने पर विश्वास रखते हैं, धर्म, कर्म, पाप, पुण्य , पाखण्ड दिखावे से बहुत दूर यह बच्चे एक सुखद संकेत हैं एवं अपने बड़ों की मानसिकता में परिवर्तन लाने को कटिवद्ध हैं !  
लगता है आने वाले समय में और इन लड़के लड़कियों में से बहुत सारे अरविन्द जन्म लेंगे, यह सुखद संकेत ,देश में नया बदलाव लाने में समर्थ होगा ! अब मफलर, दसलखा सूटों को पहचान चुका है इसीलिए बाकी काम अधिक आसान हो जाएगा ! निस्संदेह आने वाला समय,  इस देश की भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के लिए बेहद बुरा काल होगा, उन्हें अपने कर्मों का फल भुगतना ही होगा मगर नवनेताओं को इन गिरगिटों से सावधान रहना होगा !


ये नेता रहे तो , वतन  बेंच देंगे !
ये पुरखों के सारे जतन बेंच देंगे

कुबेरों का कर्जा लिए शीश पर ये 
अगर बस चले तो सदन बेंच देंगे

नए राज भक्तों की इन तालियों
के,नशे में ये भारतरतन बेंच देंगे

मान्यवर बने हैं करोड़ों लुटाकर
उगाही में, सारा वतन बेंच देंगे ! - सतीश सक्सेना 

Friday, February 6, 2015

"आज गांधी होते तो वे भी भारत की स्थिति देख दहल जाते " - सतीश सक्सेना

"अगर हम तुम्हें , बिन मुखौटे के पाते ! 
असल देखकर बस, दहल ही तो जाते " - सतीश सक्सेना 

"आज गांधी होते तो वे भी भारत की स्थिति देख दहल जाते , बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता पर अगर भारतीय सोंच न बदली तो हाथ कुछ नहीं आएगा !" दुनियां के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति ओबामा के इस कथन पर भ्रष्ट भारतीय मीडिया को, विचार करने का समय ही नहीं है !
आखिर विश्वनेताओं को भी , बिना पाकिस्तानी प्रयत्नों के, भारतीय जन प्रतिनिधियों के असली चेहरे की पहचान हो ही गयी, अमेरिका स्थापित विश्व नेता है इसमें कोई संदेह नहीं ! सुरक्षापरिषद में स्थायी सदस्यता के लिए अमेरिका का मुंह ताकते भारत को , अपनी सोंच में आमूल चूल परिवर्तन बगैर यह सपना, सिर्फ सपना ही रहेगा  अब यह तय है !
अल्पसंख्यक जनता को बदनाम करके, अपने ही देश में भय का वातावरण पैदा करके , अनपढ़ बहुसंख्यक भीड़ से सुरक्षित समर्थन हासिल करने की चेष्टा , देर सवेर अंतराष्ट्रीय जगत में भारत का मखौल उड़वाएगी !

कट्टर विचारधाराओं  द्वारा, अपने ही देश में,पैदा अल्पसंख्यक भारतीय बच्चों पर शक कर, उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनाने का षड़यंत्र , भारत की विदेश नीति को  बहुत मंहगा पडेगा ! लगातार झूठ बोलकर , जोर जोर से गाल बजाने , घटिया शब्दों का प्रयोग कर, औरों का अपमान करने की राजनीति अधिक देर एक नहीं टिक पायेगी ! २० -३० प्रतिशत अल्पसंख्यक जनता  को तुम कोने में धकेल नहीं पाओगे ,यह समझने में इन मूर्खों को बहुत समय लगेगा !

मूरख जनता चुन लेती धनवानों को !
बाद में रोती, रोटी और मकानों को !
रामलीला मैदान में,भारी भीड़ जुटी,
आस लगाए सुनती, महिमावानों को !
काली दाढ़ी , आँख दबाये , मुस्कायें ,
अब तो जल्दी पंख लगें,अरमानों को ! - सतीश सक्सेना 

और यह सड़ी गली समझ ५० वर्ष से ऊपर के उम्रदराज भ्रष्ट लोगों की है , संतोष की बात यह है कि इस देश के बच्चों और नवयुवकों , जो दुनियां की सबसे बड़े  पढ़े लिखे समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं,  के लिए जाति  विरादरी का इक्कीसवीं शताब्दी में अब कोई महत्व नहीं है ! इन्हीं नवयुवको को आगे  आकर,अपने ही घर के बूढ़ों की अविश्वास की नीति और सुने सुनाये किस्से कहानियों से ध्यान हटाना होगा !

मूर्खों अनपढ़ों की भीड़ आसानी से अफवाहों पर भरोसा ही नहीं करती बल्कि उसे फैलाने में अपना योगदान भी करती है ! राजनितिक पार्टियों ने सामाजिक भय और आस्था को जमकर भुनाया है और इसमें घी डालने का कार्य, मीडिया ने करते हुए, जम कर नोट कमाए ! सरकार असहाय सी इसमें बहती रही  ! नेताओं के पास ऐसा कुछ भी तो नहीं जिसके कारण उसे वोट मिल सकें ! भागो भागो भेड़िया आया , और भाग कर एक जुट हो जाओ हम उस भेड़िये से पहले से ही आगाह करते रहे हैं अतः हमें वोट दो !
बस्स्स , जीत गए लच्छेदार जोरदार सपने दिखाने वाले  मदारी , उनका ढोल बजबाने के लिए, मीडिया को खरीदने के लिए कुबेर तैयार पहले ही थे सो यह काम और भी आसानी से हो गया !

इन दिनों सारे भांड, एवं राजनैतिक दलाल अपने आपको राष्ट्रभक्त कहने लगे , ऐसा लगने लगा जैसे देश किसी युद्ध स्थिति से गुजर रहा है , और सिर्फ एक विचारधारा के लोग ही राष्ट्रभक्त और जो उनका साथ नहीं दे रहे वे सब चोर हैं ! इन स्वयंभू देशभक्तों  को पहचानना, इस देश के सम्मान  की रक्षा में, सबसे बड़ी आवश्यकता है !

अनपढ़ों के वोट से , बरसीं घटायें  इन दिनों !
साधू सन्यासी भी आ मूरख बनाएँ इन दिनों !

झूठ, मक्कारी, मदारी और धन के जोर पर ,  
कैसे कैसे लोग भी , योद्धा कहायें इन दिनों !

देखते ही देखते सरदार को , रुखसत किया ,
बंदरों ने सीख लीं कितनी कलायें इन दिनों ! - सतीश सक्सेना 

आज देश में जनप्रतिनिधि सबसे अधिक बेईमान  हैं , जो बच्चा १०वींं , १२ वीं क्लास बड़ी मुश्किल में पास होता हो , उस निकम्मे और नालायक को आम तौर पर राजनीति में भेजा जाता था , वह पहले किसी बड़े नेता की छत्रछाया में उसका भक्त बन जाता था , और धीरे धीरे ५ -१० वर्ष में पार्षद , या किसी कमेटी का मेंबर बनकर लोगों के काम कराने योग्य हो जाता था ! जल्दी ही यह छुटभैया किसी लाल बत्ती धारक के संपर्क में आकर उसकी दलाली कर, जनता ( बिजिनिस मैन ) के काम कराना शुरू कर नोट कमाना सीख जाता है  ! इसका अगला प्रोमोशन एमएलए का टिकट लेना होता है और यह काम बड़े नेताओं को खुश करके आसानी से होता है ! बूढ़े चिकने चुपड़े चेहरे वाले , सफ़ेद भक्क  खादी धारी नेता जी को "खुस" करने की लिस्ट काफी घृणित है उसे यहाँ चर्चा करना भी उचित नहीं है !

ये नेता रहे तो , वतन  बेंच देंगे !
ये पुरखों के सारे जतन बेंच देंगे


कुबेरों का कर्जा लिए शीश पर ये 
अगर बस चले तो सदन बेंच देंगे

नए राज भक्तों की इन तालियों
के,नशे में ये भारतरतन बेंच देंगे

मान्यवर बने हैं करोड़ों लुटाकर
उगाही में, सारा वतन बेंच देंगे ! - सतीश सक्सेना 

इस प्रकार देश के कर्णधार बनते हैं, जो हमारे नीति निर्धारक और भाग्य विधाता हैं , ऐसे में अरविन्द केजरीवाल का उदय इस देश में नयी आशा का संचार है ! इसमें संदेह नहीं कि अरविन्द के सभी साथी ईमानदार नहीं हो सकते मगर अनुभव की कमी और कुछ मूर्खताओं के बावजूद तमाम लोगों को साथ लेकर चलना अरविन्द की मजबूरी है ! यह स्थिति युवाओं के आगे आने से सुधरेगी , हर हालत में सड़े विचारों और उम्रदराजों की सोंच  से  पीछा छुटाना होगा , पर विश्वास यही है कि  यह दुबला पतला योगी हार नहीं मानने वाला .... 

ठट्ठा, मज़ाक, उपहास और 
अपमान हुआ है गांधी का !
चोरों, मक्कारों के  द्वारा   
अवमान हुआ है,आंधी का !
राजा,कुबेर,भ्रष्टाचारी , सब एक मंच पर पंहुच गए !
जनता, मूरख बन हारी है ,विश्वास नहीं हारा होगा ! 
संसद से चोर भगाने को,
लड़ना होगा धनवानों से
ईमानदार  युग लाने को  
पिटना होगा बेईमानों से
सारी शक्तियां एकजुट हों,योगी पर ताली बजा रहीं !
थप्पड़ ,घूँसा ,अपमानों से ,  ईमान नहीं हारा होगा !
यह उम्मीद करता हूँ कि हमारी भोली जनता में इन भ्रष्ट  राजनेताओं को पहचानने की नयी शक्ति विकसित होगी  और वोट देने के अधिकार का सदुपयोग होगा  !
http://satish-saxena.blogspot.in/2014/11/blog-post_23.html

Thursday, February 5, 2015

हिन्दु मुसलमानों से , अंशदान चाहिए - सतीश सक्सेना

समस्त राजनीति, स्व 
समृद्धि हेतु बिक चुकी 
समस्त बुद्धि देश की 
दिवालिया सी हो चुकी
हिन्दु  मुसलमानों से , अंशदान  चाहिए !
शुद्ध, सत्यनिष्ठ, मुक्त  आसमान चाहिए !

चाटुकार भांड यहाँ 
राष्ट्र भक्त बन गए !
देश के दलाल सब 
खैरख्वाह बन गए !
चोर बेईमान सब, ध्वजा उठा के चल पड़े !
तालिबानी  देश में , कबीर  ज्ञान चाहिए !

अकर्मण्य बस्तियां 
शराब के प्रभाव में !
खनखनातीं थैलियां 
चुनाव के प्रवाह में ! 
बस्तियों के जोश में,उमंग नयी आ गयी !
मानसिक अपंग देश, बोध ज्ञान चाहिए !

निस्सहाय, दीन और 
निरक्षरों में रंज क्या ?
राजकाज कौन करे , 
इससे सरोकार क्या ?
तालियां बजायेंगे, जहाँपनाह जो कहें !
सौ करोड़ भीड़ को,रथी महान चाहिए !

धूर्तमान के लिए 
अभूतपूर्व साथ है !
धन अभाव के लिए  
महा कुबेर साथ हैं ! 
महान देश के लिए,महारथी तो मिल गया !
जाहिलों को, देव भी , दैदीप्यमान चाहिए !

यही समय दुरुस्त है 
निरक्षरों को लूट लें !
विदेशियों से छीन के 
ये राज्यभक्त लूट लें !
दाढ़ियों को मंत्रमुग्ध , मूर्ख तंत्र, सुन रहा !
समग्र मूर्ख शक्ति को, विचारवान चाहिए !


चेतना कहाँ से आये 
जातियों के, देश में 
बुरी तरह से बंट  चुके 
विभाजितों के देश में 
प्यार की जगह जमीं पै नफरतों को  पालते !
गधों के इस समाज में , विवेकवान चाहिए !

धर्मोन्मत्त देश में , 
असभ्य एक चाहिए 
असाधुओं से न डरे 
अशिष्ट एक चाहिए
सड़ी गली परम्परा में ,अग्निदान चाहिए !
अपाहिजों के देश में, कोचवान चाहिये !

Friday, January 30, 2015

पापा के कन्धों पर चढ़कर, हमने रावण गिरते देखा - सतीश सक्सेना

पापा के कन्धों पै चढ़के
चन्दा तारे सम्मुख देखे !
उतना ऊंचे बैठे  हमने,
सारे रंग , सुनहरे  देखे !
उस दिन हमने सबसे पहले, अन्यायी को मरते देखा !
शक्तिपुरुष के कंधे चढ़ कर हमने रावण गिरते देखा !

उनके बाल पकड़कर मुझको 
सारी बस्ती बौनी लगती !
गली की काली बिल्ली कैसे 
हमको औनी पौनी लगती
भव्य कथा वर्णन था प्रभु का, जग को हर्षित होते देखा !
हमने उनके कन्धों चढ़ कर, राक्षस राज तड़पते  देखा !


दुनियां का मेला दिखलाने
मुझको सर ऊपर बिठलाया
सबसे ज्यादा प्यार इसी से,
दुनियां वालों को दिखलाया
एक हाथ में चन्दा उसदिन, औ दूजे में सूरज देखा !
बड़ी शान से हँसते हँसते,हमने अम्बर चिढ़ते देखा ! 

असुरक्षा की ढही दीवारें,
जब वे मेरे  साथ खड़े थे
छड़ी जादुई साथ हमेशा
जब वे मेरे पास रहे थे !
पिता के कन्धों चढ़कर मैंने , जैसे  गूंगे का गुड देखा !
दुनियां वालों ने बेटी को, खुश  हो विह्वल होते देखा !

मेला, मंदिर,गुड़ियाँ लेकर 
काश पिता बापस मिल जाएँ
सारे पुण्यों का फल लेकर
काश दुबारा  से दिख जाएँ 
व्यथा वेदना वैदेही की, नज़र न आयी थी दुनियां को !
जब जब आँख भरी थी मेरी उनको सम्मुख बैठे देखा !

  


Wednesday, January 21, 2015

शुभी -सतीश सक्सेना

                       यह बाल कविता मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण है अपने परिवार में , 24 -25 वर्ष पहले, अपने बड़ों को यह सबूत देने को कि मुझे वाकई कविता लिखनी आती है ,सामने खेलती हुई, नन्ही शुभी (कृति )को देख , उसके बचपन का चित्र खींचा था !!   

छोटी हैं, शैतान बड़ी हैं, सबक सिखाएं प्यार का ! 
हाल न जाने क्यों होना है,शुभी की ससुराल का !

दिखने में तो छोटी हैं ,
लेकिन बड़ी सयानी हैं ! 
कद काठी में भारी भरकम
माँ , की राज दुलारी हैं !
नखरे राजकुमारी जैसे 
इनकी मस्ती के क्या कहने 
एक पैर पापा के घर में 
एक पैर ननिहाल है !
दोनों परिवारों में यह,अधिकार जमाये प्यार का !
हाल न जाने क्यों होना है, शुभी की ससुराल का !

चुगली करने में माहिर हैं 

झगडा  करना ठीक नहीं 
जब चाहें शिल्पी अन्नू को
पापा  से पिटवाती हैं  !
सेहत अपनी माँ जैसी है 
भारी भरकम बिल्ली जैसी 
जहाँ पै देखें दूध मलाई 
लार  वहीँ टपकाती हैं 
सुबह को हलवा,शाम को अंडा,रात को पीना दूध का !
हाल न जाने क्यों होना है , शुभी की ससुराल का  !

सारे हलवाई पहचाने 

मोटा गाहक इनको माने 
एक राज की बात बताऊँ 
इस सेहत का राज सुनाऊं 
सुबह शाम रबड़ी रसगुल्ला 
ढाई किलो दूध का पीना 
रबड़ी और मलाई ऊपर 
देसी  घी पी  जाती हैं !
नानी दुबली होती  जातीं ,  देख के खर्चा दूध का  !
हाल न जाने क्यों होना है , शुभी की ससुराल का !

आस पास के मामा नाना 

इनको गोद खिलाने आयें
बाते सुनने इनकी अक्सर  
अपने घर बुलवायीं जाए  
तभी भी शुभी प्यारी हैं 
सबकी राज दुलारी हैं !
मीठी मीठी बाते कहकर 
सबका मन बहलाती हैं !
खुशियों का अहसास दिलाये,किस्सा राजकुमारी का ! 
हाल न जाने क्या होना है , शुभी  की ससुराल  का  ! 

Thursday, January 15, 2015

साधू सबक सिखाने निकले, यही बड़ी हैरानी है - सतीश सक्सेना

बाबाओं के पास न जाएँ , गर यह गाय बचानी है !
गौ-माता की सेवा करके , जनता मूर्ख बनानी है !

पिछली पीढी को समझाने,कौन समय बर्वाद करे,
नन्हों को अनुराग सिखाने को ही कलम उठानी है !

कमी नहीं रिश्ते नातों में , केवल नज़रें बदली  हैं ,
पापा की तो ससुरी लगती,मगर वो मेरी नानी है !

सुख,दुःख सिक्के के पहलू हैं,दोनों संग निभाएंगे
जीयें  भोगेंगे तब तक ही,जब तक दाना पानी है !

धर्म के झंडे लिए घूमते, झाग निकलते ओंठों से,
साधू सबक सिखाने निकले, यही बड़ी हैरानी है !

Monday, January 5, 2015

संदिग्ध नज़र,जाने कैसे ,माधुर्य सहज भाषाओं का - सतीश सक्सेना

कैसे करते आसानी से अनुवाद गीत , भाषाओँ का !
संवेदनशील भावना से, संवाद विषम भाषाओँ का !

झन्नाटेदार शब्द निकलें,जब झाग निकलते होंठों से,
ये शब्द वेदना क्या जानें, अरमान क्रूर भाषाओं का !

सावन का अंधा क्या जानें , जीवन स्नेहिल रंगों को      
संदिग्ध नज़र,जाने कैसे,माधुर्य सहज भाषाओं का !

अपने जैसा ही समझा है सारी दुनियां को कुटिलों ने    
ये शब्द समर्पण न जानें,अभिमान हठी भाषाओं का !

आस्था, श्रद्धा, विश्वास कहाँ, उम्मीद लगाकर बैठे हैं,
भावनाशून्य कैसे समझें,विश्वास सरल भाषाओं का !

Wednesday, December 24, 2014

सनम सुलाने तुम्हें, हमारे गीत ढूंढते आएंगे - सतीश सक्सेना

आदरणीय ध्रुव गुप्त की दो पंक्तियाँ इस रचना के लिए प्रेरणा बनी हैं , उनको प्रणाम करते हुए ……  

यदि रूठोगे कहीं, तुम्हें हम रोज मनाने आएंगे
चाहा सिर्फ तुम्हीं को हमने,रोज बताने आएंगे !

इतने से ही दर्द में कैसे , आँखों में आंसू आये !
तुम्हें रोकने अभी राह में, और ठिकाने आएंगे !

याद न करना मुझको,वरना हौले हौले रातों के 
अनचाहे सपनों में,अक्सर खूब सताने आएंगे !

सुना, चाँदनी रातों में तुम भूखे ही सो जाते हो
लिए पुरानी यादें तुमको संग खिलाने आयेंगे !

कैसे निंदिया खो बैठे हो, यादों के उजियारे में  
सनम सुलाने तुम्हें, हमारे गीत ढूंढते आएंगे !

ऐसे कैसे तड़प उठे हो,इतनी सी तकलीफों में
अभी तो रोने के कितने ही और बहाने आयेंगे !

कैसे जीतें,जलने वाले,दिल में पंहुच न पायेंगे, 
जितना काटो बांस, नए हो हरे सामने आएंगे !

Tuesday, December 23, 2014

बातें, सबक सिखाने की - सतीश सक्सेना

ऐंठ छोड़िये, बातें करिये, जीने और जिलाने की ! 
अंतिम वक्त भुलाये बैठे,बातें सबक सिखाने की !

चंदा, सूरज,तारे हम पर , नज़र लगाए रहते हैं !
कैसे जान खैरियत पायें,साकी औ मयखाने की !

रोज सुबह तौबा कर लेते अब न हाथ लगाएंगे 
और शाम को बातें करते पीने और पिलाने की !

रंज भुलाकर साथ बैठकर,हँसते,खाते, पीते हैं !
यहाँ न ऐसी बातें होती , रोने और रुलाने की ! 

इश्क़,बेरुखी,रोने धोने , से भी कुछ आगे आयें  
कर न पायीं बातें ग़ज़लें , हंसने और हंसाने की !

Thursday, December 18, 2014

इस्लाम की छाती पे , ये निशान रहेंगे - सतीश सक्सेना

कातिल मनाएं जश्न,भले अपनी जीत का 
इस्लाम  की छाती पे , ये निशान  रहेंगे !

इस्लाम के बच्चों का खून,उनकी जमीं पर 
रिश्तों की बुनावट पे,  हम आघात  कहेंगे !

दुनियां का धरम पर से ,भरोसा चला गया  !
इन दुधमुंहों  के रक्त  को , हम याद रखेंगे !

महसूद, ओसामा  के नाम,अमिट हो गए 
ये ज़ुल्म ऐ तालिबान , लोग याद  रखेंगे  !

जब भी निशान ऐ खून, तुम्हे याद आयेंगे
इंसानियत  के अश्क़ भी  सोने नहीं  देंगे ! 

Sunday, December 7, 2014

तुम मुझे क्या दोगे - सतीश सक्सेना

समय प्रदूषित लेकर आये , क्या दोगे ?
कालचक्र विकराल,तुम मुझे क्या दोगे ?

दैत्य , शेर , सम्राट   
ऐंठ कर , चले गए !
शक्तिपुरुष बलवान
गर्व कर  चले गए ! 
मैं हूँ प्रकृति प्रवाह, तुम मुझे क्या दोगे ?  
हँसता काल विशाल,तुम मुझे क्या दोगे ?

मैं था ललित प्रवाह 
स्वच्छ जल गंगे का 
भागीरथ के समय 
बही, शिव गंगे का !
किया प्रदूषित स्वयं,वायु, जल, वृक्षों को ?
कालिदास संतान ! तुम मुझे  क्या  दोगे ?

अपनी तुच्छ ताकतों 
का अभिमान लिए !
प्रकृति साधनों का 
समग्र अपमान किये  
करते खुद विध्वंस, प्रकृति संसाधन के !
धूर्त मानसिक ज्ञान,तुम मुझे क्या दोगे !

विस्तृत बुरे प्रयोग 
ज्ञान संसाधन  के  !
शिथिल मानवी अंग
बिना उपयोगों  के !
खंडित वातावरण, प्रभामण्डल  बिखरा ,
दुखद संक्रमण काल,तुम मुझे क्या दोगे !

यन्त्रमानवी बुद्धि , 
नष्ट कर क्षमता को,
कर देगी बर्वाद ,
मानवी प्रभुता को !
कृत्रिम मानव ज्ञान, धुंध मानवता पर !
अंधकार विकराल,तुम मुझे क्या दोगे !

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