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| उल्टा पेपर, गैर भाषा, पढ़ रहे विद्वान् हैं |
और हम लोग फिर इंतज़ार करते रहते कि अब हमारे घर भी नोट बरसेंगे..
मानव जीवन में, पौराणिक काल से लेकर आजतक , कोई काल ऐसा नहीं हुआ जहाँ वे बुरे काम नहीं हुए जो इस समय हो रहे हैं , फर्क केवल संचार साधनों का है जो उस समय नहीं पाए जाते थे और बेईमानियाँ , चोरी , काम लोलुपता आदि आसानी से सामाजिक भय के कारण छिपी रह जाती थीं .
अख़बारों में, आधुनिक स्कूलों में पढ़े लेखक, जिन्हें सुदूर गाँव, सूबों की सामंत शाही , राजशाही के बारे में रंच मात्र भी पता नहीं ,शहरी वातावरण में अपने गाल बजाते रहते हैं ! जिन ख़बरों पर मिडिया अपने दर्शक बटोरने के लिए दिन रात भोंपू बजाती रहती है , सदियों से, ऎसी करोड़ों ख़बरें, बदनामी भय के आतंक तले, घुट कर दम तोडती रही हैं , इसका अंदाजा किसे है ! मानव की राक्षसी शक्ति बढाने की अपरिमित इच्छा एवं शारीरिक भूख की मांग को न दबाया जा सका है और न कोई दबा पायेगा !
मानव ईमानदारी संभव ही नहीं है , हर एक के मन में लालच है फर्क केवल लालच की मात्रा का और मौके का है जिसे मौका नहीं मिल सका वह मजबूरी में ईमानदार है और बना भी रहेगा जब तक उसे जुगाड़ से कुछ अतिरिक्त धन न मिल जाए !
बताइये, आपके जीवन में आये लोग कितने ईमानदार हैं जो केवल अपनी सही आय पर गुज़ारा करते हैं ? इनमें से हर आदमी ने अपनी आय बढाने के तरीके निकाले हुए हैं !
इन सबके करप्शन पर पूरा एक लेख लिखा जा सकता है जिसे पढ़ कर आप भौचक्के रह जायेंगे ! हम दूसरों की बेईमानी जानकार चकित होते हैं और अपनी किसी को बताते नहीं ! अगर आपको यह लगे कि इस कार्य में कोई ऊपरी आमदनी नहीं है तो यह सिर्फ आपकी उस काम के प्रति अज्ञानता होगी और कुछ नहीं !
-काम वाली
-सड़क पर झाड़ू लगाने वाला
-रिक्शे वाला
-दूकान दार
-सब्जी वाला, फेरी वाला ,कबाड़ी वाला ,दूध वाला , पेपरवाला ,टैक्सी वाला ,हलवाई
-पंडित जी ,जागरण वाले लोग , मंदिर
-भिखारी
- सरकारी विभाग के कर्मचारी
-लाला के यहाँ कार्यरत लोग
-सरकार के कुछ ईमानदार (डरपोक )अधिकारी जिनके घरों में नौकर और गाड़ी व्स अन्य अवैध सरकारी सुविधाएँ होती हैं !
-गुरु जन एवं शैक्षिक संस्थाएं
-डॉक्टर
-घर बनाने वाले मिस्त्री और मजदूर
-होली दीवाली अपने फायदे के लिए गिफ्ट ( रिश्वत ) बंटते / लेते, हम सब लोग
-घर के बाहर आसानी से कूड़ा फेंकते, थूकते हम सब
और एक शब्द जो हम सब घरों में आम है, वह है ...
इससे हमें क्या फायदा ?
हम लालची लोग जब तक अपना फायदा नहीं देखते, कुछ नहीं करते , यही भ्रष्टाचार है !
मैंने अक्सर, अनजान लोगों को बिपत्ति में, अपना खून देते समय, अस्पताल के गेट पर छोड़ने आते, ऊपर से कृतज्ञ रिश्तेदारों के चेहरे पर राहत का, सुकून देखा है कि चलो एक मुर्गा तो फंसा और मैं इन लालची गरीबों पर दया खाते हुए, संतोष पूर्वक ब्लड बैंक से बाहर आता हूँ !
ये अपने जीवनसाथियों को मृत्यु आसन्न पाकर भी, अपना खून तक नहीं देते और चले हैं दूसरों का भ्रष्टाचार रोकने !






