Saturday, June 27, 2015

डूबती हिंदी बिचारी और हम बेबस खड़े - सतीश सक्सेना

भाषा सहोदरी पत्रिका के लिए हिंदी पर लिखने का अनुरोध पाकर उलझन में हूँ,  मैं हिंदी विद्वान नहीं हूँ और न इस कष्टकारक और नीरस विषय पर लिखने में सिद्धहस्त मगर आपका अनुरोध टाला भी नहीं जा सकता अतः एक कवि होने के नाते हिंदी की दुर्दशा और कारणों का विश्लेषण अपनी अल्प बुद्धि अनुसार करना चाहूँगा !
आज कवि और साहित्यकार धन ,नाम और पुरस्कारों के लालच में भांड होकर रह गए हैं , प्रभावी लोगों के पैर चाटते हुए कवि और लेखक अब प्यार ,स्नेह,समाज सुधार पर नहीं लिखते, बल्कि धन कमाने के लिए बेहद आवश्यक अपने प्रभामंडल विस्तार के लिए, अख़बारों पत्रिकाओं में छपने के लिए लिखते हैं ! 
आज के समय में साहित्यकारों को समझाना होगा कि धन और प्रशंसा के लालच में उनकी  भावनाएँ समाप्त हो गयीं हैं अतः अनपढ़ और सामान्य जन से उनकी रचना बहुत दूर चली गयी है , अब उनकी रचनाएं जनमानस पर प्रभाव छोड़ पाने में असमर्थ हैं और वे सिर्फ महत्वपूर्ण पदों पर बैठे, हिंदी के मशहूर टटपूंजी ठाकुरों के, आशीर्वाद की अभिलाषी रहती हैं !
प्रभावी भाव अभिव्यक्ति के लिए रचनाकार की ईमानदारी व मधुर कोमल भावनाएं सर्वाधिक प्रभावी भूमिका निभाती हैं , जो बनावटी रचनाकारों में दूर दूर तक नहीं मिलतीं अतः उनके सृजन में व्यावसायिक छाप और नीरसता नज़र आना निश्चित है ! हिंदी के ज़रिये नाम व धन कमाने की होड़ में आगे पंहुचने का संक्षिप्त रास्ता, सिर्फ हिंदी मठाधीशों और अधिकारियों  के घर से होकर जाता है और  चाटुकारिता कर्म आसानी से उसकी समझ में आ जाता है !  उसके बाद शुरू होता है, जोड़तोड़ और पैर दबा कर उच्च पद पर बैठे एक सड़ियल व्यक्ति के साहित्य कर्म की तारीफों का पुल बाँधना, इस क्रम में  उसे हिंदी साहित्य सम्राट की पदवी देने वालों की लाइन लग जाती है ! विडम्बना यह है कि इन मठाधीशों के दरवाजे पर कुछ सम्मानित हिंदी विद्वान भी शर्म से सर झुकाये, बेमन ही सही पर घुटनों के बल बैठे नज़र आते हैं !
चापलूसों को भी कुछ सम्मान मिलना चाहिए ,
इनकी मेहनत का वतन से मान मिलना चाहिए !
काम इतना सा है यारों,जब भी नेताजी दिखें, 
शक्ल कुत्ते सी लगे और पूंछ हिलना चाहिए !
कवियों का हाल और भी बुरा है,बेचारे हिंदी रचनाकारों की भीड़ में अपनी पहचान के लिए अपने नाम से पहले कवि लिख कर मंचों पर भावभंगिमाओं और फूहड़ चुटकुलों के साथ घटिया दर्शकों से तालियां बजवाकर अपने आप को कवि बनाये रखने की आवश्यक मानसिक खुराक पाता रहता है ! किसी गंभीर किस्म के व्यक्ति को आजकल के कवि मंचों को झेलना आसान नहीं ये सिर्फ शराबी  रिक्शे वालों और नौटंकी देखने वाली मानसिकता का सस्ता मनोरंजन मात्र रह गए हैं ! 
इंटरनेट ने लेखन को बेहद आसान और सस्ता बना दिया है , मगर इसके दुर्गुण भी कम नहीं ! हिंदी के धुरंधर विद्वान भी दूसरों की रचनाओं में भाव और शैली खोजते रहते हैं , इन उस्ताद विद्वानों के लिए, कम प्रसिद्द मगर प्रभावीशाली रचनाकारों की शैली , शब्दों और संवेदनशील अभिव्यक्ति की चोरी करना बेहद आसान है, सिर्फ थोड़ा सा बदलाव कर बड़ी आसानी से प्रभावशाली रचना बन जाती है और इनके मशहूर नाम के साथ यह बेईमान रचना बहुत सारे अखबार और पत्रिकाओं में आसानी से स्थान पा 
जाती है !  वास्तविक लेखक को पता चल जाने पर भी वह इस उस्ताद का कुछ नहीं बिगाड़ पाता और न कोई आसानी से उस पर भरोसा करता है , थोड़ा रोने पीटने के बाद वह बेचारा चुप बैठ जाता है और हिंदी उस्तादों का कार्य, इस बेधड़क चौर्यकर्म के साथ चलता रहता है !
सहज रचनाकार किसी की शैली का दास नहीं हो सकता, मेरा यह विश्वास है कि रचना सोंच कर नहीं की जाती उसका अपना प्रवाह है जो भावनाओं में डूबने पर अपने आप बहता है, अगर उसमें अतिरिक्त बुद्धि लगायेंगे तब भाव विनाश निश्चित होगा ! 
तुलसी,मीरा,रसखान,  कालिदास और कबीर ने किसी नियम का पालन नहीं किया था और न उसके पीछे कोई लालसा थी  ! आज भी, उनके कुछ संवेदनशील शिष्य यहाँ वहां बिखरे हैं जिनको कोई नहीं जानता हाँ उनकी यह रचनाएं, खादी पहने मोटी तोंदों वाले प्रभावशाली हिंदी गिद्धों की दृष्टि की शिकार अक्सर होती रहती है ! और हिंदी इन चुराई हुई मिश्रित रचनाओं से फल फूल रही है यह और बात है कि इन गिद्धों के नोचने से नए प्रभावशाली रचनाकार उभर नहीं पा रहे ! 
आज गीत और कवितायें खो गए हैं समाज से , मैं अकिंचन अपने को इस योग्य नहीं मानता कि साहित्य में अपना स्थान तलाश करू और न साहित्य से, अपने आपको किसी योग्य समझते हुए, किसी सम्मान की अभिलाषा रखता हूँ ! बिना किसी के पैर चाटे और घटिया मानसिकता के गुरुओं के पैरों पर हाथ लगाए , अंत समय तक इस विश्वास के साथ  लिखता रहूंगा कि देर सवेर लोग  इन रचनाओं को पढ़ेंगे जरूर !
अंत में यही कि भाषा बेहद मधुर है बशर्ते वह सही सृजन के माध्यम से निकले , वर्तमान में हिंदी की दशा बेहद दयनीय है , अनाथ हिंदी को जब तक एक माई बाप नहीं मिलता यह समाज का सम्मान नहीं ले पायेगी ! इसकी मधुरता तभी तक है जब तक हिंदी को प्यार करने वाले रचनाकार उसे सहारा देते रहेंगे !
कैसे करते इतनी गति से अनुवाद गीत भाषाओं का !
संवेदनशील भावना से, संवाद विषम  भाषाओँ का !

झन्नाटेदार शब्द निकलें,जब झाग निकलते होंठों से,
ये शब्द वेदना क्या जानें, अरमान क्रूर भाषाओं का !

सावन का अंधा क्या समझे जीवन स्नेहिल रंगों को,
संदिग्ध नज़र जाने कैसे, माधुर्य सहज भाषाओं का !

अपने जैसा ही समझा है सारी दुनियां को कुटिलों ने   
ये शब्द समर्पण न जानें,अभिमान हठी भाषाओं का !

आस्था, श्रद्धा, विश्वास कहाँ, उम्मीद लगाये बैठे हैं,
भावनाशून्य कैसे समझें,विश्वास सरल भाषाओं का !
सिर्फ एक आशा है कि इंटरनेट ने बहुत सारे लेखकों को सुविधा दी है लिखने की , मुझे उम्मीद है कि इन रचनाकारों में से कई बेहद प्रभावी सिद्ध होंगे हाँ हिंदी धुरंधरों के कारण उनकी पहचान में भले बरसों लगे क्योंकि लेखन अमर है, सो वह कभी न कभी पढ़ा अवश्य जाएगा बस यह समाज के लिए हितकारी रहे यही दुआ है !
जहाँ तक मेरी बात है मैंने लगभग ५०० रचनाएं की हैं उनमें कविता और हिंदी ग़ज़ल लगभग २५० होंगी बाकी सब लेख हैं जिनमें अधिकतर समाज के मुखौटों के खिलाफ लिखे हैं ! 
भारत सरकार से अवकाश प्राप्त अधिकारी , नॉएडा में निवास 
http://satish-saxena.blogspot.com/
http://satishsaxena.blogspot.com
satish1954@gmail.com

Monday, June 15, 2015

तेरे झंडों से न, हिन्दोस्तान जाना जाएगा - सतीश सक्सेना

जो यहाँ जन्में उन्ही का देश माना जाएगा !
तेरे झंडों  से न, हिन्दोस्तान जाना जाएगा !

साधू,बाबा,तांत्रिकों ने देश शर्मिन्दा किया 
आस्था से धन कमाने का ज़माना जाएगा !

शहर जीता जब उन्होंने तब नशे में लोग थे 
होश आने दे शहर को ये ठिकाना जाएगा !

शुक्र है अब नौजवां, अंधे नहीं इस देश के
नबी के बच्चों से झगडे का बहाना जाएगा !

मिटा पाओगे निशां,अल्बर्ट,सेखों,हमीद के ?
सरजमीं पे उन्हीं का अधिकार माना जाएगा !

Saturday, June 6, 2015

शक्ल कुत्ते सी लगे और पूंछ हिलना चाहिए ! - सतीश सक्सेना

चापलूसों को भी कुछ सम्मान मिलना चाहिए ,
इनकी मेहनत का वतन से मान मिलना चाहिए !

काम इतना सा है यारों,जब भी नेताजी दिखें, 
शक्ल कुत्ते सी लगे और पूंछ हिलना चाहिए !

दांत तीखे हों नज़र दुश्मन पे  मौक़ा ताड़ कर 
मालिकों के सामने कुछ कर गुजरना चाहिए !

दुम हिलाने का हुनर,आसान कुछ होता नहीं
गालियां दुत्कार खाकर, मुस्कराना चाहिए !

पार्टियों में सूट हो पर , जाहिलों के बीच में
राष्ट्रभक्तों  को  धवल खद्दर पहनना चाहिए !

Wednesday, May 27, 2015

जिस दिन पहली बार मिलोगे, गाओगे - सतीश सक्सेना

पहली  बार मिलोगे तो शरमाओगे !
सब  देखीं तस्वीरें , फीकी पाओगे !

जब जब तुमको याद हमारी आएगी
बिना बात ही घर बैठे , मुस्काओगे !

गीत हमारे खुद मुंह पर आ जाएंगे
जब भी नाम सुनोगे,गाना गाओगे !

आसमान की राहें, आसां कहाँ रहीं
सूर्यवंशियों की , ठकुराहट पाओगे ! 

बार बार समझाया,चाँद सितारों ने 
नहीं अकेले जाओ तुम फंस जाओगे !



Saturday, May 23, 2015

असरदारों से, न लड़ना चाहिए -सतीश सक्सेना

हर सुनामी को समझना चाहिए,
शिष्य को राजा बनाना चाहिए !

धन के आगे दंडवत है मीडिया   
जीतना है तो , लुटाना चाहिए !

फंस गया सरदार कत्लेआम में 
वैसे तो इनाम मिलना चाहिए !

सारी दुनिया देख ले,सरदार को 
असरदारों से, न लड़ना चाहिए !

मूर्खों के देश को, समझा दिया
कैसे मजमें को लगाना चाहिए !

दम भी है आवाज में,वादें भी हैं
भाई बहनों को समझना चाहिए 

चले थे लड़ने, खुदा से छोकरे
मूर्खों को धन कमाना चाहिए !

Tuesday, May 19, 2015

कभी मुस्काएं गैरों पर, किसी दिन राह में थम कर - सतीश सक्सेना

आस्था बेच के देखें, कि छप्पर फाड़ आता क्या !
बड़ा रूतबा है दाढ़ी में,मनीषी क्या विधाता क्या !

यहाँ इक झोपडी में छिपके रहता इक भगोड़ा था 
निरक्षर सोंचता था मैं , वीरानों  में ये करता क्या !

तिराहे पर पुलिस के हाथ जोड़ा करता बरसों से,
मैं मूरख सोंचता था, इन मज़ारों से ये खाता क्या ! 

कमाई आधी रिश्वत में  निछावर कर, बना मंदिर !
शहर अंधों का उमड़ा ले चढ़ावा और पाता क्या ! 

अब इस प्राचीन मंदिर में, प्रभू बरसाएंगे जम कर
दया, यदि न कमाएंगे, तो पायेगा गुमाश्ता क्या !

कभी मुस्काएं गैरों पर, किसी दिन राह में थम कर
बेचारा भूल के गम अपने सोचेगा,यह रिश्ता क्या !

Sunday, May 10, 2015

कोई माँ न झरे ऐसे जैसे,आंसू से भरी बदली जैसी !-सतीश सक्सेना

यह एक संपन्न भरेपूरे घर की वृद्धा का शब्द चित्र है , जो कहीं दूर से भटकती एक बरगद की छाँव में अकेली रहती हुई ,अंतिम दशा को प्राप्त  हुई ! भारतीय समाज के गिरते हुए मूल्य हमें क्या क्या दिन दिखलायेंगे ? 

अच्छा है बुढ़िया चली गयी,थी थकी हुई बदली जैसी
दर्दीली रेखाएं लेकर, निर्जल, निशक्त, कजली  जैसी !

बरगद के नीचे ठंडक में कुछ दिन से थी बीमार बड़ी !
धीमे धीमे बड़बड़ करते,भूखी प्यासी कुम्हलायी सी !   

कुछ  बातें करती रहती थी, सिन्दूर,महावर, बिंदी से  
इक टूटा सा विश्वास लिए,रहती कुछ दर्द भरी जैसी !

भूखी पूरे दिन रहकर भी, वह हाथ नहीं फैलाती थी,
आँखों में पानी भरे हुए,दिखती थी अभिमानी जैसी ! 

कहती थी, उसके मैके से,कोई लेने,आने वाला है ! 
पगली कुछ बड़ी बड़ी बातें,करती थीं महारानी जैसी !

अपनी किस्मत को कोस रहीं, अम्मा रोयीं सन्नाटे में  
कुछ प्रश्न अधूरे से छोड़े,बहती ही रही पानी जैसी !

कल रात हवा की ठंडक में,कांपती रहीं वे आवाजें !
कोई माँ न झरे ऐसे जैसे,आंसू से भरी बदली जैसी !

Thursday, May 7, 2015

कुछ तो बातें, ख़ास रही हैं चेले में - सतीश सक्सेना

कैसे यह सरदार गिर गया खेले में,
कुछ तो गहरी बात, रही है चेले में !

नैतिकता की बातें , करने वालों ने ,
मार दिया सरदार ,घेर के, मेले में ! 

कैसे बादल फटे,अभी तो फेंका था   
इतनी ताकत कहाँ लगी थी,ढेले में !

जो रथवान रहे थे इनके जीवन में 
रथ के पीछे, बाँध घसीटा मेले में !

ऐसे ही शुभ लाभ  चाहने वालों ने !
लाला जी को,बेंच दिया है धेले में !

बदला लेने रघुकुल में ही जन्में हैं ,
अबकी लगता राम घिरेंगे रेले में !

पुनर्जन्म लंकेश का हुआ रघुकुल में
अबकी राम लड़ेंगे, युद्ध  अकेले में !


Wednesday, May 6, 2015

ये ग़ज़ल कैसी रही ? - सतीश सक्सेना

गर्दिशों में खिलखिलाती ये ग़ज़ल कैसी रही !
आंसुओं में झिलमिलाती ये ग़ज़ल कैसी रही !

इस उदासी का सबब, कैसे बताएं,आप को,
सिर्फ रस्मों को निभाती, ये ग़ज़ल कैसी रही !

काबा, कंगूरों से चलकर, मयकदे के द्वार पे 
खिदमतों में सर झुकाती ये ग़ज़ल कैसी रही !

मीर ग़ालिब औ जिगर के दाग ने गहने दिए,
अदब जंगल को सिखाती ये ग़ज़ल कैसी रही 

कैसे शायर है जबरिया,तालियां बजवा रहे,
क़दरदानों को रुलाती, ये ग़ज़ल कैसी रही ! 

Monday, May 4, 2015

बरसों से छिपायीं वे यादें पिलवाती मदिरा शाम ढले - सतीश सक्सेना

कड़वे तानें दरवाजे पर दे जाएँ झिड़कियां शाम ढले !  
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

मेरे आँगन में इक जोड़ा , 
बरसों से चीं चीं करता है !
जाने क्यों आता देख मुझे,
कुछ गुमसुम हो जाता है !
कसमें वादे सपने कैसे 
हँसते रोते, ही बड़े हुए  !
जाने किन पश्चातापों से भर आयीं अँखियाँ शाम ढ़ले !
तुमने ही भुलाये थे वादे , बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

शहनाई की धुन में अक्सर 
मंज़र , बाराती हो जाए !
ढोलक मृदंग के साथ,खुलीं 
चौखटें गुलाबी हो जाएँ !
ये स्मृतिचिन्ह न जाने कब 
खुद प्रश्नचिन्ह बन खड़े हुए !
जाने क्यों नज़र झुकाएं हैं,चूड़ी की कनियाँ शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे , बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

सावन भादों तेरी यादों के 
दुनियां से छिपाए रहता हूँ !
ऐसे भी दिखाएँ क्यों आंसू 
वारिश में, चलते रोता हूँ !
कितने सपने रो पड़े बिना  
फूटी किस्मत से, लड़े हुए !
घनघोर घटायें बन जातीं,बंजारिन अखियाँ शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे , बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

कोई भी उदासी का फोटो,
तेरी नज़रें, दिल दहलाएं !
मुस्कान किसी चेहरे पे हो 
तू बार बार सम्मुख आये !
वे ख्वाब सुनहरे भी टूटे 
जो नवरत्नों से जड़े हुए  !
दिन जैसे तैसे कट जाता, लहराती रतियाँ शाम ढ़ले !
तुमने ही भुलाये थे वादे , बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

क्यों जाम उठाने से पहले 
आँखें भी छलके जाती हैं
मदिरालय में,मेरे आते ही 
साकी भी छल के जाती है
मैं आता दर्द भूलने को ,
पर जैसे  भाले गड़े हुए  !
हर बार शराबी प्याले में, रंजीदा अँखियाँ शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे,बतलायें चिड़ियाँ शाम ढ़ले !

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